नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकुमार्ग-गमन से अपने को रोकता-बचाता है। दण्ड के भय से ही धर्म और सदाचार की रक्षा हो पाती है। रागादज्ञानतो वापि लोभाद्वा योऽन्यथा वदेत्। सभ्योऽसभ्यः स विज्ञेयः तं पापं विनयेन्नृपः ॥ 67 ॥ अनुराग एवं स्नेहवश, अज्ञानवश अथवा घूस लेने आदि लोभ-लालच में फंसकर, सत्य की उपेक्षा करके वक्तव्य देने वाले वादी, प्रतिवादी, साक्षी अथवा न्यायाधिकरण के सदस्य, सभी को समान रूप से दण्डनीय अपराधी समझना चाहिए और राजा को इन्हें यथोचित दण्ड देना चाहिए। किं तु राज्ञा विशेषेण स्वधर्ममनुरक्षता। मनुष्यचित्तवैचित्र्यात् परीक्ष्या साध्वसाधुता ॥ 68 ॥ राजा को दण्ड देने का अधिकार तो अवश्य है, परन्तु उसे दण्ड के अनुचित प्रयोग की छूट कदापि नहीं है। अतः धर्म की रक्षा के प्रति सजग राजा को दण्ड- विधान से पूर्व अपराध की प्रकृति, प्रवृत्ति, मात्रा तथा परिस्थिति के साथ-साथ व्यक्ति की मनोवृत्ति की जांच-परख भी अवश्य करनी चाहिए। राजा को दण्ड- निर्धारण से पूर्व यह अवश्य सुनिश्चित करना चाहिए कि अपराध जान-बूझकर किया गया है अथवा अनजाने में और विवशतावश किया गया है। अपराध करने वाला व्यक्ति अपराधी मनोवृत्ति का है अथवा साधु प्रकृति का है। राजा को इस तथ्य को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए कि मनुष्य की चित्तवृत्ति परिवर्तनशील है। कभी साधु प्रकृति के व्यक्ति की मानसिकता भी मलिन और कभी पक्के धूर्त व्यक्ति की मनोवृत्ति भी उज्ज्वल हो सकती है। इन सभी तथ्यों पर विचार किये बिना सबके लिए एक समान दण्ड का निर्धारण, अर्थात् सबको एक ही लाठी से हांकना न्यायसंगत नहीं होता। पुरुषाः सन्ति ये लोभात् प्रब्रूयुः साक्ष्यमन्यथा। सन्ति चान्ये दुरात्मानः कूटलेख्यकृतो जनाः ॥ 69 ॥ कुछ लोग ऐसे दुष्ट होते हैं, जो लोभ के वश में होकर नकली-जाली लेखपत्र (दस्तावेज़, documents) तैयार कर लेते हैं और कुछ दूसरे दुर्जन झूठी गवाही देने में सिद्धहस्त होते हैं। अतः परीक्ष्यमुभयमेतद्राज्ञा विशेषतः। लेख्याचारेण लिखितं साक्ष्याचारेण साक्षिणः ॥ 70 ॥ अतः राजा (न्यायाधिकारी) को लिखित प्रमाणों की सत्यता-असत्यता की तथा साक्षी के चरित्र की भली-भांति जांच-परख करने के उपरान्त ही उनके आधार पर अपना निर्णय देना चाहिए। बिना जांच-परख किये उन्हें कदापि प्रामाणिक नहीं मान लेना चाहिए। नारदस्मृति / 37