नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंवास्तविकता को समझने का प्रयास करना चाहिए। पादोऽधर्मस्य कर्त्तारं पादः साक्षिणमृच्छति। पादः सभासदः सर्वान् पादो राजानमृच्छति ॥ १२ ॥ न्यायाधिकारियों के प्रमाद, पक्षपात, उपेक्षा अथवा अन्यमनस्कता के कारण उनके द्वारा किये गये ग़लत निर्णय के फलस्वरूप जब सत्य और न्याय की पराजय तथा असत्य और अन्याय की विजय होती है, तो चार चरणों वाले धर्म के एक चरण को खण्डित करने का पाप स्वयं पापाचरण करने वाले व्यक्ति को, द्वितीय चरण को खण्डित करने का पाप साक्षी (मिथ्या साक्ष्य भरने वाला) को, तृतीय चरण को क्षतिग्रस्त करने का पाप न्यायाधिकारियों को और चतुर्थ चरण को खण्डित करने का पाप स्वयं राजा को लगता है और इन सबको अपने-अपने भाग के पाप का दण्ड भुगतना पड़ता है। अभिप्राय यह है कि अपने कर्तव्य का सम्यक् निर्वाह न करने वाले सभ्य- न्यायाधिकरण के सदस्य- अपने अपराध के कारण स्वयं तो डूबते ही हैं, अपनी नियुक्ति के रूप में अपने को अनुगृहीत करने वाले अपने स्वामी राजा (आज के समय राष्ट्रपति अथवा विधिमन्त्री) को भी अपने साथ ले डूबते हैं, उन्हें भी कलंकित और नरकगामी बनाते हैं। राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः । एनो गच्छति कर्त्तारं निन्दार्हो यत्र निन्द्यते ॥ १३ ॥ इस सबके विपरीत न्यायाधिकारियों की सजगता, नीर-क्षीर-विवेकक्षमता तथा एकाग्रता के कारण जहां अपराधी को ही अपराधी घोषित किया जाता है और निर्दोष को मिथ्या आरोप से मुक्त किया जाता है, वहां कर्ता ही अपने सारे पाप का दण्ड भुगतता है, न साक्षी, न ही न्यायाधिकारी और न ही राजा, कर्ता को उसके पाप के मिलने वाले दण्ड के सहभागी होते हैं। अभिप्राय यह है कि न्यायाधिकारियों की सजगता न केवल स्वयं उन्हें, अपितु राजा को और साक्षी को भी दण्डमुक्त करती है। इस प्रकार उन पर अपने कर्तव्य-निर्वहण का तिगुना भार और दायित्व है, जिसमें कोताही का अर्थ अपने साथ दूसरों को भी ले डूबना है। अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति निरपेक्षः सकण्टकान् । परोक्षमर्थवैकल्याद् भाषते यः सभां गतः ॥ १४ ॥ जिस प्रकार अन्धा व्यक्ति मछली में विद्यमान कांटे को न देख-निकाल पाने के कारण कांटे-सहित मछली को खाने से कण्ठ में धंसे कांटे से असीम वेदना- यहां तक कि मृत्यु-का पात्र बनता है, उसी प्रकार शास्त्रज्ञानविहीन व्यक्ति भी नारदस्मृति / 57