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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

दण्ड पारुष्य के भी तीन प्रकार भेद हैं—मृदु, मध्यम तथा उत्तम। हाथों (मुक्कों) तथा पैरों से पीटना मृदु दण्ड-पारुष्य है, लाठियों, रस्सियों तथा पत्थरों से पीटना मध्यम तथा चाकू, छुरी और तलवार आदि से क्षत विक्षत करना उत्तम दण्ड-पारुष्य कहलाता है। हीनमध्योत्तमानां तु द्रव्याणामपकर्षणात्। त्रीण्येव साहसान्याहुस्तत्र कण्टकशोधनम्॥६॥ जिस प्रकार हीन, मध्यम और उत्तम पदार्थों की छीना-झपटी के आधार पर साहस तीन प्रकार का है, उसी प्रकार अपराध के दण्ड के रूप में 'कण्टकशोधन' कहलाने वाले दण्ड-पारुष्य के भी उपर्युक्त तीन—मृदु, मध्यम तथा उत्तम—भेद हैं। विधिः पञ्चविधस्तूक्त एतयोरुभयोरपि। विशुद्धिर्दण्डभाक्त्वं य तत्र संवध्यते यथा॥७॥ इन दोनों—साहस और दण्ड-पारुष्य—की समान रूप से पांच विधियां हैं, जिनका परिचय आगे दिया जा रहा है। यहां इतना समझ लेना चाहिए कि दोनों— अपराध और दण्ड—का अभिन्न सम्बन्ध है, अर्थात् अपराध किये जाने पर ही दण्ड-प्रवर्तन होता है, अन्यथा नहीं। निरपराध को दण्डित करना, तो अपराध को जन्म देने-जैसा पाप है। इसके अतिरिक्त एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि दण्ड का उद्देश्य क्रूरता बरतना कदापि नहीं, अपितु इसका उद्देश्य सुधारना है। यही कारण है कि एक ही अपराध करने वाले विभिन्न स्थितियों के व्यक्तियों को दण्ड देने में अन्तर किया जाता है। पारुष्यदोषावृतयोर्युगपत्सम्पवृत्तयोः । विशेषश्चेन्न दृश्येतं विनयः स्यात् समस्तयोः॥४॥ निर्दोष अथवा निरपराध को क्रोधावेश में आकर भद्दी गालियां देना अथवा उसकी पिटाई करना, दोनों ही समान रूप से दण्डनीय अपराध हैं। इन दोनों में किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं करना चाहिए। निर्दोष को मानसिक रूप से (गाली-गलौच द्वारा) तथा शारीरिक रूप से (पिटाई द्वारा) पीड़ित करने वाले को एक समान दण्ड देना चाहिए। पूर्वमाक्षारयेद् यस्तु नियतं स्यात् स दोषभाक्। पश्चाद् यः सोऽप्यसत्कारी पूर्वे तु विनयो गुरुः॥९॥ तर्जनी आदि से किसी को फटकारने, डांटने डपटने और डराने में पहल करने वाला तो अपराधी माना ही जाता है, उसकी फटकार को सहन न करके दुगुने वेग से उस पर प्रत्याक्रमण करने वाले को भी सज्जन नहीं माना जा सकता। अभिप्राय यह है कि यदि एक व्यक्ति क्रोधवश उन्मादग्रस्त हो गया है, तो दूसरे को 244 / नारदस्मृति

अपना विवेक नहीं खो देना चाहिए, उसे धैर्य और सहनशीलता का परिचय देना चाहिए। हां, दोनों में अधिक दोष प्रथम व्यक्ति का माना जायेगा और वह अधिक दण्ड का भागी है। दूसरे का क्रोध तो क्रिया की प्रतिक्रिया मात्र है—यह प्रथम विधि है। द्वयोरापन्नयोस्तुल्यमनुबध्नाति यः पुनः। स तयोर्दण्डमाप्नोति पूर्वो वा यदि वोत्तरः ॥ 10 ॥ किसी मध्यस्थ द्वारा कलह विवाद करने वाले दो व्यक्तियों को शान्त कर दिये जाने पर अथवा अपने आप शान्त हो जाने पर, फिर से भड़क उठने वाला व्यक्ति बड़ा अपराधी माना जाता है। ऐसा व्यक्ति परवर्ती—क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में उग्रता बरतने वाला—होने पर भी पूर्ववर्ती—विवाद प्रारम्भ करने वाला माना जाना तथा तदनुरूप दण्डित किया जाना चाहिए—यह दूसरी विधि है। यहां शान्त हो जाने वाले विवादी को दण्ड नहीं दिया जाता। श्वपाकमेदचाण्डालव्यङ्गेषु वधवृत्तिषु। हस्तिपव्रात्यदासेषु गुर्वाचार्यातिगेषु च ॥ 11 ॥ मर्यादातिक्रमे सद्यो घात एवानुशासनम्। नय तद्दण्डपारुष्ये स्तेयमाहुर्मनीषिणः ॥ 12 ॥ मनीषियों के अनुसार निम्नोक्त तुच्छ व्यक्तियों—1. चाण्डाल, 2. पाखण्डी— वेद-विरुद्ध आचरण करने वाले, अशोककालीन एक सम्प्रदाय से सम्बद्ध व्यक्ति, 3. बधिर, आदि विकलांग, 4. व्याध—जीव-हत्या से आजीविका चलाने वाले, 5. महावत—हाथियों का पालन करने वाले, 6. व्रात्य—पतित होने से उपनयन संस्कार के अयोग्य घोषित, आचारभ्रष्ट तथा 7. दास आदि द्वारा अपने पूज्य आचार्यों, स्वामियों, प्रतिष्ठित महानुभावों तथा वृद्ध जनों का अपमान करने पर इनकी बेतों से पिटाई करनी चाहिए। हां, इनके द्वारा अपने आदरणीय सम्बन्धी—चाचा, मामा आदि आचार्य तथा शिष्य की पत्नी—का गमन करने पर इनका तत्काल वध कर देना चाहिए, अन्य किसी दण्ड के विषय में तो सोचना ही नहीं चाहिए। यह तीसरी विधि है। यमेव ह्यतिवर्त्तेत नीचः सन्तं जनं नृषु। स एव विनयं कुर्यान्न तद्विनयभाग् नृपः ॥ 13 ॥ समाज के निम्न वर्ग के किसी व्यक्ति द्वारा उच्च वर्ग के किसी व्यक्ति का अपमान किये जाने पर नीच व्यक्ति को दण्ड देने का अधिकार अपमानित होने वाले उच्च वर्ग के व्यक्ति का होना चाहिए, राजा द्वारा इसमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए—यह चतुर्थ विधि है। टिप्पणी—दण्ड की किसी रूपरेखा को निश्चित न करके, उसके स्थान पर नारदस्मृति / 245

