नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोता है। अपने इस दायित्व को निभाने वाले ये दोनों ही श्रेष्ठ होते हैं। धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य रक्षार्थं शासतोऽशुचीन्। मेध्यमेव धनं प्राहुस्तीक्ष्णस्यापि महीपतेः ॥ 43 ॥ धर्मनिष्ठ, कर्तव्यपालक, दीन-दुखियों की सेवा-सहायता के प्रति समर्पित, दुर्बलों-असहायों के रक्षक तथा दुष्ट-अपराधियों का दमन करने वाले राजा के धन जुटाने व कर वसूल करने में उग्र होने पर भी उसका धन पवित्र होता है। यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः। स पर्यायेण यातीमान्नरकानेकविंशतिम् ॥ 44 ॥ लोभवश शास्त्र-मार्ग को छोड़कर राजा से छल-कपट, द्रोह एवं मक्कारी करने वाला दुष्ट व्यक्ति क्रमानुसार इक्कीस नरकों की यातना को झेलता है। शुचीनामशुचीनां च सन्निपातो यथाम्भसाम्। समुद्रे समतां याति तद्वद्राज्ञो धनागमः॥ 45 ॥ जिस प्रकार पवित्र अथवा दूषित जल समुद्र में गिरकर समुद्र का भाग, अर्थात् पवित्र बन जाता है, उसी प्रकार सज्जन से अथवा दुर्जन से, पापकर्मा व्याध से अथवा वधिक से वसूल किया गया धन राजकोष में जाते ही पवित्र हो जाता है। टिप्पणी—लगता है कि नारदस्मृति की रचनाकाल तक गंगा का महत्त्व स्थापित नहीं हो पाया था, अन्यथा हिन्दी के कृष्णभक्त कवि सूरदास की पंक्तियां 'नारदस्मृति' में प्रतिध्वनित होतीं— प्रभु जी मेरे औगुन चित्त न धरो। समदरसी प्रभु नाम तिहारो चाहो तो पार करो ॥ अपने कथन का समर्थन सूरदास इन शब्दों में करते हैं— इक नदी एक नार (नाला) कहावत, मैला ही नीर भर्यो। गंग में मिलि दोउ गंग भयो है, भेद कछू न रह्यो॥ यथा ह्यग्नौ स्थितं दीप्ते शुद्धिमायाति काञ्चनम्। एवं धनागमाः सर्वे शुद्धिमायान्ति राजसु ॥ 46 ॥ जिस प्रकार अग्नि में डालने पर स्वर्ण शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार राजकोष में आने पर सभी प्रकार का (काला अथवा सफ़ेद) धन शुद्ध-पवित्र हो जाता है। य एव कश्चित् स्वद्रव्यं ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति। तद्राज्ञाप्यनुमन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ॥ 47 ॥ ब्राह्मणों को दान-पुण्य करने वाले उदार धनिकों को इसके लिए राजा से पूर्व अनुमति लेनी चाहिए और राजा को इसकी सहर्ष स्वीकृति देनी चाहिए—यही सनातन व्यवस्था है। टिप्पणी—आज की भाषा में, यदि धनिक अपने काले धन को ब्राह्मणों को 260 / नारदस्मृति