भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 304 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 47

वादिभ्यामभ्यनुज्ञातं शेषं च फलके स्थितम्। ससाक्षिकं लिखेयुस्ते प्रतिपत्तिं च वादिनोः ॥ २० ॥ वादी के अभियोग-पत्र का प्रतिवादी द्वारा उत्तर देने के पश्चात् और प्रतिवादी द्वारा आरोपों के खण्डन-मण्डन में प्रत्युत्तर तथा साक्षियों के वक्तव्य के उपरान्त वादी-प्रतिवादी में समझौते और निर्धारित शर्तों को न्यायाधिकरण के लेखक को उस सरकारी अभिलेख में लिपिबद्ध करना चाहिए। वादिभ्यां लिखिताच्छेषं यत्पुनर्वादिना स्मृतम्। तत्प्रत्याकलितं नाम स्वपादे तस्य लिख्यते ॥ २१ ॥ यदि वादी और प्रतिवादी के वक्तव्यों के लिपिबद्ध हो जाने के उपरान्त वादी कुछ अन्य स्मरण आये तथ्यों को सम्मिलित कराना चाहता है, तो उसे परिशिष्ट (एडेण्डम) शीर्षक के अन्तर्गत लिया जाना चाहिए। ऐसे उल्लेख को 'प्रत्याकलित' कहा जाता है। अर्थिना सन्नियुक्तो वा प्रत्यर्थिप्रहितोऽपि वा। यो यस्यार्थे विवदते तयोर्जयपराजयौ ॥ २२ ॥ अर्थी और प्रत्यर्थी द्वारा मनोनीत उनके प्रतिनिधि (अटार्नी) जब उनकी ओर से अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं तथा वाद-विवाद में भाग लेते हैं, तब उन प्रतिनिधियों के वक्तव्यों आदि के आधार पर व्यवहार किया गया निर्णय-जय- पराजय-को स्वीकार करने के लिए दोनों पक्ष बाध्य होते हैं। अभिप्राय यह है कि वादी तथा प्रतिवादी यह नहीं कह सकते कि हमारा प्रतिनिधि ठीक से कार्य नहीं कर सका अथवा हमने तो भाग ही नहीं लिया। प्रतिनिधियों की उपस्थिति को भी वादी-प्रतिवादी की उपस्थिति ही माना जायेगा। यो न भ्राता न च पिता न पुत्रो न नियोगकृत्। परार्थवादी दण्ड्यः स्याद् व्यवहारेऽपि विब्रुवन् ॥ २३ ॥ व्यवहार-कार्य में प्रवृत्त व्यक्ति का सम्बन्धी-पिता, पुत्र, भाई, पत्नी अथवा अन्य निकट सम्बन्धी-तथा उसके द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि न होने पर भी वादी अथवा प्रतिवादी के हित-साधन अथवा विरोध के लिए व्यवहार में अनावश्यक एवं अनुचित रूप से हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति 'परार्थवादी' कहा जाता है। ऐसा व्यक्ति केवल अवाञ्छनीय-दाल-भात में मूसलचन्द-ही नहीं होता, अपितु दण्डनीय भी होता है। अभिप्राय यह है कि असम्बद्ध एवं बाहरी व्यक्ति द्वारा न्यायालय के किसी मामले में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप दण्डनीय अपराध होता है। पूर्ववादं परित्यज्य योऽन्यमालम्बते पुनः। वादसंक्रमणाज्ज्ञेयो हीनवादी स वै नरः ॥ २४ ॥ नारदस्मृति / 45