उच्च वर्ग को मनमानी करने की छूट देना तत्कालीन न्यायव्यवस्था की निर्दोषिता के आगे एक प्रश्नचिह्न है। एक व्यक्ति मृदु हो सकता है और दूसरा व्यक्ति निर्मम एवं कठोर हो सकता है। एक ही अपराध के दण्ड में भिन्नता को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता और व्यक्ति को दण्ड का अधिकार देने पर दण्ड में एकरूपता नहीं आ सकती। मला ह्येते मनुष्येषु धनमेषां मलात्मकम्। अपि तान् घातयेद्राजा नार्थदण्डेन दण्डयेत्॥ 14॥ पद्य संख्या ग्यारह में निर्दिष्ट चाण्डाल, पाखण्डी तथा व्रात्य आदि नीच पुरुष पापकर्मा हैं और उनके द्वारा अर्जित धान भी पापमूलक है। अतः राजा को इनके अपराधों के लिए इन्हें कोड़े मारने-जैसा दण्ड तो अवश्य देना चाहिए, परन्तु इन्हें अर्थ दण्ड देकर इनसे धन कभी नहीं वसूल करना चाहिए—यह पञ्चम विधि है। शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति। वैश्योऽध्यर्धं शतं द्वे वा शूद्रस्तु वधमर्हति॥ 15॥ ब्राह्मण को अपमानित करने वाले क्षत्रिय से सौ पण और वैश्य से डेढ़ सौ पण दण्ड के रूप में वसूल करने चाहिए तथा ऐसा दुस्साहस करने वाले शूद्र को बांधकर जेल में डाल देना चाहिए। पञ्चाशद् ब्राह्मणो दण्ड्यः क्षत्रियस्याभिशंसने। वैश्ये स्यादर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः॥ 16॥ क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को अपमानित करने के लिए ब्राह्मण से क्रमशः पचास, पच्चीस और बारह पण दण्ड के रूप में वसूल करने चाहिए। समवर्णे द्विजातीनां द्वादशैव व्यतिक्रमे। वादेष्ववचनीयेषु तदैव द्विगुणं भवेत्॥ 17॥ समान वर्ण वाले द्वारा समान वर्ण वाले का, अर्थात् ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मण का तथा क्षत्रिय द्वारा क्षत्रिय का अपमान करने का दण्ड बारह पण है। अपने से निम्न वर्ण के व्यक्ति द्वारा उच्च वर्ण के व्यक्ति का, अर्थात् क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मण का, वैश्य द्वारा क्षत्रिय का और शूद्र द्वारा वैश्य का अपमान किये जाने का दण्ड दुगुना, अर्थात् चौबीस पण है। टिप्पणी—इससे यह भी संकेतित होता है कि वैश्य द्वारा ब्राह्मण का और शूद्र द्वारा क्षत्रिय का, अर्थात् अपने से उच्च का ही नहीं, अपितु उच्चतम वर्ण का अपमान करने का दण्ड तिगुना, अर्थात् छत्तीस पण होगा। शूद्र द्वारा ब्राह्मण के अपमान का दण्ड तो कारावास है—यह पहले ही निर्दिष्ट किया जा चुका है। काणमप्यथवा खञ्जमन्यं वापि तथाविधम्। तथ्येनापि ब्रुवन्दण्ड्यो राज्ञा कार्षापणावरम्॥ 18॥ 246 / नारदस्मृति

विकलांग—काणा, लंगड़ा, लूला तथा बहरा आदि—को विकलांग कहने, अर्थात् चिढ़ाने वाले से कम-से-कम एक कौड़ी दण्ड के रूप में वसूली जा सकती है। इसका अर्थ है कि अधिक दण्ड भी दिया जा सकता है। न किल्विषेणापवदेच्छास्त्रतः कृतपावनम्। न राज्ञा धृतदण्डं च दण्डभाक् तद्व्यतिक्रमात्॥ 19॥ अपराधी द्वारा अपने अपराध का राजा द्वारा निर्दिष्ट दण्ड भुगतने तथा प्रायश्चित्त करने के उपरान्त, किसी को भी उसके अपराध के लिए उसकी निन्दा करने का कोई अधिकार नहीं मिलता। ऐसा करने वाला दण्ड का भागी होता है। दण्ड भुगतने और प्रायश्चित्त करने पर अपराध को समाप्त हुआ ही समझना चाहिए। लोकेऽस्मिन् द्वाववक्तव्याववध्यौ च प्रकीर्तितौ। ब्राह्मणश्चैव राजा च तौ हीदं विभृतो जगत्॥ 20॥ इस संसार के पालक और रक्षक होने के कारण ब्राह्मण और राजा की उनके द्वारा किये किसी अपराध के लिए न तो निन्दा की जा सकती है और न ही उन्हें दण्ड दिया जा सकता है। वस्तुतः मान्यता यह है कि राजा और ब्राह्मण कभी कुछ ग़लत करते ही नहीं है। टिप्पणी—इंग्लैण्ड में भी राजा के विषय में यह सर्व-सम्मत धारणा है— "King does no sin" अर्थात् राजा तो कभी कोई पापकर्म करता ही नहीं है। पतितं पतितेत्युक्त्वा चौरं चौरेति वा पुनः। वचनात्तुल्यदोषः स्यान्मिथ्या द्विर्दोषतां व्रजेत्॥ 21॥ पतित व्यक्ति को पतित और चोर को चोर कहकर अपमानित करने वाला भी उनके समान दोषी होता है। निर्दोष पर दोषारोपण करने वाला दुगुने दोष का भागी बनता है। अभिप्राय यह है कि बिना पुष्टि के न तो किसी पर दोषारोपण करना चाहिए और न ही किसी को 'अपराधी' कहकर निरर्थक अपमानित ही करना चाहिए। एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन्। जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः॥ 22॥ शूद्र द्वारा वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मण के प्रति तीखे, कड़वे, अश्लील और विषैले वचन बोलकर उनका अपमान करने पर उसकी जिह्वा काट डालनी चाहिए। नीच-जन्मा शूद्र के ऐसे दुस्साहस को तो असह्य व्यवहार और अक्षम्य अपराध ही समझना चाहिए। टिप्पणी—शूद्र को 'जघन्य प्रभव,' अर्थात् नीच स्थान से उत्पन्न मानने के विरुद्ध मध्यकालीन कवियों की उक्तियां दर्शनीय हैं— नानक—'एक मूल से सब उत्पन्ना, को ब्राह्मण को शूद्रा।' नारदस्मृति / 247

कबीर-'जे तू बाम्हन बाम्हनि जाया, और बाट ते काहे न आया।' नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः। निक्षेपोऽयोमयः शङ्कु ज्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः॥ 23॥ द्विजातियों—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—के नाम और जाति का अवज्ञापूर्वक उच्चारण करने वाले शूद्र के मुख में अग्नि में तपे दस अंगुल लम्बे लौहदण्ड को घुसेड़ देना चाहिए। **टिप्पणी—**आज भी किसी सिख को 'सिखड़ा' कहना अपराध माना जाता है। धर्मोपदेशं दर्पेण द्विजानामस्य कुर्वतः। तप्तमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः॥ 24॥ राजा को अपनी विद्वत्ता, प्रतिभा अथवा योग्यता के अहंकार से ग्रस्त होकर द्विजातियों—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—को ज्ञानोपदेश देने का दुस्साहस करने वाले शूद्र के मुख में और कानों में उबलता हुआ तेल डाल देना चाहिए। येनाङ्गेनावरोवर्णो ब्राह्मणस्यापराध्नुयात्। तदङ्गं तस्यच्छेत्तव्यमेवं शुद्धिमवाप्नुयात्॥ 25॥ शूद्र अपने जिस किसी अंग—हाथ, पैर, मुख आदि से—ब्राह्मण पर प्रहार करता है, उसके उस अंग को काट देना ही उसका दण्ड है, यही उसका प्रायश्चित्त है। इसी से उसकी शुद्धि होती है। उससे जुर्माना (अर्थ-दण्ड) वसूल करने का कोई औचित्य ही नहीं है। सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यावकृष्टजः । कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचौ वास्यावकर्तयेत्॥ 26॥ निम्न वर्ण के व्यक्तियों द्वारा उच्च वर्ण के व्यक्तियों के साथ—शूद्रों द्वारा वैश्यों के साथ, वैश्यों द्वारा क्षत्रियों-ब्राह्मणों के साथ आदि—बैठने की चेष्टा करने पर अर्थात् अपने को उनके बराबर समझने पर राजा को जलती लौहशलाका से उनकी कमर को दागकर और उनके दोनों पाश्र्वों को काटकर उन्हें अपने देश से निर्वासित कर देना चाहिए। अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः। अवमूत्रयतः शिश्नमेवशब्द्यतो गुदम्॥ 27॥ राजा को अहंकारवश उच्च वर्ण के सभ्य पुरुषों पर थूकने वाले निम्न वर्ण- जाति वाले लोगों के दोनों होठों को और मूत्र फेंकने वालों के लिंग को काट देना चाहिए। उच्च वर्ण के लोगों के साथ मैथुन करने वालों की गुदा में तप्त लौहदण्ड घुसेड़ देना चाहिए। केशेषु गृह्णतो हस्तौ छेदयेदविचारयन्। पादयोर्दाढिकायां तु ग्रीवायां वृषणेषु च॥ 28॥ 248 / नारदस्मृति

