भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 304 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 258

रक्षाधिकारादीशत्वाद् भूतानुग्रहदर्शनात्। यदेव कुरुते राजा तत्प्रमाणमिति स्थितिः ॥ 21 ॥ असहायों-दुर्बलों के जीवन, सम्मान और वैभव आदि की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दूसरों को दण्ड देने आदि के रूप में राजा के द्वारा किये सभी कार्यों को न्यायसंगत व उचित ठहराकर प्रमाण-रूप में ही ग्रहण किया जाता है। निर्बलोऽपि यथा स्त्रीणां पूज्य एव पतिः सदा। प्रजानां विगुणोऽप्येवं पूज्य एव प्रजापतिः ॥ 22 ॥ जिस प्रकार स्त्री के लिए शारीरिक अथवा मानसिक रूप से दुर्बल एवं अल्पबुद्धि होने पर भी पति पूज्य होता है, उसी प्रकार राजा में किसी दोष के दृष्टिगोचर होने पर भी वह प्रजाजनों के लिए आराधनीय होता है। राज्ञामाज्ञाभयाद् यस्मान्नच्यवेरन् पथः प्रजाः। व्यवहारादतो ज्ञेयं संवृतं राजशासनम् ॥ 23 ॥ राजा की आज्ञा के अतिक्रमण से जुड़े दण्ड-भोग के भय से ही प्रजाजन न्याय का परित्याग और अन्याय का अभिनन्दन नहीं करते। इसी सन्दर्भ में राजा की आज्ञा--सरकारी आदेश-निर्देश-के पालन को प्रजाजनों के लिए सर्वोत्तम धर्म तथा प्राथमिक कर्तव्य कर्म मानना पड़ता है। स्थित्यर्थं पृथिवीपालैश्चरित्रविषयाः कृताः। चरित्रेभ्योऽस्य तत्प्राहुर्गरीयो राजशासनम् ॥ 24 ॥ महाराज मनु द्वारा प्रस्तुत धर्म के लक्षण- श्रुति, स्मृति, सदाचार तथा निजी विवेक के सन्दर्भ में देवर्षि नारद का कथन है कि यद्यपि वेद, शास्त्र, महापुरुषों का आदर्श तथा व्यक्ति का अपना विवेक आदि भी न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित तथा सत्य असत्य के निर्णायक तत्त्व माने गये हैं, पुनरपि राजा द्वारा विशेषज्ञों से परामर्श के उपरान्त निर्धारित नियम (राजाज्ञा) का महत्त्व सर्वाधिक है। तपः क्रीताः प्रजा राज्ञा प्रभुर्ह्यासां ततो नृपः। ततस्तद्वचसि स्थेयं वार्ता चासां तदाश्रया ॥ 25 ॥ राजा को पूर्वजन्मों की तपस्या के पुरस्कार स्वरूप ही प्रजाओं पर शासन करने का अधिकार प्राप्त होता है। राजा द्वारा संरक्षण प्राप्त होने से प्रजा का व्यापार, कृषि कर्म तथा वाणिज्य आदि सही ढंग से चलते हैं, अर्थात् सुख, शान्ति और समृद्धि का पथ प्रशस्त होता है। अतः राजा के अनुशासन में रहना व उसकी आज्ञा का पालन करना प्रजा के अपने हित में है। पञ्च रूपाणि राजानो धारयन्त्यमितौ जसः। अग्नेरिन्द्रस्य सोमस्य यमस्य धनदस्य च ॥ 26 ॥ राजा पांच देवों-अग्नि, इन्द्र, सोम, यम तथा कुबेर-का अंशधारी होने से 256 / नारदस्मृति

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 258, कुल 304 में से · BharatKosha