नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे किसी को होने वाले लाभ-हानि की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। सर्वथा तटस्थ होकर निर्णय करना चाहिए। ऐसा न करने वाला न्यायाधिकरण इस लोक में अपयश और परलोक में दुर्गति का भागी होता है। सभ्यैरेव जितः पश्चाद्राज्ञा शास्यः स्वशास्त्रतः। जयिने चापि देयं स्याद्याथावज्जयपत्रकम्॥ ४३॥ सभ्यों—न्यायाधिकरण के मनोनीत सदस्यों—द्वारा विजित एवं पराजित घोषित दोनों पक्षों को न्यायालय द्वारा प्राधिकृत अधिकारी अपने हस्ताक्षर और शासकीय मुद्रा में अंकित संविधान-सम्मत प्रमाण-पत्र जारी करता है। टिप्पणी—विजेता को दिये जाने वाले प्रमाण-पत्र में व्यवहार की क्रम- संख्या, व्यवहार प्रारम्भ होने और निर्णय होने की तिथि, व्यवहार का वर्ग, न्यायाधिकरण का स्तर, अधिकार-क्षेत्र, लगाये गये आरोप का स्वरूप, उपस्थापित प्रमाण एवं साक्ष्य तथा प्राड्विवाक (वकीलों) द्वारा किये गये तर्क-वितर्कों के अतिरिक्त सभ्यों द्वारा संविधान की धारा-विशेष के अन्तर्गत किये गये विचार के संक्षिप्त विवरण के उपरान्त निर्णय का स्पष्ट उल्लेख रहना चाहिए। प्रमाण-पत्र को प्रामाणिक रूप देने के लिए सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर, पद तथा न्यायालय की मोहर लगी होनी चाहिए। व्यवहारमुखं चैतत् पूर्वमुक्तं स्वयम्भुवा। मुखशुद्धौ हि शुद्धिः स्याद् व्यवहारस्य नान्यथा॥ ४४॥ व्यवहारमातृका ब्रह्माजी के कथन के अनुसार व्यवहार का मुख—अग्रभाग— है। मुख शुद्ध होने पर ही व्यवहार शुद्ध होता है—ऐसी ब्रह्माजी की मान्यता है। ब्रह्माजी के अनुसार मुख शुद्ध न होने पर, अर्थात् वाणी शुद्ध न होने पर व्यक्ति के व्यवहार के शुद्ध होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। टिप्पणी—नीतिशास्त्र में तो मन की शुद्धि को प्रधानता देते हुए माना गया है कि मन का भाव (चिन्तन) वाणी-रूप में जिह्वा पर आता है और वचन के अनुरूप व्यक्ति कार्य करता है। इन्हीं तीनों—मन, वाणी और क्रिया—की एकरूपता को सज्जनता का तथा भिन्नता को दुर्जनता का लक्षण माना गया है। मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्। मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्॥ परन्तु यहां न्याय-प्रक्रिया में मन के भावों की उपेक्षा करते हुए दिये गये बयान (वाणी) को ही महत्त्व दिया गया है। ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ नारदस्मृति / 51