भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 304 में से

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अभियोग-पत्र में उल्लिखित विषय की उपेक्षा करके अन्यान्य विषयों की चर्चा में प्रवृत्त होने वाले वादी के पक्ष को दुर्बल ही समझना चाहिए। वस्तुतः वाद- संक्रमण दुर्बलता का ही परिचायक लक्षण होता है। सर्वेष्वपि विवादेषु वाक्छलेनापहीयते। पशुस्त्रीभूम्यृणादाने शास्योऽप्यर्थान्न हीयते ॥ 25 ॥ यों तो न्यायालय में प्रस्तुत सभी प्रकार के मामलों में छल-कपट और धोखा- धड़ी करने वाले पक्ष की धूर्तता सिद्ध होने पर उसकी पराजय निश्चित होती है, परन्तु पशु, स्त्री, भूमि तथा ऋण के लेन-देन से सम्बन्धित मामलों में तो छल- कपट और धोखा-धड़ी सिद्ध होने पर पराजय के साथ-साथ दण्ड भी भुगतना पड़ता है। अभियुक्तोऽभियोगस्य यदि कुर्यादपह्नवम्। अभियोक्ता दिशेद्देश्यं प्रत्यवस्कन्दितो न चेत् ॥ 26 ॥ अभियुक्त प्रतिवादी अपने विरुद्ध अभियोग को मिथ्या तो बताता है, परन्तु अपने मन्तव्य की पुष्टि में ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता, जबकि वादी प्रतिपाद्य विषय को प्रमाणों द्वारा सत्य सिद्ध करने में सफल रहता है और इधर प्रतिवादी वादी के मन्तव्य का खण्डन भी नहीं कर पाता, तो प्रतिवादी को पराजित और वादी को विजित मानना चाहिए। पूर्वपादे हि लिखितं यथाक्षरमशेषतः। अर्थी तृतीयपादे तु क्रियया प्रतिपादयेत् ॥ 27 ॥ अभियोग के प्रथम चरण-अभियोग-पत्र को जमा कराने के उपरान्त अभियोग के तृतीय चरण-विवाद के समय-में वादी को अभियोग-पत्र में लिखित तथ्यों की ही तर्कों और प्रमाणों से पुष्टि करनी होती है। उस समय वादी किसी नये विषय को प्रस्तुत नहीं कर सकता। उसे अपने को वहीं तक सीमित करना होता है। क्रियापि द्विविधा प्रोक्ता मानुषी दैविकी तथा। मानुषी लेख्यसाक्षिभ्यां घटादिर्दैविकी स्मृता ॥ 28 ॥ प्रमाण के अन्तर्गत क्रिया के दो रूप-भेद होते हैं-मानुषी क्रिया तथा दैवी क्रिया। लिखित पत्र-पत्रिका आदि तथा साक्ष्य मानुषी क्रिया न्याय है। घट, तुला, अग्नि तथा जल आदि की शपथ लेना दैवी क्रिया है। दैवी क्रिया को दिव्य प्रमाण भी माना जाता है। जहां कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, वहां इन्हीं दिव्य प्रमाणों द्वारा काम चलाया जाता है। दिवा कृते कार्यविधौ ग्रामेषु नगरेषु वा। सम्भवे साक्षिणां चैव दिव्या न भवति क्रिया ॥ 29 ॥ दिन में, ग्राम-नगर आदि जनपद में घटित घटना की प्रामाणिकता के लिए तो 46 / नारदस्मृति