नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय सुनिश्चितबलाधानस्त्वर्थी स्वार्थप्रचोदितः । लेखयेत् पूर्वपक्षं तु कृतकार्यविनिश्चयः ॥ १ ॥ वादी न्यायाधिकरण को यह आवेदन कर सकता है कि प्रतिवादी साधन- सम्पन्न होने के अतिरिक्त अपने स्वार्थ से प्रेरित है तथा इस व्यवहार को जीतने का दृढ़ संकल्प लिये हुए है, अतः वह लिखित प्रमाणों में गड़बड़ी और साक्ष्य आदि को भड़काने-तोड़ने-जैसा कुछ भी कर सकता है, जिससे मुझे संरक्षण की आवश्यकता है। मुझे सुरक्षा प्रदान की जाये और मेरा प्रतिद्वन्द्वी मनचाहा अनुचित न कर सके, इसे सुनिश्चित किया जाये। पूर्वपक्षश्रुतार्थस्तु प्रत्यर्थी तदनन्तरम् । पूर्वपक्षार्थसम्बन्धं प्रतिपक्षं निवेशयेत् ॥ २ ॥ वादी के आवेदन-पत्र में उल्लिखित आशंका के तात्पर्य को समझकर प्रतिवादी को स्पष्टीकरण के रूप में अपना पक्ष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए। श्वो लेखनं वा स लभेत् त्र्यहं सप्ताहमेव च। अर्थी तृतीयपादे तु युक्तं सद्यो ध्रुवं जयी ॥ ३ ॥ प्रतिवादी को न्यायालय से वादी द्वारा की गयी शिकायत का उत्तर दूसरे दिन, अथवा तीन दिनों में अथवा अधिक-से-अधिक एक सप्ताह के भीतर अवश्य प्रस्तुत कर देना चाहिए। ऐसा न करने पर और व्यवहार के तीसरे चरण लेख- परीक्षा, साक्ष्य-विचार तथा विवाद (Argument) को पार कर लेने पर व्यवहार को निर्णीत और वादी को विजयी घोषित मानना चाहिए। मिथ्या सम्प्रतिपत्तिर्वा प्रत्यवस्कन्दमेव वा। प्राङ्न्यायविधिसाम्यं वा उत्तरं स्याच्चतुर्विधम् ॥ ४ ॥ वादी द्वारा प्रतिवादी के विरुद्ध उपस्थापित व्यवहार के प्रतिवादी द्वारा दिये जाने वाले उत्तर के चार प्रकार हो सकते हैं—(१) व्यवहार को मिथ्या बताना, (२) सम्प्रतिपत्ति—आवेदन की भाषा का अस्पष्ट होना, (३) दुर्बोध—कारण- विशेष—का उल्लेख न होने की कहना तथा बताना, अर्थात् (४) इस व्यवहार का अन्य न्यायालय में निरस्त हो गया बताना-प्राङ्न्याय। 40 / नारदस्मृति