भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 304 में से

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असत्याः सत्यसङ्काशाः सत्याश्चासत्यसन्निभाः। दृश्यन्ते विविधा भावास्तस्माद्युक्तं परीक्षणम् ॥ 71 ॥ राजा (न्यायाधिकरण के सदस्यों) को इस तथ्य का भी विस्मरण नहीं करना चाहिए कि अनेक सीधे-सादे व्यक्ति सच्चे होने पर भी अपनी सरलता और अकुशलता के कारण झूठे-से प्रतीत होते हैं। उनमें सत्य पर टिके रहने की अपेक्षित दृढ़ता का अभाव होता है। वे यह नहीं जानते कि चतुर वकील उनके मुंह से क्या उगलवा रहा है अथवा उनके सीधे-सादे वचनों का क्या अर्थ निकाला जा रहा है। इसके विपरीत कुछ व्यक्ति बड़े ही धूर्त, चालाक और तिकड़मी होते हैं। वे झूठे होते हुए भी अपने हाव-भावों, चेष्टाओं, गतिविधियों और वचनों से अपने को नितान्त सच्चे और विश्वसनीय स्थापित करने में सफल हो जाते हैं। राजा को इस तथ्य की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। इस तथ्य की उपेक्षा करने पर धूर्तों की चांदी हो जाती है और सीधे-सादे व्यक्ति अन्याय के शिकार हो जाते हैं। तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव। न तलं विद्यते व्योम्नि न खद्योते हुताशनः ॥ 72 ॥ तस्मात् प्रत्यक्षदृष्टोऽपि युक्तो ह्यर्थः परीक्षितुम्। परीक्ष्य ज्ञापयन्नर्थान्न धर्मात् परिहीयते ॥ 73 ॥ इसी तथ्य के समर्थन में दो उदाहरण प्रस्तुत करके राजा को सावधान करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार दूर से देखने पर आकाश और पृथिवी मिलते प्रतीत होते हैं, जिस प्रकार जुगनू में आग की चिनगारी प्रतीत होती है, जबकि वास्तविकता इनसे भिन्न है, न तो आकाश-पृथिवी का मिलन है और न ही जुगनू में अग्नि स्फुलिंग है, इसी प्रकार किसी पुरुष के वचन में सत्य का आभास दीखने पर भी सत्य नहीं होता। अतः जो प्रत्यक्ष दीखता है, उसकी भी गहन परीक्षा किये बिना उसे अन्तिम सत्य नहीं मान लेना चाहिए; क्योंकि यहां भी ग़लती की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। इस प्रकार गहरी सूझ-बूझ से काम करने वाला और नितान्त सजग सतर्क रहने वाला राजा ही धर्म और न्याय की रक्षा करने में समर्थ हो पाता है। एवं पश्यन् सदा राजा व्यवहारान् समाहितः । वितत्येह यशोदीप्तं प्रेत्याप्नोति त्रिविष्टपम् ॥ 74 ॥ इस प्रकार अत्यन्त सजग एवं तटस्थ रहकर यथानिर्दिष्ट विधि से व्यवहार पर विचार करने वाला राजा अपने जीवनकाल में प्रजा के अनुराग और उज्ज्वल यश को प्राप्त करता है तथा मरणोपरान्त उत्तम गति का अधिकारी बनता है। टिप्पणी - भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को कर्तव्यपालन के लिए प्रेरित करते हुए यश और स्वर्ग की प्राप्ति का प्रलोभन दिया था— 38 / नारदस्मृति