नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथवा अज्ञानवश कुछ लोग कुछ समय के लिए अन्याय का समर्थन भले कर लें, परन्तु अन्ततः सत्य की ही विजय होती है। समाज में प्रचलित मान्यता है- सत्य वही, जो सिर चढ़ बोले। हत्या के सम्बन्ध में अंग्रेजी भाषा की सुप्रचलित उक्ति- Murder must Come out, अर्थात् खून सिर पर चढ़कर बोलता है-के समान सत्य भी सिर चढ़कर बोलता है, उसे छिपाना-नकारना तो ढोंग ही हो सकता है। इसके अतिरिक्त यह भी एक नग्न सत्य है कि सत्य और न्याय की हत्या करने वाला व्यक्ति कितने भी ऊंचे पद पर प्रतिष्ठित क्यों न हो, समाज की दृष्टि में एकदम गिर जाता है। इस प्रकार स्मृतिकार नारद का यह कथन-अन्याय का पक्ष ग्रहण करने से न तो अन्याय प्रतिष्ठित हो पाता है और न ही न्याय की हत्या करने वाला कहीं सुख-शान्ति से बैठ पाता है-एक अनुभवसिद्ध एवं त्रिकालशुद्ध सत्य है, जिसकी उपेक्षा किसी भी स्थिति में कदापि सम्भव नहीं। मनु के अनुसार-जिस प्रकार शस्त्र के घाव से पीड़ित व्यक्ति का उपचार न करने वाला चिकित्सक कर्तव्यच्युत और लोकनिन्दित होता है, उसी प्रकार विश्वास लेकर व्यवहार-निर्णय के लिए उपस्थित वादी को न्याय न देने वाला धर्माधिकारी पाप का भागी होता है- तत्र यथा लोकः शस्त्राभिघातपीड़ितो वैद्यपार्श्वमागच्छति। तत्र च ते सभासदस्तस्य तदवस्थधर्मस्य, अधर्मस्योद्धरणव्यापारनियुक्ताधिकारिणोऽपि यदा तत्पापशल्यं न कृन्तन्ति नापनयन्ति तदा संक्रमणतन्त्रप्रयोगसंक्रामित- वृश्चिकविषेणैव उपेक्षितपापशल्येन त एव सभासदो विद्धा भवन्ति। विद्धे धर्मे ह्यधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते। न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥ 9 ॥ जिस न्यायाधिकरण में अन्याय का प्रवर्तन होता है, न्यायाधिकरण के उस व्यवहार से केवल वादी और प्रतिवादी ही प्रभावित नहीं होते, अपितु न्यायाधिकारी भी उससे बुरी तरह क्षतिग्रस्त होते हैं। उनके सम्मान को क्षति पहुंचती है और उनके व्यक्तित्व को बट्टा लगता है। टिप्पणी-जिस प्रकार पशु के शरीर में घुसे, अपने बाण को निकालने की चेष्टा करने वाला व्याध स्वयं भी (उस बाण से आहत हो जाता है) पीठ के बल गिर पड़ता है, उसी प्रकार सत्य, धर्म और न्याय की हत्या करने वाला व्यक्ति भी आत्मग्लानि से व्यथित होकर सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत नहीं कर पाता। सभायां न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम्। अब्रुवन् विब्रुवन् वापि नरो भवति किल्बिषी ॥ 10 ॥ यदि सभ्य-न्यायाधिकरण के सदस्य-में सत्य बोलने का साहस नहीं है, तो उसे सभा (न्यायालय) में जाना ही नहीं चाहिए। न्यायालय में गये सभ्य का तो नारदस्मृति / 55