भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 304 में से

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लौकिक प्रमाण के अन्तर्गत साक्ष्य आदि से ही काम चलाया जाता है। ऐसी घटनाओं के विषय में दिव्य प्रमाण स्वीकृत नहीं होता। लौकिक प्रमाण की अनुपलब्धता में ही दिव्य प्रमाण की आवश्यकता और उपयोगिता आंकी जाती है। अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे। न्यासस्यापह्नवे चैव दिव्या सम्भवति क्रिया॥ ३०॥ निर्जन वन में अथवा जनशून्य स्थान—ग्राम, नगर आदि के बाहर—रात्रि में (अन्धकार में) घर के भीतर किसी प्रत्यक्षदर्शी के अभाव में, डाका डाले जाने वाले स्थान-भय के कारण लोगों के भाग जाने, छिप जाने पर, धरोहर के रूप में रखी वस्तु को छिपा लेने की स्थिति में मानुषी प्रमाण की उपलब्धता सम्भव ही नहीं होती। अतः ऐसे स्थानों अवसरों पर दिव्य प्रमाण हो स्वीकृत होते हैं। कारणप्रतिपत्त्या च पूर्वपक्षे विरोधिते। अभियुक्तेन वै भाव्यं विज्ञेयं पूर्वपक्षवत्॥ ३१॥ जिस प्रकार वादी अपने अभियोग को विश्वसनीय बनाने के लिए उसके समर्थन में लिखित प्रमाण एवं साक्ष्य आदि जुटाता है, उसी प्रकार प्रतिवादी को भी वादी के अभियोग के खण्डन और अपने पक्ष के समर्थन में पुष्ट प्रमाण जुटाने चाहिए, तभी उसे अपनी विजय की आशा करनी चाहिए। पलायते च आहूतो मौनी साक्षिपराजितः। स्वयमभ्युपपन्नश्च अवसन्नश्चतुर्विधः ॥ ३२॥ निम्नोक्त चार प्रकार अवसन्न, अर्थात् पराजित पक्ष कहलाते हैं— प्रथम—अभियुक्त व्यक्ति द्वारा धर्माधिकरण के आह्वान-पत्र (समन) को लेने से कतराना, छिप जाना, भाग जाना, आह्वान-पत्र लाने वाले को घूस देकर अपने को अनुपस्थित दिखाना अथवा आह्वान-पत्र प्राप्त करके निश्चित तिथि व समय पर न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित न होना। द्वितीय—न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित होने पर मौन रहना अथवा वादी के आरोपों का खण्डन न करना। तृतीय—साक्षी को प्रस्तुत न कर पाना अथवा साक्ष्य का पुष्ट न होना अथवा साक्षी का बिदक-भटक जाना। चतुर्थ—न्यायालय में अपने पक्ष की प्रस्तुति के लिए वादी द्वारा प्रथम अपना प्रतिनिधि मनोनीत करना और फिर उसकी कार्य-शैली से सन्तुष्ट न होकर स्वयं उपस्थित हो जाना। इन चारों तत्त्वों को प्रतिवादी के पक्ष की दुर्बलता का सूचक ही समझना चाहिए! अन्यवादी क्रियाद्वेषी नोपस्थाता निरुत्तरः। आहूतप्रपलायी च हीनः पञ्चविधः स्मृतः ॥ ३३॥ नारदस्मृति / 47

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