राजा को बिना सोच-विचार किये, तत्काल उच्च वर्ण-जाति के लोगों की मूंछों, दाढ़ी, ग्रीवा, बालों, पैरों, अण्डकोषों तथा दाढ़ी आदि में हाथ डालने (पकड़ने) वाले शूद्रादि निम्न जाति के लोगों के हाथों को काट डालना चाहिए। त्वक्छेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः। मांसभेत्ता तु षण्निष्कान् प्रवास्यस्त्वस्थिभेदकः ॥ 29 ॥ राजा को निम्न वर्ण-जाति के लोगों द्वारा उच्च वर्ण-जाति के लोगों का चर्मच्छेदन करने तथा रक्त बहाने पर अपराधियों से सौ पण तथा मांस-छेदन करने पर छह कनिष्क दण्ड के रूप में वसूल करने चाहिए। उच्च वर्ण-जाति वालों की हड्डी-पसली तोड़ने वाले निम्न वर्ण-जाति के लोगों को देशनिर्वासन का दण्ड देना चाहिए। उपकृश्य तु राजानं कर्मणि स्वे व्यवस्थितम्। जिह्वाछेदाद्द्बवेच्छुद्धः सर्वस्वहरणेन वा ॥ 30 ॥ अपने कर्तव्य का भली-भांति निर्वाह करने वाले राजा की निन्दा करने वाले अथवा उसके विरुद्ध अण्टशण्ट बकने वाले की जिह्वा काट दी जाती है और उसकी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली जाती है। राजनि प्रहरेद्यस्तु कृतागस्यपि दुर्मतिः। शूले तमग्नौ विपचेद् ब्रह्महत्याशताधिकम् ॥ 31 ॥ अपराध करने वाले राजा पर प्रहार करने वाले दुर्बुद्धि नीच व्यक्ति को या तो जीवित आग में जला देना चाहिए या फिर फांसी के फन्दे पर लटका देना चाहिए; क्योंकि राजा पर प्रहार सैकड़ों ब्रह्महत्याओं से भी कहीं अधिक भारी और निन्दनीय पापकृत्य है। पुत्रापराधे न पिता नाश्वे न शुनि दण्डभाक्। न मर्कटे च तत्स्वामी तेनैव प्रहितो न चेत् ॥ 32 ॥ पिता द्वारा प्रेरणा-प्रोत्साहन पाये बिना, पुत्र द्वारा किये अपराध के लिए पिता को दण्डित नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार स्वामी के किसी प्रकार से लिप्त अथवा योग देने वाला न होने पर उसके पालतू पशु-अश्व, कुत्ता तथा वानर आदि-द्वारा किये गये उत्पात के लिए स्वामी को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। ॥ चतुर्थ अध्याय का पञ्चदश प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 249

16. द्यूत-समाह्वय प्रकरण

  1. द्यूत-समाह्वय प्रकरण अक्षबध्रशलाकाद्यैर्देवनं जिह्मकारितम्। पणक्रीडा वयोभिश्च पदं द्यूतसमाह्वयम्॥ 1 ॥ पण लगाकर और छल-कपट का प्रयोग करते हुए अक्षों-लकड़ी से बनी गोटियों (पासों) से वध्रों-चमड़ी से बनी पट्टियों से अथवा शलाकाओं-हाथी दांत आदि से बनी कौड़ियों से खेलना अथवा दांव लगाकर पक्षियों-कबूतर, तोता, मैना, बटेर आदि को भिड़ाना और पशुओं-बैल, भैंसा, ऊंट तथा अश्व आदि को-दौड़ाना अथवा लड़ाना भिड़ाना आदि द्यूत-समाह्वय कहलाता है। सभिकः कारयेद् द्यूतं देयं दद्याच्च तत हृतम्। दशकं च शतं वृद्धिस्तस्य स्याद् द्यूतकारिणः॥ 2 ॥ द्यूत-क्रीड़ा का संयोजक और नियन्त्रक सभिक कहलाता है, जो राजा द्वारा नियुक्त होता है और इस नियुक्ति के बदले वह राजा को निर्धारित कर का भुगतान करता है। द्यूतशाला में पराजित खिलाड़ी से धन लेकर और विजेता को देना सभिक का कर्त्तव्य होता है और इस सारी व्यवस्था के लिए वह विजेता से विजित राशि का दस प्रतिशत वसूल करता है। द्विरभ्यस्ताः पतन्त्यक्षा गृहे यद्यक्षदेविनः। जयं तस्यापरस्याहुः कितवस्य पराजयम्॥ 3 ॥ अक्षों पासों से जुआ खेलने वाले के अक्ष के दो बार घोषित अथवा कल्पित अथवा निर्धारित अंक के अनुरूप सही पड़ने पर, अक्ष फेंकने वाला विजेता और अक्ष फेंकने की अनुमति सहमति देने वाला पराजित माना जाता है। कितवेष्वेव तिष्ठेरन् कितवाः संशयं प्रति। त एव तस्य द्रष्टारस्त एव स्युस्तु साक्षिणः॥ 4 ॥ फेंके गये अक्ष के कल्पित अंक के अनुरूप पड़ने न पड़ने के सम्बन्ध में उत्पन्न सन्देह अथवा विवाद के निराकरण के लिए दर्शकों के प्रत्यक्षदर्शी होने के कारण उनके वचन को प्रमाण मानना चाहिए। अशुद्धः कितवो नान्यदाश्रयेद् द्यूतमण्डलम्। प्रतिहन्यान्न सभिकं दापयेत्तम् स्वमिष्टतः॥ 5 ॥ 250 / नारदस्मृति

एक द्यूतशाला में पराजित घोषित व्यक्ति को किसी दूसरी द्यूतशाला में द्यूतक्रीड़ा की अनुमति नहीं मिलती। द्यूत में पराजित व्यक्ति द्वारा धन देने से मुकरने की आशंका को समाप्त करने के लिए दोनों खिलाड़ियों से पहले ही दांव में लगायी धनराशि रखवा ली जाती है। इसी प्रकार विजेता द्वारा सभिक को उसका भाग देने से नकारने की आशंका को निर्मूल करने के लिए सभिक द्वारा अपना भाग पहले से काटकर शेष राशि विजेता को सौंपी जाती है। कूटाक्षदेविनः पापान्निहरेद् द्यूतमण्डलात्। कण्ठेऽक्षमालामासज्य स ह्येषु विनयः स्मृतः ॥ 6 ॥ द्यूत-क्रीड़ा में बेईमानी तथा छल कपट अथवा धोखा करने वाले के गले में अक्षमाला डालकर उसे द्यूतशाला से बाहर निकाल देना चाहिए। यही धूर्तता का दण्ड है। अनिर्दिष्टस्तु यो राज्ञा द्यूतं कुर्वीत मानवः। न स तं प्राप्नुयात् काम विनयं चैव सोऽर्हति ॥ 7 ॥ राजा से अनुमति (लायसेंस) प्राप्त किये बिना द्यूतशाला चलाने वाले को द्यूत खेलने वालों से कमीशन लेने का कोई अधिकार नहीं बनता। सत्य तो यह है कि राज-कर की चोरी करने वाला ऐसा व्यक्ति दण्ड का पात्र होता है। अथवा कितवा राज्ञे दत्त्वा भागं यथोदितम्। प्रकाशं देवनं कुर्युरेवं दोषो न विद्यते ॥ 8 ॥ इसके विपरीत राजा से अनुमति प्राप्त द्यूतशाला का सञ्चालक सभिक यदि विजेता से प्राप्त राशि में से कुछ अंश का भुगतान राजा को भी करता है, तो उसे खुले में भी खिलाड़ियों को द्यूत खिलाने की छूट होती है। इसके लिए उसे दोष नहीं दिया जाता। ॥ चतुर्थ अध्याय का षोडश प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 251

