भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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वादी द्वारा अपने विरुद्ध प्रस्तुत अभियोग-पत्र में प्रतिवादी निम्नोक्त सात दोष निकाल सकता है— प्रथम, अन्यार्थ—वाञ्छनीय अर्थ में भिन्न अर्थ की प्रतीति होना। द्वितीय, अर्थहीनता—अभियोग के आवेदन करने का पात्र ही न होना। तृतीय, प्रमाण-वर्जित—वादी द्वारा प्रस्तुत अभियोग की पुष्टि में किसी प्रमाण का न होना। चतुर्थ, आगम-वर्जित—अभियोग-पत्र का न्याय, धर्म आदि शास्त्रों के तथा समाज व देश के विरुद्ध होना। पञ्चम, हीन—अपेक्षित स्थान पर न होना। उपर्युक्त का अपनेक्षित स्थान पर होना। षष्ठ, अधिक—विसर्ग, विराम, अल्पविराम, मात्रा तथा स्वर आदि का यथास्थान प्रयोग न होना। सप्तम, भ्रष्ट—अभियोग-पत्र का स्वच्छ न होना, तेल, मिट्टी आदि से गन्दा तथा पानी से भीगा होना एवं शिष्टता का अभाव। लब्धव्यं येन यद्यस्मात् स तत्तस्मादवाप्नुयात्। न त्वन्योन्यमथान्यास्मादित्यन्यार्थमिदं त्रिधा ॥ 9 ॥ सातों दोषों का परिचय इस प्रकार है—अभियोग-पत्र की—प्रथम अन्यार्थ— जो वस्तु जिसको जिससे प्राप्त करनी हो—भाषा से वही अर्थ निकलना चाहिए; क्योंकि अभिमत से भिन्न वस्तु को, वाञ्छित से भिन्न व्यक्ति से तथा अभीष्ट से भिन्न व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। अतः सन्दर्भ से भिन्न अर्थ देने वाली भाषा का प्रयोग अन्यार्थ दोष कहलायेगा और यह दोष अभियोग को निरस्त कर सकता है। मनसाहमपि ध्यातस्त्वन्मित्रेणेह शत्रुवत्। अतोऽनया महाक्षान्त्या त्वमिहावेदितो मया ॥ 10 ॥ किसी दूसरे की ओर से—उसकी अनुमति-सहमति होने अथवा न होने (पावर ऑफ अटार्नी) पर—अमुक व्यक्ति मित्रता का ढोंग करता हुआ आपके प्रति शत्रुता का व्यवहार करता है—जो मुझे रुचिकर नहीं—यह कहते हुए सम्बद्ध व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में अभियोग चलाना अर्थहीन अभियोग कहलाता है। यहां विचारणीय तथ्य यह है कि जब सम्बद्ध व्यक्ति को विरोधी से कोई शिकायत ही नहीं, वह स्वयं कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता तथा उसके विरुद्ध कोई पग नहीं उठाता, तो किसी दूसरे को क्यों कष्ट हो रहा है ? ऐसे मामले में आजकल इस मुहावरे का प्रयोग किया जाता है—‘‘मुद्दई (वादी) सुस्त, गवाह चुस्त।’’ द्रव्यप्रमाणहीनं यत्फलोपाश्रयवर्जितम्। प्रमाणवर्जितं नाम लेख्यदोषं तदुत्सृजेत् ॥ 11 ॥ 42 / नारदस्मृति