नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्प्रतिष्ठः स्मृतो धर्मो धर्ममूलश्च पार्थिवः । सह सद्भििरतो राजा व्यवहारान् विशोधयेत् ॥ 6 ॥ न्याय-प्रक्रिया के अन्तर्गत स्मृति-धर्मशास्त्र-के आधार पर ही न्याय तथा धर्म की प्रतिष्ठा होती है, अर्थात् न्यायाधिकारियों को न्याय करने के रूप में धर्म की प्रतिष्ठा करनी होती है। इसके लिए उन्हें धर्मशास्त्र का सहारा लेना होता है। अतः उनके लिए शास्त्रों की सम्यक् जानकारी होना आवश्यक हो जाता है। धर्म का मूल राजा है, अर्थात् यदि राजा धर्मात्मा है, तो निश्चित है कि वह धर्मात्माओं को ही गौरव देगा और प्रजा भी धर्मप्रिय होगी। इस सम्बन्ध में 'यथा राजा तथा प्रजा' की उक्ति सर्वविदित है। राजा धर्मशील, कुलीन, सदाचार एवं विचक्षण सभ्यों के सहयोग-विचार-विमर्श-से ही व्यवहारों का निरीक्षण-परीक्षण एवं निर्णय करता है। अकेला राजा तो सब कुछ नहीं कर सकता, उसे सदैव सहायकों, परामर्शदाताओं तथा विश्वस्त मित्रों की आवश्यकता रहती है। यदि सहायक कुलीन, पण्डित, निष्पक्ष तथा विवेकशील हैं, तो वे राजा का पथ-प्रदर्शन ही नहीं करते, अपितु उस पर नियन्त्रण रखने में भी समर्थ होते हैं। शुद्धेषु व्यवहारेषु शुद्धिं यान्ति सभासदः । शुद्धिश्च तेषां धर्माद्धि धर्ममेव वदेत्ततः ॥ 7 ॥ व्यवहार की शुद्धि से न्यायाधिकारियों की शुद्धि होती है, अर्थात् जब व्यवहार के निर्णय में राग-द्वेष तथा काम, क्रोध व लोभवश उत्पन्न पक्षपात को आड़े नहीं आने दिया जाता, पूर्णतः निष्पक्षता एवं तटस्थता बरती जाती है तथा दुग्ध और जल को पृथक् करने में विवेक का परिचय दिया जाता है, तब न्यायाधिकारियों का लोक में सम्मान और यश बढ़ता है। इस प्रकार धर्म की रक्षा से ही न्यायाधिकारियों की वास्तविक शुद्धि होती है और यह धर्म ही उनके यश का प्रसार-विस्तार करता है। अभिप्राय यह है कि धर्म की रक्षा करने वालों को ही लोक में प्रतिष्ठा मिलती है, धर्म की उपेक्षा करने वाले अपमानित-कलंकित हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में महाभारत का प्रस्तुत कथन दर्शनीय है। धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च । हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ 8 ॥ जहां किसी भी व्यवहार में धर्म की अधर्म के हाथों और न्याय की अन्याय के हाथों हत्या होती है, सत्य असत्य के हाथों प्रताड़ित-पराजित होता है, वहां न्यायाधिकारी भी लोक में निन्दित, कलंकित और अपमानित होते हैं। टिप्पणी - यह तो एक सुनिश्चित तथ्य है कि पूर्वाग्रह अथवा पक्षपातवश 54 / नारदस्मृति