  1. प्रकीर्णक प्रकीर्णके पुनर्ज्ञेयो व्यवहारो नृपाश्रयः। राज्ञामाज्ञाप्रतीघातस्तत् कर्म करणं तथा ॥ 1 ॥ प्रकीर्णक प्रकरण में राजा द्वारा किये जाने वाले व्यवहारों से सम्बन्धित विषयों का विवेचन है। इसी के साथ राजा की आज्ञा के प्रतिपालन और उसके उल्लंघन के परिणाम पर भी विचार किया गया है। पुरप्रदानं सम्भेदः प्रकृतीनां तथैव च। पाषण्डनैगमश्रेणीगणधर्मविपर्ययः ॥ 2 ॥ पितापुत्रविवादश्च प्रायश्चित्तव्यतिक्रमः। प्रतिग्रहविलोपश्च कोप आश्रमिणामपि ॥ 3 ॥ वर्णसंकरदोषश्च तद्वृत्तिनियमस्तथा। न दृष्टं यच्च पूर्वेषु ततसर्वं स्यात् प्रकीर्णके ॥ 4 ॥ पूर्व प्रकरणों में अचर्चित निम्नोक्त विषयों पर प्रस्तुत प्रकीर्णक प्रकरण में विचार किया जा रहा है—
  2. उपनगर (कालोनी) के निर्माण के लिए राजाज्ञा तथा राजकीय आर्थिक अनुदान।
  3. प्रजाजनों का (आर्थिक, वर्ण-गत, जाति-गत, धर्म-गत, सम्प्रदाय-गत तथा व्यवसाय-गत आदि) विभिन्न आधारों पर विभागीकरण।
  4. वेद-विरुद्ध सम्प्रदायों—पाखण्ड, नैगम, श्रेणी और गण आदि—के सम्बन्ध में दृष्टिकोण और व्यवहार-नियम आदि।
  5. पिता-पुत्र के मध्य उत्पन्न विवाद और उसका निपटारा।
  6. प्रायश्चित्त के उल्लंघन का दण्ड।
  7. आश्रमवासियों को दी जाने वाली सुविधाओं को प्रतिबन्धित करना, स्वीकृत अनुदान का प्रत्यावर्तन (रोक लगाना) तथा उनके विरुद्ध कार्यवाही करना।
  8. वर्णसंकरों द्वारा नियम, मर्यादा का अतिक्रमण तथा
  9. वर्णसंकरों की वृत्ति के स्रोत आदि। इन विषयों पर पहले चर्चा नहीं की जा सकी, परन्तु इससे इन विषयों का 252 / नारदस्मृति

महत्त्व कम नहीं हो जाता। ये विषय पर्याप्त महत्त्वपूर्ण होने के कारण विचारणीय हैं। अतः प्रकीर्णक प्रकरण में इन्हीं पर विचार किया जा रहा है। राजा त्ववहितः सर्वानाश्रमान् परिपालयेत्। उपायैः शास्त्रविहितैश्चतुर्भिः प्रकृतीस्तथा ॥ ५ ॥ राजा को अत्यन्त सावधान रहते हुए चारों वर्णों और चारों आश्रमों के लोगों से अपने लिए शास्त्रोक्त तथा लोक-परम्परा से प्रचलित विधानों-नियमों का पालन कराना चाहिए। इसके अतिरिक्त राजा को अपनी प्रजा के लोगों को राजनीति के चार-साम, दान, भेद तथा दण्ड-उपायों से विनीत एवं अनुशासित बनाना चाहिए। यो यो वर्णोऽपहीयेत यो च उद्रेकमाप्नुयात्। तं तं दृष्ट्वा स्वतो मार्गात् प्रच्युतं स्थापयेत् पथि ॥ ६ ॥ राजा को अपने वर्ण-धर्म से स्खलित होने वालों को तथा अपने वर्ण-धर्म से भिन्न आचरण करने वालों को कठोरतापूर्वक अपने वर्ण धर्म के आचरण में प्रवृत्त करना चाहिए। मार्ग-भ्रष्टों को सही मार्ग पर लाना राजा का धर्म-कर्म है, इसीलिए उसे दण्डित करने का अधिकार भी दिया गया है। अशास्त्रोक्तेषु चान्येषु पापयुक्तेषु कर्मसु। प्रसमीक्ष्यात्मना राजा दण्डं दण्ड्येषु पातयेत् ॥ ७ ॥ राजा को अशास्त्रोक्त अथवा शास्त्रविरुद्ध अथवा अन्यान्य पापकर्मों में लिप्त लोगों को समझा-बुझाकर न्याय-पथ पर लाना चाहिए। समझाने-बुझाने पर काम न चलने पर, राजा को दुष्टों को दण्डित करने में संकोच नहीं करना चाहिए। वस्तुतः दण्ड की उपयोगिता ही शास्त्रमर्यादा को व्यवस्थित करना है। श्रुतिस्मृतिविरुद्धं यद् भूतानामहितं च यत्। न तत् प्रवर्तयेद्राजा प्रवृत्तं च निवर्तयेत् ॥ ८ ॥ राजा को शास्त्र-विरुद्ध, लोकाचार-विरुद्ध अथवा परम्परा-विरुद्ध अथवा जन साधारण के हित के विरुद्ध आचरण करने वालों की किसी भी रूप में उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि थोड़ी सी छूट पाते ही दुष्ट कई बार इतने उद्धत हो जाते हैं कि उनका दमन करना एक समस्या बन जाती है। राजा को तो जनहितविरोधी गतिविधियों में लिप्त लोगों को ऐसी कठोरता से दबाना चाहिए कि दूसरे उसमें प्रवृत्त होने का साहस ही न जुटा सकें। न्यायापेतं यदन्येन राज्ञाऽज्ञानकृतं भवेत्। तदप्यन्यायविहितं पुनर्न्याये निवेशयेत् ॥ ९ ॥ राजा को जाने-अनजाने ग़लत पथ का अनुसरण करने वाले अपने प्रजाजनों को सभी सुलभ साधनों से न्याय-मार्ग पर लाना चाहिए। सत्य तो यह है कि इस ओर ध्यान न देने वाले राजा को राजा बनने अथवा कहलाने का अधिकार ही नहीं। नारदस्मृति / 253

