भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 304 में से

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अभियोग-पत्र में अविश्वसनीय एवं काल्पनिक तथ्यों के उल्लेख से भी अभियोग अग्राह्य हो जाता है। उदाहरणार्थ, किसी का गन्धमादन पर्वन पर किसी वस्तु के लेने और न लौटाने का अभियोग विश्वसनीयता की सीमा से बाहर होने के कारण ग्राह्य नहीं हो सकता; क्योंकि इस तथ्य की पुष्टि नहीं हो सकती कि लेने और देने वाला दोनों कभी उक्त स्थान पर थे और दोनों में किसी प्रकार का कोई लेन- देन हुआ था। अन्याक्षरनिवेशेन अन्यार्थगमनेन च। आकुलं च क्रियादानं क्रिया चैवाकुला भवेत्॥ 17 ॥ यदि अभियोग से सम्बन्धित आवेदन-पत्र में लिखे गये तथ्यों पर विवाद (Argument) के समय व्यक्ति लिखित से अभिव्यक्त होने वाले अर्थ पर दृढ़ न रहकर उससे भिन्न मन्तव्य प्रकट करता है, अर्थात् वह यह कहता है कि जो लिखा गया है, वह उसका आशय नहीं था, तो ऐसा अभियोग भी निरस्त होने योग्य होता है। उदाहरणार्थ, यदि व्यक्ति किसी पर मानहानि का आरोप लगाते हुए मार-पीट आदि करने का उल्लेख करता है और बहस में केवल अपशब्द कहना बताता है, तो ऐसा अभियोग-पत्र निरस्त ही किया जाना चाहिए; क्योंकि इस प्रकार के लिखित और मौखिक कथन के अन्तर से न केवल न्यायाधिकरण के सदस्य परेशान हो जाते हैं, अपितु न्याय की प्रक्रिया भी दूषित हो जाती है। रागादीनां यदेकेन कोपितः करणं वदेत्। तदादौ तु लिखेत् सर्वं वादिनः फलकादिषु॥ 18॥ यदि कोई व्यक्ति काम, क्रोध और लोभ-ये तीनों रागादि (राग-द्वेष) के नाम से जाने जाते हैं। इन तीनों में से किसी एक-क्रोध-में आकर धर्माधिकारी को मौखिक रूप से अपने पक्ष में निर्णय लिखने के लिए धमकाता है, तो ऐसे व्यक्ति का नाम तत्काल सूचनापट्ट (नोटिसबोर्ड) पर मोटे-काले अक्षरों में लिख देना चाहिए। राजकुलावबोधाय धर्मस्थैः सुविचारितम्। तस्मादन्यद्व्यपोहां स्याद् वादिनः फलकादिषु॥ 19॥ यदि वादी द्वारा प्रस्तुत अभियोग-पत्र के विषय के एक सीमा तक राजकुल- उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय के विचार क्षेत्र में आने के कारण धर्माधिकारियों-निम्न न्यायालय के न्यायाधीशों-द्वारा भली प्रकार विचार किये जाने पर कुछ अविचारित रह जाता है, तो वादी को उस पर आपित्त करने का अधिकार नहीं मिलता। 44 / नारदस्मृति