नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंदान आदि देने के रूप में सफ़ेद करना चाहता है और कर में छूट पाने का इच्छुक है, तो उसे प्रशासन द्वारा दानियों को आयकर में छूट की अनुमति-प्राप्त संस्थाओं से सम्पर्क स्थापित करना चाहिए। अन्यप्रकारादुचिताद् भूमेः षड्भागसंज्ञितात्। बलिः स तस्य विहितः प्रजापालनवेतनम्॥ 48 ॥ भूमि की उपज का षष्ठांश (1/6वां भाग) भूमि-कर के रूप में राजा को चुकाना किसानों-भू-स्वामियों का कर्तव्य-कर्म है। वस्तुतः प्रजापालन करने में तथा राजा की निजी आवश्यकताओं की पूर्ति पर व्यय होने वाले धन की पूर्ति प्रजा को ही तो करनी होती है। शक्यं तत् पुनराहतुं यन्न ब्राह्मणसात्कृतम्। ब्राह्मणेभ्यस्तु यद्दत्तं न तस्याहरणं पुनः॥ 49 ॥ ब्राह्मणों को देने का संकल्प करके उन्हें न देने वालों से संकल्पित धन ब्राह्मणों को दिलाया तो जा सकता है, परन्तु एक बार ब्राह्मणों को दिया गया धन किसी भी स्थिति में वापस नहीं लिया जा सकता। दानमध्ययनं यज्ञः कर्मास्योक्तं त्रिलक्षणम्। याजनाध्यापने वृत्तिस्तृतीयाश्च प्रतिग्रहः॥ 50 ॥ वेदों का अध्ययन, यज्ञ-यागादि सम्पन्न करना तथा दान देना ब्राह्मण के नित्यकर्म हैं। इसमें इच्छा-अनिच्छा का प्रश्न ही नहीं उठता। ये तीनों तो अनिवार्य रूप से ब्राह्मण को प्रतिदिन करने ही हैं। हां, यज्ञ करना, विद्या-अध्यापन तथा दान लेना—ये तीनों उसकी वृत्ति से जुड़े हैं। इन तीनों को अपनी सुविधा, आवश्यकता और रुचि के अनुरूप अपनाने-न अपनाने को वह पूर्ण स्वतन्त्र है। स्वधर्मे ब्राह्मणस्तिष्ठेद्वृत्तिमाहारयेन्नृपात्। नासद्भ्यः परिगृह्णीयाद्धर्णेभ्यो नियमे सति॥ 51 ॥ यदि अपने व्रत-नियम का पालन करने वाले आचारवान् ब्राह्मण का सज्जनों के दान आदि से निर्वाह नहीं हो पाता, तो उसे राजा से वृत्ति पाने के लिए प्रयास करना चाहिए, परन्तु किसी असद्वृत्ति वाले—काला धन्धा करने वाले—व्यक्ति से कभी धन ग्रहण नहीं करना चाहिए। अभिप्राय यह है कि ब्राह्मण को केवल धर्म और न्याय से अर्जित धन का ही दान लेना चाहिए। जीवन-निर्वाह के लिए ऐसे धन के अपर्याप्त होने पर नौकरी कर लेनी चाहिए, परन्तु किसी भी रूप में दूषित धन को ग्रहण करने के लिए उद्यत नहीं होना चाहिए। अशुचिर्वचनाद् यस्य शुचिर्भवति मानवः। शुचिश्चैवाशुचिः सम्यक् कथं राजा न दैवतम्॥ 52 ॥ नारदस्मृति / 261