आयुधान्यायुधीयानां शिल्पद्रव्याणि शिल्पिनम्। वेश्यास्त्रीणामलंकारं वाद्यातोद्यादि तद्विदाम्॥ 10 ॥ यच्च यस्योपकरणं येन जीवन्ति कारवः। सर्वस्वहरणेऽप्येतान्न राजा हर्तुमर्हति ॥ 11 ॥ गलत राह पर चल रहे लोगों को सन्मार्ग पर लाने के लिए दण्ड स्वरूप सुधारने का प्रयास करते राजा को लोगों से उनकी आजीविका के साधन कभी नहीं छीनने चाहिए। उदाहरणार्थ, शस्त्रों के व्यापारियों (आयुधजीवियों से उनके शस्त्र तथा शस्त्र-निर्माण में सहायक सामग्री, शिल्पियों से उनके शिल्प-कर्म में प्रयुक्त होने वाला सामान, वेश्याओं से उनके आभूषण तथा वादकों-गाने-बजाने से आजीविका चलाने वालों-से उनके वाद्ययन्त्र बाजा, ढोलक, तुरही तथा बांसुरी आदि। अनिर्देश्यावनिन्द्यौ च राजा ब्राह्मण एव च। दीप्तिमत्वाच्छुचित्वाच्च यदि न स्यात् पथश्च्युतः॥ 12 ॥ अपने कर्तव्य-कर्म के निर्वहण में कोताही न करने वाले तथा अत्यन्त सावधानी से प्रजा का रञ्जन-पालन करने वाले राजा की और विद्वान्, आचारनिष्ठ एवं वेदपाठी ब्राह्मण की निन्दा अथवा अवज्ञा कभी नहीं करनी चाहिए। वस्तुतः न्यायपूर्वक प्रजापालन से ही राजा तथा दीप्तिमान् व शुद्ध आचरण से ही ब्राह्मण पवित्र एवं पूज्य बनता है। राज्ञा प्रवर्तितान् धर्मान् यो नरो नानुपालयेत्। दण्ड्यः स पापो वध्यश्च कोपयन् राजशासनम्॥ 13 ॥ धर्मनिष्ठ राजा द्वारा प्रवर्तित नियमों का पालन न करके, उनकी अवज्ञा करने वाले प्रजाजन अपने को दण्डनीय एवं वध के योग्य बनाते हैं। वस्तुतः राजा के आदेशों का पालन न करना राजा को कुपित करने-जैसा पाप है और इसके लिए कोई भी दण्ड कम है। यदि राजा न सर्वेषां वर्णानां दण्डधारणम्। कुर्यात् पथो व्यपेतानां विनश्येयुरिमाः प्रजाः ॥ 14 ॥ पथभ्रष्टों के साथ कठोर व्यवहार करना तथा उन्हें दण्डित करना तो राजा की विवशता है; क्योंकि इस विषय में राजा के द्वारा थोड़ी-सी छूट दिये जाने का परिणाम भी अत्यन्त भयंकर होता है। बुराई अपना विस्तार इस प्रकार कर लेती है कि फिर उसे मिटाना कठिन हो जाता है। सुधार के लिए निरन्तर सावधान रहना पड़ता है। पतन का मार्ग तो सदैव खुला रहता है। ब्राह्मण्यं ब्राह्मणो जह्यात् क्षत्रियः क्षात्रमुत्सृजेत्। शूले मत्स्यानिवाश्नीयुर्दुर्बलान् बलवान्नरः ॥ 15 ॥ 254 / नारदस्मृति

राजा के द्वारा धर्म की स्थापना के लिए सावधान न रहने पर ब्राह्मण आदि चारों वर्णों के लोग, न केवल अपने नियत-धर्म के पालन में शिथिल एवं उदासीन हो जाते हैं, अपितु 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' न्याय के अनुसार जंगल का राज्य स्थापित हो जाता है और फिर बड़ी मछली छोटी मछली को निगलने में देर नहीं करती। स्वकर्म जह्याद्वैश्यस्तु शूद्रः सर्वं विशेषयेत्। राजानश्चेन्नाकरिष्यन् प्रजानां दण्डधारणम्॥ 16॥ राजा द्वारा प्रजाजनों को धर्मनिष्ठ एवं कर्तव्यपरायण बनाने के प्रति ढील बरतने पर तो वैश्य अपने व्यवसाय को और शूद्र द्विजों की सेवा-कर्म को छोड़ देते हैं। बलवान् लोग कांटे में मछलियों को पकड़ने के समान दुर्बलों को सताने लगते हैं। सतामनुग्रहो नित्यमसतां निग्रहस्तथा। एष धर्मः स्मृतो राज्ञामर्थश्चामित्रपीडनात्॥ 17॥ राजा को यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि सज्जनों पर अनुग्रह करना, दुष्टों का निग्रह करना तथा शत्रुओं का वध करना न केवल उनका धर्म है, अपितु राज्य का आर्थिक विकास भी राजा के इसी कर्तव्यपालन पर आधृत है। न लिप्यते यथा वह्निर्दहन्शश्वदपि प्रजाः। न लिप्यते तथा राजा दण्डं दण्ड्येषु पातयन्॥ 18॥ जिस प्रकार असंख्य भवनों को दग्ध करने पर भी अग्नि की न तो कोई निन्दा करता है और न ही कोई उसके बहिष्कार की कभी सोचता है, उसी प्रकार दुष्टों को दण्ड देने वाला राजा भी, न निन्दा का पात्र बनता है और न ही पाप का भागी होता है। प्रज्ञा तेजः पार्थिवानां सा च वाचि प्रतिष्ठिता। ते यद्ब्रूयुरसत्सद्वा स धर्मो व्यवहारिणाम्॥ 19॥ राजा के द्वारा दिये जाने वाले आदेशों-निर्देशों में ही उसकी बुद्धि और तेज के दर्शन होते हैं। जिस राजा के आदेश का प्रजा श्रद्धापूर्वक आंख मूंदकर पालन करती है, वही राजा बुद्धिमान् और प्रतापी माना जाता है। राजेति सञ्चरत्येष भूमौ साक्षात् सहस्रदृक्। न तस्याज्ञामतिक्रम्य सन्तिष्ठेरन् प्रजाः क्वचित्॥ 20॥ राजा इस पृथ्वी पर साक्षात् सहस्राक्ष (इन्द्र) है, वह अपने हजारों नेत्रों से सर्वत्र सञ्चार करता और सभी कुछ देखता है। उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने से तो प्रजाजनों में शान्ति स्थापित हो ही नहीं सकती। नारदस्मृति / 255

रक्षाधिकारादीशत्वाद् भूतानुग्रहदर्शनात्। यदेव कुरुते राजा तत्प्रमाणमिति स्थितिः ॥ 21 ॥ असहायों-दुर्बलों के जीवन, सम्मान और वैभव आदि की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दूसरों को दण्ड देने आदि के रूप में राजा के द्वारा किये सभी कार्यों को न्यायसंगत व उचित ठहराकर प्रमाण-रूप में ही ग्रहण किया जाता है। निर्बलोऽपि यथा स्त्रीणां पूज्य एव पतिः सदा। प्रजानां विगुणोऽप्येवं पूज्य एव प्रजापतिः ॥ 22 ॥ जिस प्रकार स्त्री के लिए शारीरिक अथवा मानसिक रूप से दुर्बल एवं अल्पबुद्धि होने पर भी पति पूज्य होता है, उसी प्रकार राजा में किसी दोष के दृष्टिगोचर होने पर भी वह प्रजाजनों के लिए आराधनीय होता है। राज्ञामाज्ञाभयाद् यस्मान्नच्यवेरन् पथः प्रजाः। व्यवहारादतो ज्ञेयं संवृतं राजशासनम् ॥ 23 ॥ राजा की आज्ञा के अतिक्रमण से जुड़े दण्ड-भोग के भय से ही प्रजाजन न्याय का परित्याग और अन्याय का अभिनन्दन नहीं करते। इसी सन्दर्भ में राजा की आज्ञा--सरकारी आदेश-निर्देश-के पालन को प्रजाजनों के लिए सर्वोत्तम धर्म तथा प्राथमिक कर्तव्य कर्म मानना पड़ता है। स्थित्यर्थं पृथिवीपालैश्चरित्रविषयाः कृताः। चरित्रेभ्योऽस्य तत्प्राहुर्गरीयो राजशासनम् ॥ 24 ॥ महाराज मनु द्वारा प्रस्तुत धर्म के लक्षण- श्रुति, स्मृति, सदाचार तथा निजी विवेक के सन्दर्भ में देवर्षि नारद का कथन है कि यद्यपि वेद, शास्त्र, महापुरुषों का आदर्श तथा व्यक्ति का अपना विवेक आदि भी न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित तथा सत्य असत्य के निर्णायक तत्त्व माने गये हैं, पुनरपि राजा द्वारा विशेषज्ञों से परामर्श के उपरान्त निर्धारित नियम (राजाज्ञा) का महत्त्व सर्वाधिक है। तपः क्रीताः प्रजा राज्ञा प्रभुर्ह्यासां ततो नृपः। ततस्तद्वचसि स्थेयं वार्ता चासां तदाश्रया ॥ 25 ॥ राजा को पूर्वजन्मों की तपस्या के पुरस्कार स्वरूप ही प्रजाओं पर शासन करने का अधिकार प्राप्त होता है। राजा द्वारा संरक्षण प्राप्त होने से प्रजा का व्यापार, कृषि कर्म तथा वाणिज्य आदि सही ढंग से चलते हैं, अर्थात् सुख, शान्ति और समृद्धि का पथ प्रशस्त होता है। अतः राजा के अनुशासन में रहना व उसकी आज्ञा का पालन करना प्रजा के अपने हित में है। पञ्च रूपाणि राजानो धारयन्त्यमितौ जसः। अग्नेरिन्द्रस्य सोमस्य यमस्य धनदस्य च ॥ 26 ॥ राजा पांच देवों-अग्नि, इन्द्र, सोम, यम तथा कुबेर-का अंशधारी होने से 256 / नारदस्मृति

