नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजा को बिना सोच-विचार किये, तत्काल उच्च वर्ण-जाति के लोगों की मूंछों, दाढ़ी, ग्रीवा, बालों, पैरों, अण्डकोषों तथा दाढ़ी आदि में हाथ डालने (पकड़ने) वाले शूद्रादि निम्न जाति के लोगों के हाथों को काट डालना चाहिए। त्वक्छेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः। मांसभेत्ता तु षण्निष्कान् प्रवास्यस्त्वस्थिभेदकः ॥ 29 ॥ राजा को निम्न वर्ण-जाति के लोगों द्वारा उच्च वर्ण-जाति के लोगों का चर्मच्छेदन करने तथा रक्त बहाने पर अपराधियों से सौ पण तथा मांस-छेदन करने पर छह कनिष्क दण्ड के रूप में वसूल करने चाहिए। उच्च वर्ण-जाति वालों की हड्डी-पसली तोड़ने वाले निम्न वर्ण-जाति के लोगों को देशनिर्वासन का दण्ड देना चाहिए। उपकृश्य तु राजानं कर्मणि स्वे व्यवस्थितम्। जिह्वाछेदाद्द्बवेच्छुद्धः सर्वस्वहरणेन वा ॥ 30 ॥ अपने कर्तव्य का भली-भांति निर्वाह करने वाले राजा की निन्दा करने वाले अथवा उसके विरुद्ध अण्टशण्ट बकने वाले की जिह्वा काट दी जाती है और उसकी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली जाती है। राजनि प्रहरेद्यस्तु कृतागस्यपि दुर्मतिः। शूले तमग्नौ विपचेद् ब्रह्महत्याशताधिकम् ॥ 31 ॥ अपराध करने वाले राजा पर प्रहार करने वाले दुर्बुद्धि नीच व्यक्ति को या तो जीवित आग में जला देना चाहिए या फिर फांसी के फन्दे पर लटका देना चाहिए; क्योंकि राजा पर प्रहार सैकड़ों ब्रह्महत्याओं से भी कहीं अधिक भारी और निन्दनीय पापकृत्य है। पुत्रापराधे न पिता नाश्वे न शुनि दण्डभाक्। न मर्कटे च तत्स्वामी तेनैव प्रहितो न चेत् ॥ 32 ॥ पिता द्वारा प्रेरणा-प्रोत्साहन पाये बिना, पुत्र द्वारा किये अपराध के लिए पिता को दण्डित नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार स्वामी के किसी प्रकार से लिप्त अथवा योग देने वाला न होने पर उसके पालतू पशु-अश्व, कुत्ता तथा वानर आदि-द्वारा किये गये उत्पात के लिए स्वामी को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। ॥ चतुर्थ अध्याय का पञ्चदश प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 249