भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 304 में से

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पृष्ठ 264

जिस राजा के कथन पर अपवित्र व्यक्ति पवित्र और पवित्र व्यक्ति अपवित्र माना जाता है, ऐसे राजा को भला देवता कैसे नहीं मानना चाहिए। टिप्पणी—राजा जिसे सम्मानित पुरस्कृत करता है, लोक और समाज उसे यशस्वी और प्रतिष्ठित मानकर सिर आंखों पर बिठाता है। इसके विपरीत प्रशासन द्वारा अपमानित अथवा दण्डित व्यक्ति समाज में मुख दिखाने के योग्य नहीं रहता। समाज को राजा की कार्यवाही पर विश्वास रहता है। इस प्रकार प्रजाजनों के सम्मान-अपमान, यश-अपयश के आधारभूत राजा को देवस्वरूप माना जाता है। 2. आज तो 'राजा' की संस्था नेपाल, भूटान आदि तथा दो-चार मुस्लिम देशों में ही जीवित है। अधिकांश देशों ने तो अन्यान्य शासन-प्रणालियां अपना ली हैं। विदुर्य एव देवत्वं राज्ञो ह्यमिततेजसः। तस्य ते प्रतिगृह्णन्तो न लिप्यन्ते कथञ्चन॥ 53 ॥ राजा को अमित तेजस्वी तथा देव-स्वरूप मानने वाले व्यक्ति उसकी अवज्ञा करने अथवा उसे धोखा देने की कभी कल्पना तक नहीं करते। लोकेऽस्मिन्मङ्गलान्यष्टौ ब्राह्मणो गौर्हुताशनः। हिरण्यं सर्पिरादित्य आपो राजा तथाष्टमः ॥ 54 ॥ इस संसार में निम्नोक्त आठ द्रव्यों को अत्यन्त पवित्र, पूज्य एवं मङ्गलसूचक माना जाता है—1. ब्राह्मण, 2. गाय, 3. अग्नि, 4. सुवर्ण, 5. घृत, 6. सूर्य, 7. जल तथा 8. राजा। इन आठों की अवज्ञा घोर पाप है। एतानि सततं पश्येन्नमस्येदर्चयेत् स्वयम्। प्रदक्षिणं च कुर्वीत यथास्यायुः प्रवर्धते ॥ 55 ॥ अपनी आयु-वृद्धि, सुख-समृद्धि तथा स्वास्थ्य-शान्ति को सुनिश्चित करने के लिए इन आठों का नित्यप्रति दर्शन, अर्चन व नमन करने के अतिरिक्त इनकी प्रदक्षिणा, अर्थात् पूजन भी करना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का सप्तदश प्रकरण समाप्त ॥ 262 / नारदस्मृति