पृथिवी पर इनका प्रतिनिधि होता है और इसीलिए उसका तेज अपरिमित होता है। कारणादनिमित्तं वा यदा क्रोधवशं गतः। प्रजा दहति भूपालस्तदाग्निरभिधीयते ॥ २७ ॥ अकारण क्रुद्ध होकर निर्दोष, निरपराध एवं असहाय प्रजाजनों को पीड़ित करने वाला राजा अग्नि-रूप कहा जाता है। यदा तेजः समालम्ब्य विजिगीषुरुदायुधः । अभियाति परान् राजा तदेन्द्रः स उदाहृतः ॥ २८ ॥ अपनी तेजस्विता का स्मरण कर और आयुधों से सन्नद्ध होकर शत्रुओं के दमन करने को कटिबद्ध राजा इन्द्र-रूप कहलाता है। विगतक्रोधसन्तापो हृष्टरूपो यदा नृपः। प्रजानां दर्शनं याति सोम इत्युच्यते तदा ॥ २९ ॥ क्रोध, शोक और सन्ताप आदि का परित्याग कर प्रसन्नचित्त होकर उल्लसित भाव से प्रजाजनों से भेंट करने वाला राजा सोम-रूप कहलाता है। धर्मासनगतः श्रीमान्दण्डं धत्ते यदा नृपः। समः सर्वेषु भूतेषु तदा वैवस्वतः स्मृतः ॥ ३० ॥ न्यायाधीश के रूप में न्यायपीठ पर विराजमान होकर तटस्थ भाव से विवादों को सुनने और वास्तविक अपराधी को दण्ड देने के लिए उद्यत तथा सभी प्रजाजनों के प्रति समदृष्टि रखने वाला राजा विवस्वान् (यम) कहलाता है। यदा त्वर्थिगुरुप्राज्ञभृत्यादीन् पृथिवीपतिः । अनुगृह्णाति दानेन तदा स धनदः स्मृतः ॥ ३१ ॥ आवश्यकता वालों, अभावग्रस्तों, भृत्यों, याचकों, गुरुजनों और विद्वानों को दान-मान आदि देकर अनुग्रह प्रकट करने वाला राजा कुबेर-रूप होता है। तस्मात्तं नावजानीयान्नाक्रोशेश्च विशेषतः । आज्ञायां चास्य तिष्ठेत् मृत्युः स्यात्तद्व्यतिक्रमात् ॥ ३२ ॥ इस प्रकार पांच देवों के अंशधारी पांच रूपों वाले राजा की आज्ञा का पालन करना प्रजाजनों को अपने लिए अनिवार्य धर्म मानना चाहिए। राजाज्ञा के अतिक्रमण का दण्ड तो निश्चित रूप से मृत्यु ही है। तस्य धर्मः प्रजारक्षा वृद्धप्राज्ञोपसेवनम्। दर्शनं व्यवहाराणामुत्थानं च स्वकर्मसु ॥ ३३ ॥ राजा अनेक रूपों में प्रजा का बहुत उपकार करता है—

  1. वह प्रजा के प्राण, सम्मान और सम्पत्ति आदि की रक्षा करता है। राजा जागता है, तभी प्रजाजन निश्चिन्त होकर सोते और अपना व्यापार-धन्धा करते हैं।
  2. राजा साधनहीन वृद्धों और विद्वानों को आर्थिक अनुदान प्रदान करके नारदस्मृति / 257

उनका पालन-पोषण करता है। 3. राजा ही प्रजाजनों में उठने वाले विवादों (व्यवहारों) को सुनता है, सत्य-असत्य का निर्णय करता है तथा अपराधी को दण्ड देता है। 4. राजा ही प्रजाजनों की आर्थिक समृद्धि के लिए विविध योजनाएं बनाता है और उन योजनाओं की पूर्ति के लिए साधन जुटाता है तथा धन की व्यवस्था करता है। ब्राह्मणानुपसेवेत नित्यं राजा समाहितः। संयुक्तं ब्राह्मणैः क्षात्रं मूलं लोकाभिवृद्धये॥ ३४॥ राजा को ब्राह्मणों के सम्मान की रक्षा के लिए नित्य-प्रति अत्यन्त सावधान रहना चाहिए। उसे यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि ब्राह्मणों की कृपा बने रहने पर ही राजा अपने क्षत्रिय-धर्म का सफलतापूर्वक निर्वाह कर सकता है। ब्राह्मणों के रुष्ट होने पर तो राजा के लिए अपनी सत्ता को बचा पाना ही सम्भव नहीं होता। ब्राह्मणस्यापरीहारो राजन्यासनमग्रतः। प्रथमं दर्शनं प्रातः सर्वेभ्यश्चाभिवादनम्॥ ३५॥ विचारक के रूप में न्यायपीठ पर बैठते समय राजा को ब्राह्मणों—बुद्धिजीवी शास्त्रज्ञ विद्वानों—को अपने से ऊंचे आसन पर बिठाना चाहिए। इसके अतिरिक्त राजा को प्रतिदिन प्रातःकाल राज्यसभा में जाने से पूर्व ब्राह्मणों का दर्शन, उन्हें प्रणाम करना और उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। अग्रं नवभ्यः सप्तभ्यः मार्गदानं च गच्छतः। भैक्षहेतोः परागारे प्रवेशस्त्वनिवारितः॥ ३६॥ राजमार्ग, नौकायन तथा अन्य वाहन मार्गों पर संकरा मार्ग आ जाने पर ब्राह्मणों—भले ही वह सात हों अथवा नौ, अर्थात् अधिक संख्या में ही क्यों न हों और इसके लिए दूसरे यात्रियों को असुविधा, कष्ट और विलम्ब ही क्यों न होता हो—को पहले जाने देना चाहिए। इसके अतिरिक्त भिक्षा मांगने वाले ब्राह्मण को किसी भी घर में प्रवेश करने से नहीं रोकना चाहिए। समित्पुष्पोदकादानेष्वस्तेयं स्वपरिग्रहम्। अनपेक्षः परमेभ्यः सम्भाषणञ्च परस्त्रिया॥ ३७॥ अपने यज्ञ-भोग तथा पूजा-पाठ के लिए समिधाएं, पुष्प और जल आदि इनके स्वामी से बिना पूछे अपने आप लेने वाले ब्राह्मण पर चोरी का आरोप नहीं लगाया जा सकता। इसी प्रकार परमुखापेक्षी न बनने की इच्छा से पर स्त्री से भाषण करने वाले ब्राह्मण की विरोधियों द्वारा भी निन्दा नहीं की जा सकती; क्योंकि आचारनिष्ठ और चरित्रवान् होना तो ब्राह्मणत्व का प्रथम लक्षण है। 258 / नारदस्मृति

