नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर-'जे तू बाम्हन बाम्हनि जाया, और बाट ते काहे न आया।' नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः। निक्षेपोऽयोमयः शङ्कु ज्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः॥ 23॥ द्विजातियों—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—के नाम और जाति का अवज्ञापूर्वक उच्चारण करने वाले शूद्र के मुख में अग्नि में तपे दस अंगुल लम्बे लौहदण्ड को घुसेड़ देना चाहिए। **टिप्पणी—**आज भी किसी सिख को 'सिखड़ा' कहना अपराध माना जाता है। धर्मोपदेशं दर्पेण द्विजानामस्य कुर्वतः। तप्तमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः॥ 24॥ राजा को अपनी विद्वत्ता, प्रतिभा अथवा योग्यता के अहंकार से ग्रस्त होकर द्विजातियों—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—को ज्ञानोपदेश देने का दुस्साहस करने वाले शूद्र के मुख में और कानों में उबलता हुआ तेल डाल देना चाहिए। येनाङ्गेनावरोवर्णो ब्राह्मणस्यापराध्नुयात्। तदङ्गं तस्यच्छेत्तव्यमेवं शुद्धिमवाप्नुयात्॥ 25॥ शूद्र अपने जिस किसी अंग—हाथ, पैर, मुख आदि से—ब्राह्मण पर प्रहार करता है, उसके उस अंग को काट देना ही उसका दण्ड है, यही उसका प्रायश्चित्त है। इसी से उसकी शुद्धि होती है। उससे जुर्माना (अर्थ-दण्ड) वसूल करने का कोई औचित्य ही नहीं है। सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यावकृष्टजः । कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचौ वास्यावकर्तयेत्॥ 26॥ निम्न वर्ण के व्यक्तियों द्वारा उच्च वर्ण के व्यक्तियों के साथ—शूद्रों द्वारा वैश्यों के साथ, वैश्यों द्वारा क्षत्रियों-ब्राह्मणों के साथ आदि—बैठने की चेष्टा करने पर अर्थात् अपने को उनके बराबर समझने पर राजा को जलती लौहशलाका से उनकी कमर को दागकर और उनके दोनों पाश्र्वों को काटकर उन्हें अपने देश से निर्वासित कर देना चाहिए। अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः। अवमूत्रयतः शिश्नमेवशब्द्यतो गुदम्॥ 27॥ राजा को अहंकारवश उच्च वर्ण के सभ्य पुरुषों पर थूकने वाले निम्न वर्ण- जाति वाले लोगों के दोनों होठों को और मूत्र फेंकने वालों के लिंग को काट देना चाहिए। उच्च वर्ण के लोगों के साथ मैथुन करने वालों की गुदा में तप्त लौहदण्ड घुसेड़ देना चाहिए। केशेषु गृह्णतो हस्तौ छेदयेदविचारयन्। पादयोर्दाढिकायां तु ग्रीवायां वृषणेषु च॥ 28॥ 248 / नारदस्मृति