भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 304 में से

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लोकन्यायपालिका का सदस्य नियुक्त किये जाने पर, अपनी नीर-क्षीर -विवेकशक्ति के अभाव के कारण मनमानी करने से निन्दा, हास्य तथा अपमान का पात्र बनने के साथ, साथ घोर पाप का भागी भी बनता है। अभिप्राय स्पष्ट है कि राजा को योग्य एवं अधिकारी व्यक्ति को ही सभ्य के रूप में नियुक्त करना चाहिए। राजा को इस सम्बन्ध में विशेष सतर्क रहने की आवश्यकता है; क्योंकि उसे यह ज्ञात होना चाहिए कि अनुपयुक्त व्यक्ति द्वारा किये गये अनीतिपूर्ण निर्णय के पाप के चतुर्थांश का भागी वह स्वयं (राजा) भी होता है। अतः अनजाने में अपने खाते में जमा होने वाले पाप से बचने के लिए सदस्यों की नियुक्ति के प्रति सावधान रहने में ही उसका अपना हित है। नीतिशास्त्र के अनुसार- शास्त्रज्ञान ही मनुष्य के सच्चे नेत्र हैं, जिनके अभाव में व्यक्ति चक्षुष्मान् होता हुआ भी अन्धा ही है। सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः। जिस प्रकार व्यक्ति नेत्रों से देखकर वस्तु की ग्राह्यता-अग्राह्यता का निर्णय करता है, उसी प्रकार शास्त्र से ही शुद्ध-अशुद्ध का, उपयुक्त-अनुपयुक्त का तथा धर्म-अधर्म का निर्णय होता है। शास्त्रसम्मत धर्म है और शास्त्रविरुद्ध अधर्म है। इस प्रकार शास्त्र-ज्ञान से ही सत्य-असत्य का परिचय प्राप्त होता है। इसी शास्त्र- ज्ञान से प्राप्त करणीय-अकरणीय के विवेक को तीसरा नेत्र (सभी प्राणियों के दो चर्मचक्षु होते हैं, अतः प्रज्ञा अथवा विवेक को तीसरी आंख) भी कहा जाता है। इसी तीसरी आंख को खोलने पर, अर्थात् विवेक के जाग्रत होने पर शिव ने अपने को घेरने आये कामदेव को भस्म कर दिया था। कुमारसम्भव के अनुसार- क्रोधं प्रभो संहर संहरेति यावद्गिरः खे परितः चरन्ति। तावत्स वह्निः भवनेत्रजन्मा चकार भस्मं मदनं हि तत्क्षणम्॥ तस्मात्सभ्यः सभां प्राप्य रागद्वेषविवर्जितः। वचस्तथाविधं ब्रूयाद्यथा न नरकं व्रजेत्॥ 15॥ सभ्यों को लोकसभा में जाने पर राग द्वेष, अनुग्रह-निग्रह अथवा रोष- आक्रोश आदि से सर्वथा मुक्त होकर पूर्णतः निष्पक्ष एवं तटस्थ भाव से व्यवहार को सुनना तथा पक्ष-विपक्ष में निर्णय देना चाहिए। उदासीन भाव से न्याय करने वाला सभ्य कभी नरकगामी नहीं बनता। यथा शल्यं भिषग् विद्वानुद्धरेद् यन्त्रशक्तितः। प्राड्विवाकस्तथा शल्यमुद्धरेद् व्यवहारतः॥ 16॥ जिस प्रकार कुशल चिकित्सक किसी प्राणी के शरीर में धंसे कांटे को निकालने के लिए यन्त्र (नुकीली शलाका) का प्रयोग करता है, उसी प्रकार सभ्यों 58 / नारदस्मृति