भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 304 में से

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नदीष्ववेतनस्तारः पूर्वमुत्तारणं तथा। तरेष्वशुल्कदानं च वाणिज्यायां भवेत् स्थितिः ॥ ३८ ॥ नदी पार कराने पर ब्राह्मण से शुल्क नहीं लेना चाहिए और उसे नौका में सबसे पहले उत्तम स्थान पर बिठाना और सबसे पहले उतारना चाहिए। ब्राह्मण द्वारा वाणिज्य व्यापार की वस्तुओं की ख़रीद पर भी उससे सीमा-शुल्क तथा बिक्रीकर आदि वसूल नहीं करने चाहिए। वर्तमानोऽध्वनि श्रान्तो गृह्णान्नशनः स्वयम्। ब्राह्मणो नापराधी स्याद् द्वाविक्षू द्वे च मूलके ॥ ३९ ॥ मार्ग चलते और थकने से विश्राम करते ब्राह्मण द्वारा क्षुधा-निवृत्ति के लिए समीपस्थ खेत से फल, मूल, कन्द आदि ले लेने पर उसे अपराधी नहीं मानना चाहिए। नाभिशस्तान्न पतितान्न द्विषो नापि नास्तिकात्। नावसन्नान्निर्मिमित्तं दातारं न प्रपीड़य च ॥ ४० ॥ राजा को निम्नरोक्त व्यक्तियों को पीड़ित एवं भयभीत नहीं करना चाहिए—

  1. लोक में निन्दित व अपने चरित्र के कारण दूषित।
  2. पतित, अर्थात् भ्रष्ट आचरण के कारण जाति से बहिष्कृत।
  3. घोषित एवं सर्वजनविदित शत्रु।
  4. नास्तिक, अर्थात् वेदों की अपौरुषेयता तथा ईश्वर की सत्ता में विश्वास न रखने वाला।
  5. अवसन्न, अर्थात् एक के बाद दूसरे संकट, शोक और दुःखादि का शिकार बना व्यक्ति तथा
  6. विशेष निमित्त के बिना, अर्थात् प्रतिदिन दान करने वाला उदार मनस्वी। इन लोगों पर लगे सच्चे-झूठे, छोटे-मोटे अपराध के लिए इन्हें पीड़ित करने से राजा कलंकित हो जाता है। अर्थिनां भूरिभावाच्च देयत्वाच्च महात्मनाम्। श्रेयान् परिग्रहो राज्ञां सर्वेषां ब्राह्मणादृते ॥ ४१ ॥ राजा को याचकों को प्रतिदिन दान देने वाले उदार धनिकों, महात्माओं तथा ब्राह्मणों को छोड़कर शेष सभी प्रजाजनों से कर वसूल करने और धन लेने का पूरा- पूरा अधिकार है। ब्राह्मणश्चैव राजा च द्वावप्येतौ दृढव्रतौ। नानयोरन्तरं किञ्चित् प्रजा धर्मेण रक्षतोः ॥ ४२ ॥ अपने अपने धर्म और कर्तव्य का दृढ़ता से पालन करने वाले तथा निर्दिष्ट मार्ग से कभी च्युत न होने वाले दोनों—राजा और ब्राह्मण—अभिनन्दनीय होते हैं। इन्हीं दोनों पर प्रजा की रक्षा का और प्रजा को समुचित मार्ग दिखाने का दायित्व नारदस्मृति / 259