नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ
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- धरोहर और बन्धक रखने से तथा इन दोनों के क्रय विक्रय से पूर्व प्रशासन से अपेक्षित अनुमति प्राप्त करना। इस प्रकार क़ानून का पालन करने वाले व्यक्ति को प्रथम तो कभी किसी झंझट का सामना करना ही नहीं पड़ता, अन्यथा किसी झंझट के उपस्थित होने पर पूर्वपक्षी मानकर उसे गौरव दिया जाता है। साक्षिकदूषणे कार्यं पूर्वसाक्षिविशोधनम्। शुद्धेषु साक्षिषु ततः पश्चात् साक्ष्यं विशोधयेत् ॥ ३९ ॥ वादी के साक्षी के अभिमत (Bona-fide) होने के सम्बन्ध में प्रतिवादी द्वारा आपत्ति किये जाने पर अथवा साक्षी के साक्ष्य में दोष निकालने पर खण्डन- संशोधन आदि का दायित्व वादी पर होता है। साक्षी की निर्दोषिता सिद्ध होने पर ही उसका साक्ष्य ग्राह्य होता है। प्रामाणिकता के विवादित रहने पर साक्षी को वक्तव्य देने का अवसर ही नहीं देना चाहिए। साक्षिसभ्यावसन्नानां दूषणे दर्शनं पुनः। स्वचर्यावसितानां तु नास्ति पौनर्भवो विधिः ॥ ४० ॥ न्यायाधिकरण द्वारा नियुक्त सदस्यों (ज्यूरिस्टों) के प्रमाद, भूल-चूक, असावधानी अथवा त्रुटि के कारण पराजित व्यक्ति अपने व्यवहार के पुनर्विचार के लिए आवेदन कर सकता है, परन्तु साक्षियों के साक्ष्य में हुई भूल-चूक, त्रुटि तथा प्रमाद आदि के कारण पराजित व्यक्ति पुनर्विचार के लिए आवेदन का अधिकारी नहीं होता। स्वयमभ्युपपन्नोऽपि स्वचर्यावसितोऽपि सन्। क्रियावसन्नोऽप्यर्हेत परं सम्भावधारणम्॥ ४१ ॥ वादी द्वारा स्वयं प्रस्तुत प्रमाणों और साक्ष्य आदि के निरस्त हो जाने पर भी उसे तब तक पराजित मानकर दण्डित नहीं किया जा सकता, जब तक कि विचारों की निष्पत्ति (Arguments and Cross Arguments) द्वारा तथ्यों का अन्तिम निर्णय नहीं हो जाता। दण्डाधिकारी को इससे पूर्व किसी प्रकार का निष्कर्ष निकालने और निर्णय थोपने का कोई अधिकार नहीं; क्योंकि तर्क-प्रस्तुति के समय पासा पलट सकता है। पक्षानुत्सार्य तु सभ्यैः कार्यों विनिश्चयः सदा। अनुत्सारितनिर्णिंक्ते विरोधः प्रेत्य चेह च॥ ४२ ॥ प्रमाणों और साक्ष्य के अतिरिक्त तर्क-प्रस्तुति, विवाद और व्यक्तिगत सुनवाई तथा पूछ-ताछ आदि के उपरान्त सभ्यों—ज्यूरी के सदस्यों—द्वारा व्यवहार के सभी पक्षों पर विचार करते समय वादी तथा प्रतिवादी को कभी सामने नहीं आने देना चाहिए, अर्थात् किसी के प्रति अनुग्रह-विग्रह का भाव नहीं रखना चाहिए। निर्णय 50 / नारदस्मृति