नदीष्ववेतनस्तारः पूर्वमुत्तारणं तथा। तरेष्वशुल्कदानं च वाणिज्यायां भवेत् स्थितिः ॥ ३८ ॥ नदी पार कराने पर ब्राह्मण से शुल्क नहीं लेना चाहिए और उसे नौका में सबसे पहले उत्तम स्थान पर बिठाना और सबसे पहले उतारना चाहिए। ब्राह्मण द्वारा वाणिज्य व्यापार की वस्तुओं की ख़रीद पर भी उससे सीमा-शुल्क तथा बिक्रीकर आदि वसूल नहीं करने चाहिए। वर्तमानोऽध्वनि श्रान्तो गृह्णान्नशनः स्वयम्। ब्राह्मणो नापराधी स्याद् द्वाविक्षू द्वे च मूलके ॥ ३९ ॥ मार्ग चलते और थकने से विश्राम करते ब्राह्मण द्वारा क्षुधा-निवृत्ति के लिए समीपस्थ खेत से फल, मूल, कन्द आदि ले लेने पर उसे अपराधी नहीं मानना चाहिए। नाभिशस्तान्न पतितान्न द्विषो नापि नास्तिकात्। नावसन्नान्निर्मिमित्तं दातारं न प्रपीड़य च ॥ ४० ॥ राजा को निम्नरोक्त व्यक्तियों को पीड़ित एवं भयभीत नहीं करना चाहिए—

  1. लोक में निन्दित व अपने चरित्र के कारण दूषित।
  2. पतित, अर्थात् भ्रष्ट आचरण के कारण जाति से बहिष्कृत।
  3. घोषित एवं सर्वजनविदित शत्रु।
  4. नास्तिक, अर्थात् वेदों की अपौरुषेयता तथा ईश्वर की सत्ता में विश्वास न रखने वाला।
  5. अवसन्न, अर्थात् एक के बाद दूसरे संकट, शोक और दुःखादि का शिकार बना व्यक्ति तथा
  6. विशेष निमित्त के बिना, अर्थात् प्रतिदिन दान करने वाला उदार मनस्वी। इन लोगों पर लगे सच्चे-झूठे, छोटे-मोटे अपराध के लिए इन्हें पीड़ित करने से राजा कलंकित हो जाता है। अर्थिनां भूरिभावाच्च देयत्वाच्च महात्मनाम्। श्रेयान् परिग्रहो राज्ञां सर्वेषां ब्राह्मणादृते ॥ ४१ ॥ राजा को याचकों को प्रतिदिन दान देने वाले उदार धनिकों, महात्माओं तथा ब्राह्मणों को छोड़कर शेष सभी प्रजाजनों से कर वसूल करने और धन लेने का पूरा- पूरा अधिकार है। ब्राह्मणश्चैव राजा च द्वावप्येतौ दृढव्रतौ। नानयोरन्तरं किञ्चित् प्रजा धर्मेण रक्षतोः ॥ ४२ ॥ अपने अपने धर्म और कर्तव्य का दृढ़ता से पालन करने वाले तथा निर्दिष्ट मार्ग से कभी च्युत न होने वाले दोनों—राजा और ब्राह्मण—अभिनन्दनीय होते हैं। इन्हीं दोनों पर प्रजा की रक्षा का और प्रजा को समुचित मार्ग दिखाने का दायित्व नारदस्मृति / 259

होता है। अपने इस दायित्व को निभाने वाले ये दोनों ही श्रेष्ठ होते हैं। धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य रक्षार्थं शासतोऽशुचीन्। मेध्यमेव धनं प्राहुस्तीक्ष्णस्यापि महीपतेः ॥ 43 ॥ धर्मनिष्ठ, कर्तव्यपालक, दीन-दुखियों की सेवा-सहायता के प्रति समर्पित, दुर्बलों-असहायों के रक्षक तथा दुष्ट-अपराधियों का दमन करने वाले राजा के धन जुटाने व कर वसूल करने में उग्र होने पर भी उसका धन पवित्र होता है। यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः। स पर्यायेण यातीमान्नरकानेकविंशतिम् ॥ 44 ॥ लोभवश शास्त्र-मार्ग को छोड़कर राजा से छल-कपट, द्रोह एवं मक्कारी करने वाला दुष्ट व्यक्ति क्रमानुसार इक्कीस नरकों की यातना को झेलता है। शुचीनामशुचीनां च सन्निपातो यथाम्भसाम्। समुद्रे समतां याति तद्वद्राज्ञो धनागमः॥ 45 ॥ जिस प्रकार पवित्र अथवा दूषित जल समुद्र में गिरकर समुद्र का भाग, अर्थात् पवित्र बन जाता है, उसी प्रकार सज्जन से अथवा दुर्जन से, पापकर्मा व्याध से अथवा वधिक से वसूल किया गया धन राजकोष में जाते ही पवित्र हो जाता है। टिप्पणी—लगता है कि नारदस्मृति की रचनाकाल तक गंगा का महत्त्व स्थापित नहीं हो पाया था, अन्यथा हिन्दी के कृष्णभक्त कवि सूरदास की पंक्तियां 'नारदस्मृति' में प्रतिध्वनित होतीं— प्रभु जी मेरे औगुन चित्त न धरो। समदरसी प्रभु नाम तिहारो चाहो तो पार करो ॥ अपने कथन का समर्थन सूरदास इन शब्दों में करते हैं— इक नदी एक नार (नाला) कहावत, मैला ही नीर भर्यो। गंग में मिलि दोउ गंग भयो है, भेद कछू न रह्यो॥ यथा ह्यग्नौ स्थितं दीप्ते शुद्धिमायाति काञ्चनम्। एवं धनागमाः सर्वे शुद्धिमायान्ति राजसु ॥ 46 ॥ जिस प्रकार अग्नि में डालने पर स्वर्ण शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार राजकोष में आने पर सभी प्रकार का (काला अथवा सफ़ेद) धन शुद्ध-पवित्र हो जाता है। य एव कश्चित् स्वद्रव्यं ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति। तद्राज्ञाप्यनुमन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ॥ 47 ॥ ब्राह्मणों को दान-पुण्य करने वाले उदार धनिकों को इसके लिए राजा से पूर्व अनुमति लेनी चाहिए और राजा को इसकी सहर्ष स्वीकृति देनी चाहिए—यही सनातन व्यवस्था है। टिप्पणी—आज की भाषा में, यदि धनिक अपने काले धन को ब्राह्मणों को 260 / नारदस्मृति

