भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 304 में से

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पृष्ठ 256

आयुधान्यायुधीयानां शिल्पद्रव्याणि शिल्पिनम्। वेश्यास्त्रीणामलंकारं वाद्यातोद्यादि तद्विदाम्॥ 10 ॥ यच्च यस्योपकरणं येन जीवन्ति कारवः। सर्वस्वहरणेऽप्येतान्न राजा हर्तुमर्हति ॥ 11 ॥ गलत राह पर चल रहे लोगों को सन्मार्ग पर लाने के लिए दण्ड स्वरूप सुधारने का प्रयास करते राजा को लोगों से उनकी आजीविका के साधन कभी नहीं छीनने चाहिए। उदाहरणार्थ, शस्त्रों के व्यापारियों (आयुधजीवियों से उनके शस्त्र तथा शस्त्र-निर्माण में सहायक सामग्री, शिल्पियों से उनके शिल्प-कर्म में प्रयुक्त होने वाला सामान, वेश्याओं से उनके आभूषण तथा वादकों-गाने-बजाने से आजीविका चलाने वालों-से उनके वाद्ययन्त्र बाजा, ढोलक, तुरही तथा बांसुरी आदि। अनिर्देश्यावनिन्द्यौ च राजा ब्राह्मण एव च। दीप्तिमत्वाच्छुचित्वाच्च यदि न स्यात् पथश्च्युतः॥ 12 ॥ अपने कर्तव्य-कर्म के निर्वहण में कोताही न करने वाले तथा अत्यन्त सावधानी से प्रजा का रञ्जन-पालन करने वाले राजा की और विद्वान्, आचारनिष्ठ एवं वेदपाठी ब्राह्मण की निन्दा अथवा अवज्ञा कभी नहीं करनी चाहिए। वस्तुतः न्यायपूर्वक प्रजापालन से ही राजा तथा दीप्तिमान् व शुद्ध आचरण से ही ब्राह्मण पवित्र एवं पूज्य बनता है। राज्ञा प्रवर्तितान् धर्मान् यो नरो नानुपालयेत्। दण्ड्यः स पापो वध्यश्च कोपयन् राजशासनम्॥ 13 ॥ धर्मनिष्ठ राजा द्वारा प्रवर्तित नियमों का पालन न करके, उनकी अवज्ञा करने वाले प्रजाजन अपने को दण्डनीय एवं वध के योग्य बनाते हैं। वस्तुतः राजा के आदेशों का पालन न करना राजा को कुपित करने-जैसा पाप है और इसके लिए कोई भी दण्ड कम है। यदि राजा न सर्वेषां वर्णानां दण्डधारणम्। कुर्यात् पथो व्यपेतानां विनश्येयुरिमाः प्रजाः ॥ 14 ॥ पथभ्रष्टों के साथ कठोर व्यवहार करना तथा उन्हें दण्डित करना तो राजा की विवशता है; क्योंकि इस विषय में राजा के द्वारा थोड़ी-सी छूट दिये जाने का परिणाम भी अत्यन्त भयंकर होता है। बुराई अपना विस्तार इस प्रकार कर लेती है कि फिर उसे मिटाना कठिन हो जाता है। सुधार के लिए निरन्तर सावधान रहना पड़ता है। पतन का मार्ग तो सदैव खुला रहता है। ब्राह्मण्यं ब्राह्मणो जह्यात् क्षत्रियः क्षात्रमुत्सृजेत्। शूले मत्स्यानिवाश्नीयुर्दुर्बलान् बलवान्नरः ॥ 15 ॥ 254 / नारदस्मृति

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