नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजा के द्वारा धर्म की स्थापना के लिए सावधान न रहने पर ब्राह्मण आदि चारों वर्णों के लोग, न केवल अपने नियत-धर्म के पालन में शिथिल एवं उदासीन हो जाते हैं, अपितु 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' न्याय के अनुसार जंगल का राज्य स्थापित हो जाता है और फिर बड़ी मछली छोटी मछली को निगलने में देर नहीं करती। स्वकर्म जह्याद्वैश्यस्तु शूद्रः सर्वं विशेषयेत्। राजानश्चेन्नाकरिष्यन् प्रजानां दण्डधारणम्॥ 16॥ राजा द्वारा प्रजाजनों को धर्मनिष्ठ एवं कर्तव्यपरायण बनाने के प्रति ढील बरतने पर तो वैश्य अपने व्यवसाय को और शूद्र द्विजों की सेवा-कर्म को छोड़ देते हैं। बलवान् लोग कांटे में मछलियों को पकड़ने के समान दुर्बलों को सताने लगते हैं। सतामनुग्रहो नित्यमसतां निग्रहस्तथा। एष धर्मः स्मृतो राज्ञामर्थश्चामित्रपीडनात्॥ 17॥ राजा को यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि सज्जनों पर अनुग्रह करना, दुष्टों का निग्रह करना तथा शत्रुओं का वध करना न केवल उनका धर्म है, अपितु राज्य का आर्थिक विकास भी राजा के इसी कर्तव्यपालन पर आधृत है। न लिप्यते यथा वह्निर्दहन्शश्वदपि प्रजाः। न लिप्यते तथा राजा दण्डं दण्ड्येषु पातयन्॥ 18॥ जिस प्रकार असंख्य भवनों को दग्ध करने पर भी अग्नि की न तो कोई निन्दा करता है और न ही कोई उसके बहिष्कार की कभी सोचता है, उसी प्रकार दुष्टों को दण्ड देने वाला राजा भी, न निन्दा का पात्र बनता है और न ही पाप का भागी होता है। प्रज्ञा तेजः पार्थिवानां सा च वाचि प्रतिष्ठिता। ते यद्ब्रूयुरसत्सद्वा स धर्मो व्यवहारिणाम्॥ 19॥ राजा के द्वारा दिये जाने वाले आदेशों-निर्देशों में ही उसकी बुद्धि और तेज के दर्शन होते हैं। जिस राजा के आदेश का प्रजा श्रद्धापूर्वक आंख मूंदकर पालन करती है, वही राजा बुद्धिमान् और प्रतापी माना जाता है। राजेति सञ्चरत्येष भूमौ साक्षात् सहस्रदृक्। न तस्याज्ञामतिक्रम्य सन्तिष्ठेरन् प्रजाः क्वचित्॥ 20॥ राजा इस पृथ्वी पर साक्षात् सहस्राक्ष (इन्द्र) है, वह अपने हजारों नेत्रों से सर्वत्र सञ्चार करता और सभी कुछ देखता है। उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने से तो प्रजाजनों में शान्ति स्थापित हो ही नहीं सकती। नारदस्मृति / 255