दान आदि देने के रूप में सफ़ेद करना चाहता है और कर में छूट पाने का इच्छुक है, तो उसे प्रशासन द्वारा दानियों को आयकर में छूट की अनुमति-प्राप्त संस्थाओं से सम्पर्क स्थापित करना चाहिए। अन्यप्रकारादुचिताद् भूमेः षड्भागसंज्ञितात्। बलिः स तस्य विहितः प्रजापालनवेतनम्॥ 48 ॥ भूमि की उपज का षष्ठांश (1/6वां भाग) भूमि-कर के रूप में राजा को चुकाना किसानों-भू-स्वामियों का कर्तव्य-कर्म है। वस्तुतः प्रजापालन करने में तथा राजा की निजी आवश्यकताओं की पूर्ति पर व्यय होने वाले धन की पूर्ति प्रजा को ही तो करनी होती है। शक्यं तत् पुनराहतुं यन्न ब्राह्मणसात्कृतम्। ब्राह्मणेभ्यस्तु यद्दत्तं न तस्याहरणं पुनः॥ 49 ॥ ब्राह्मणों को देने का संकल्प करके उन्हें न देने वालों से संकल्पित धन ब्राह्मणों को दिलाया तो जा सकता है, परन्तु एक बार ब्राह्मणों को दिया गया धन किसी भी स्थिति में वापस नहीं लिया जा सकता। दानमध्ययनं यज्ञः कर्मास्योक्तं त्रिलक्षणम्। याजनाध्यापने वृत्तिस्तृतीयाश्च प्रतिग्रहः॥ 50 ॥ वेदों का अध्ययन, यज्ञ-यागादि सम्पन्न करना तथा दान देना ब्राह्मण के नित्यकर्म हैं। इसमें इच्छा-अनिच्छा का प्रश्न ही नहीं उठता। ये तीनों तो अनिवार्य रूप से ब्राह्मण को प्रतिदिन करने ही हैं। हां, यज्ञ करना, विद्या-अध्यापन तथा दान लेना—ये तीनों उसकी वृत्ति से जुड़े हैं। इन तीनों को अपनी सुविधा, आवश्यकता और रुचि के अनुरूप अपनाने-न अपनाने को वह पूर्ण स्वतन्त्र है। स्वधर्मे ब्राह्मणस्तिष्ठेद्वृत्तिमाहारयेन्नृपात्। नासद्भ्यः परिगृह्णीयाद्धर्णेभ्यो नियमे सति॥ 51 ॥ यदि अपने व्रत-नियम का पालन करने वाले आचारवान् ब्राह्मण का सज्जनों के दान आदि से निर्वाह नहीं हो पाता, तो उसे राजा से वृत्ति पाने के लिए प्रयास करना चाहिए, परन्तु किसी असद्वृत्ति वाले—काला धन्धा करने वाले—व्यक्ति से कभी धन ग्रहण नहीं करना चाहिए। अभिप्राय यह है कि ब्राह्मण को केवल धर्म और न्याय से अर्जित धन का ही दान लेना चाहिए। जीवन-निर्वाह के लिए ऐसे धन के अपर्याप्त होने पर नौकरी कर लेनी चाहिए, परन्तु किसी भी रूप में दूषित धन को ग्रहण करने के लिए उद्यत नहीं होना चाहिए। अशुचिर्वचनाद् यस्य शुचिर्भवति मानवः। शुचिश्चैवाशुचिः सम्यक् कथं राजा न दैवतम्॥ 52 ॥ नारदस्मृति / 261

जिस राजा के कथन पर अपवित्र व्यक्ति पवित्र और पवित्र व्यक्ति अपवित्र माना जाता है, ऐसे राजा को भला देवता कैसे नहीं मानना चाहिए। टिप्पणी—राजा जिसे सम्मानित पुरस्कृत करता है, लोक और समाज उसे यशस्वी और प्रतिष्ठित मानकर सिर आंखों पर बिठाता है। इसके विपरीत प्रशासन द्वारा अपमानित अथवा दण्डित व्यक्ति समाज में मुख दिखाने के योग्य नहीं रहता। समाज को राजा की कार्यवाही पर विश्वास रहता है। इस प्रकार प्रजाजनों के सम्मान-अपमान, यश-अपयश के आधारभूत राजा को देवस्वरूप माना जाता है। 2. आज तो 'राजा' की संस्था नेपाल, भूटान आदि तथा दो-चार मुस्लिम देशों में ही जीवित है। अधिकांश देशों ने तो अन्यान्य शासन-प्रणालियां अपना ली हैं। विदुर्य एव देवत्वं राज्ञो ह्यमिततेजसः। तस्य ते प्रतिगृह्णन्तो न लिप्यन्ते कथञ्चन॥ 53 ॥ राजा को अमित तेजस्वी तथा देव-स्वरूप मानने वाले व्यक्ति उसकी अवज्ञा करने अथवा उसे धोखा देने की कभी कल्पना तक नहीं करते। लोकेऽस्मिन्मङ्गलान्यष्टौ ब्राह्मणो गौर्हुताशनः। हिरण्यं सर्पिरादित्य आपो राजा तथाष्टमः ॥ 54 ॥ इस संसार में निम्नोक्त आठ द्रव्यों को अत्यन्त पवित्र, पूज्य एवं मङ्गलसूचक माना जाता है—1. ब्राह्मण, 2. गाय, 3. अग्नि, 4. सुवर्ण, 5. घृत, 6. सूर्य, 7. जल तथा 8. राजा। इन आठों की अवज्ञा घोर पाप है। एतानि सततं पश्येन्नमस्येदर्चयेत् स्वयम्। प्रदक्षिणं च कुर्वीत यथास्यायुः प्रवर्धते ॥ 55 ॥ अपनी आयु-वृद्धि, सुख-समृद्धि तथा स्वास्थ्य-शान्ति को सुनिश्चित करने के लिए इन आठों का नित्यप्रति दर्शन, अर्चन व नमन करने के अतिरिक्त इनकी प्रदक्षिणा, अर्थात् पूजन भी करना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का सप्तदश प्रकरण समाप्त ॥ 262 / नारदस्मृति

  1. परिशिष्ट भांति-भांति के तस्करों के प्रकार द्विविधास्तस्करा ज्ञेयाः परद्रव्यापहारिणः । प्रकाशाश्चाप्रकाशाश्च तान् विद्यादात्मवान्नृपः ॥ 1 ॥ दूसरे के द्रव्य का अपहरण करने वाले तस्कर—चोर, डाकू—कहलाते हैं। विवेकशील राजा को जान लेना चाहिए कि ये तस्कर दो प्रकार के होते हैं—1. गुप्त अथवा प्रच्छन्न तस्कर तथा 2. प्रकाश-तस्कर, अर्थात् सर्वजनविदित। प्रकाशवञ्चकास्ते तु कूटमानतुलाश्रिताः। उत्कोचकाः साहिसकाः कितवाः पण्ययोषितः ॥ 2 ॥ प्रकाश-तस्करों के कुछ रूप-भेद इस प्रकार हैं—
  2. माप-तौल में छल-कपट द्वारा न्यूनाधिक करना।
  3. किसी कार्य को पूरा करने-कराने के लिए घूस लेना।
  4. किसी उचित-अनुचित कार्य को करने के लिए दूसरे को विवश करना, अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना, साहसिक पग उठाना, अर्थात् वध करने व अंग भंग करने-जैसी धमकी देकर काम निकालना।
  5. द्यूत-क्रीड़ा में लिप्त होना तथा हेरा-फेरी करना।
  6. वेश्या—सम्पन्न युवकों को चरित्रभ्रष्ट करने वाली—नगरवधू।
  7. अपनी बौद्धिक चातुरी से नकली वस्तु को असली बताकर बेचना तथा
  8. भोले-भाले लोगों के हितचिन्तक बनकर उन्हें ठगना, मूर्ख बनाना और इस प्रकार अपनी आजीविका चलाना। प्रतिरूपकराश्चैव मङ्गलादेशवृत्तयः। इत्येवमादयो ज्ञेयाः प्रकाशलोकतस्कराः ॥ 3 ॥ निम्नोक्त ढंग से चोरी-हेराफेरी करने वाले धूर्त व्यक्ति प्रच्छन्न-तस्कर (छिपे चोर-डाकू—गुप्त रूप से काम-धन्धा करने वाले) कहलाते हैं।
  9. स्वयं घर, दुकान आदि के बाहर रहकर, दूसरों को भीतर घुसाकर अथवा दूसरों को बाहर रखवाली के लिए खड़ा कर स्वयं भीतर प्रविष्ट होकर चोरी करना।
  10. स्वामी की अनुपस्थिति में अथवा उसका ध्यान बंटाकर अथवा उसकी नारदस्मृति / 263