नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 255, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहत्त्व कम नहीं हो जाता। ये विषय पर्याप्त महत्त्वपूर्ण होने के कारण विचारणीय हैं। अतः प्रकीर्णक प्रकरण में इन्हीं पर विचार किया जा रहा है। राजा त्ववहितः सर्वानाश्रमान् परिपालयेत्। उपायैः शास्त्रविहितैश्चतुर्भिः प्रकृतीस्तथा ॥ ५ ॥ राजा को अत्यन्त सावधान रहते हुए चारों वर्णों और चारों आश्रमों के लोगों से अपने लिए शास्त्रोक्त तथा लोक-परम्परा से प्रचलित विधानों-नियमों का पालन कराना चाहिए। इसके अतिरिक्त राजा को अपनी प्रजा के लोगों को राजनीति के चार-साम, दान, भेद तथा दण्ड-उपायों से विनीत एवं अनुशासित बनाना चाहिए। यो यो वर्णोऽपहीयेत यो च उद्रेकमाप्नुयात्। तं तं दृष्ट्वा स्वतो मार्गात् प्रच्युतं स्थापयेत् पथि ॥ ६ ॥ राजा को अपने वर्ण-धर्म से स्खलित होने वालों को तथा अपने वर्ण-धर्म से भिन्न आचरण करने वालों को कठोरतापूर्वक अपने वर्ण धर्म के आचरण में प्रवृत्त करना चाहिए। मार्ग-भ्रष्टों को सही मार्ग पर लाना राजा का धर्म-कर्म है, इसीलिए उसे दण्डित करने का अधिकार भी दिया गया है। अशास्त्रोक्तेषु चान्येषु पापयुक्तेषु कर्मसु। प्रसमीक्ष्यात्मना राजा दण्डं दण्ड्येषु पातयेत् ॥ ७ ॥ राजा को अशास्त्रोक्त अथवा शास्त्रविरुद्ध अथवा अन्यान्य पापकर्मों में लिप्त लोगों को समझा-बुझाकर न्याय-पथ पर लाना चाहिए। समझाने-बुझाने पर काम न चलने पर, राजा को दुष्टों को दण्डित करने में संकोच नहीं करना चाहिए। वस्तुतः दण्ड की उपयोगिता ही शास्त्रमर्यादा को व्यवस्थित करना है। श्रुतिस्मृतिविरुद्धं यद् भूतानामहितं च यत्। न तत् प्रवर्तयेद्राजा प्रवृत्तं च निवर्तयेत् ॥ ८ ॥ राजा को शास्त्र-विरुद्ध, लोकाचार-विरुद्ध अथवा परम्परा-विरुद्ध अथवा जन साधारण के हित के विरुद्ध आचरण करने वालों की किसी भी रूप में उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि थोड़ी सी छूट पाते ही दुष्ट कई बार इतने उद्धत हो जाते हैं कि उनका दमन करना एक समस्या बन जाती है। राजा को तो जनहितविरोधी गतिविधियों में लिप्त लोगों को ऐसी कठोरता से दबाना चाहिए कि दूसरे उसमें प्रवृत्त होने का साहस ही न जुटा सकें। न्यायापेतं यदन्येन राज्ञाऽज्ञानकृतं भवेत्। तदप्यन्यायविहितं पुनर्न्याये निवेशयेत् ॥ ९ ॥ राजा को जाने-अनजाने ग़लत पथ का अनुसरण करने वाले अपने प्रजाजनों को सभी सुलभ साधनों से न्याय-मार्ग पर लाना चाहिए। सत्य तो यह है कि इस ओर ध्यान न देने वाले राजा को राजा बनने अथवा कहलाने का अधिकार ही नहीं। नारदस्मृति / 253