भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 304 में से

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मिथ्यैतन्नाभिजानामि मम तत्र न सन्निधिः। अजातश्चास्मि तत्काल एवं मिथ्या चतुर्विधम् ॥ 5 ॥ मिथ्या उत्तर के चार प्रकार हो सकते हैं— प्रथम, वादी द्वारा लगाये गये आरोप को मिथ्या बताना, द्वितीय, अभियोग के विषय के सम्बन्ध में अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना, तृतीय, अभियोग में उल्लिखित घटनास्थल पर अपनी अनुपस्थिति बताना तथा चतुर्थ, उल्लिखित घटना के समय अपना जन्म ही न हुआ होना अथवा उस समय अपने को विदेश में या किसी समारोह में उपस्थित बताना। मिथ्या च विपरीतं च पुनः शब्दसमागमम्। पूर्वपक्षार्थसम्बन्धमुत्तरं स्याच्चतुर्विधम् ॥ 6 ॥ उपर्युक्त चारों मिथ्या उत्तरों के निम्नोक्त रूप से क्रमशः चार प्रत्युत्तर दिये जा सकते हैं— प्रथम, प्रतिवादी द्वारा अभियोग को मिथ्या बताना, अर्थात् मिथ्या है। द्वितीय, प्रतिवादी अभियोग-आरोप के सम्बन्ध में पूरी जानकारी रखता है तथा मेरे अभियोग-पत्र की भाषा पूर्णतः स्पष्ट सरल और सुबोध है। तृतीय, अभियोग-पत्र में सभी कारणों का स्पष्ट उल्लेख हुआ है। चतुर्थ, यह अभियोग किसी अन्य न्यायालय में कभी निरस्त नहीं हुआ। इस सम्बन्ध में प्रतिवादी का कथन मिथ्या एवं भ्रामक है। भाषाया उत्तरं यावत् प्रत्यर्थी विनिवेशयेत्। अर्थी तु लेखयेत्तावद्यावद्वस्तु विवक्षितम् ॥ 7 ॥ वादी को लिखित आवेदन में केवल अत्यावश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य तथ्य लिखने चाहिए और प्रतिवादी के उत्तर की प्रतीक्षा करनी चाहिए। उसका उत्तर न आने तक तथा अभियोग-पत्र की कोई प्रतिलिपि न भेजे जाने तक वादी अपने आवेदन-पत्र में यथेष्ट संशोधन—जोड़ना-छोड़ना—कर सकता है। प्रतिवादी को वादी के अभियोग से परिचित किये जाने के उपरान्त उसमें किसी प्रकार का कोई परिवर्तन-परिवर्द्धन नहीं किया जा सकता। हां, प्रतिवादी के उत्तर के प्रत्युत्तर में अपनी बात कहने के लिए वह अवश्य स्वतन्त्र है। टिप्पणी—स्मृति चन्द्रिकाकार किन्हीं आचार्यों द्वारा प्रतिवादी के उत्तर के आने के उपरान्त भी वादी द्वारा अपने अभियोग-पत्र में संशोधन की अनुमति देने को अनुचित एवं अवाञ्छनीय मानते हैं—केचिन्निविष्टेऽप्युत्तरे शोधनमिच्छन्ति। तदनवस्था प्रसंगात् पूर्वोक्तवचनविरोधाच्च हेयम्। अन्यार्थमर्थहीनं च प्रमाणागमवर्जितम्। लेख्यं हीनाधिकं भ्रष्टं भाषादोषास्तूदाहृताः ॥ 8 ॥ नारदस्मृति / 41