भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 304 में से

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पृष्ठ 54

तृतीय अध्याय नानियुक्तेन वक्तव्यं व्यवहारे कथञ्चन । नियुक्तेन तु वक्तव्यमपक्षपतितं वचः ॥ १ ॥ वादी अथवा प्रतिवादी द्वारा अधिकृत अथवा नियुक्त न किया गया कोई भी व्यक्ति उनकी ओर से उनके प्रतिनिधि के रूप में कुछ नहीं कर सकता। न्यायालय को सम्बद्ध पक्षों द्वारा बिना अधिकार-पत्र प्राप्त किये वकील आदि को उनकी ओर से उनका व्यवहार प्रस्तुत करने अथवा तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति कदापि नहीं देनी चाहिए। अनियुक्तो नियुक्तो वा शास्त्रज्ञो वक्तुमर्हति । दैवीं स वाचं वदति यः शास्त्रमनुजीवति ॥ २ ॥ सभ्यों-न्यायाधिकरण के सदस्यों- अथवा तथा न्यायाधिकारियों द्वारा लोभ, पक्षपात, राग-द्वेष अथवा अज्ञानवश किसी एक पक्ष के प्रति अन्याय होता देखकर शास्त्रवेत्ता विद्वान् सम्बद्ध अथवा प्रभावित पक्ष द्वारा नियुक्त होने पर अथवा अनियुक्त होने पर भी न्याय की रक्षा के लिए धर्मसम्मत वाणी बोल सकता है, अर्थात् उसकी ओर से पुनर्विचार के लिए याचना तथा बहस कर सकता है। इसे आज की भाषा में प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) की मांग कहा जा सकता है। इस सम्बन्ध में स्मृतिकार नारद अन्याय के निवारण के लिए शास्त्रसम्मत तथ्य की ओर ध्यान न दिलाने को 'देवभाषा', अर्थात् ईश्वरीय प्रयास की संज्ञा देते हैं। युक्तरूपं वदन् सभ्यो नाप्नुयाद् द्वेषकिल्विषे । ब्रुवाणस्त्वन्यथा सद्यस्तदेवोभयमाप्नुयात् ॥ ३ ॥ सभ्यों के युक्तियुक्त, शास्त्रसम्मत तथा तथ्यों पर आधृत, अर्थात् व्यक्तिगत राग द्वेष से सर्वथा रहित निर्णय से किसी को होने वाली क्षति के लिए वे उत्तरदायी नहीं होते, उन्हें किसी प्रकार पाप का भागी नहीं बनना पड़ता। इसके विपरीत, यदि वे लोभ, भय अथवा पक्षपात से प्रेरित होकर किसी को लाभ पहुंचाने के रूप में न्याय का गला घोटने पर, न केवल लोक में अपयश का पात्र बनते हैं, अपितु मृत्यु के उपरान्त नरक में भी गिरते हैं। 52 / नारदस्मृति