भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 304 में से

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परिपक्वता, सत्य के प्रति दृढ़ता तथा विवेक की गहनता का नाम है। अतः धर्म की रक्षा के दायित्व का निर्वाह न करने वाले वृद्ध भी वृद्ध कहलाने के अधिकारी नहीं। धर्म का शुद्ध रूप सत्य है, जो स्वतः स्पष्ट होता है, जिसमें अस्ति-वास्तविकता का भाव है। सत्यविहीन धर्म जीवरहित देह के समान है। सत्य का मूल तत्त्व निश्छलता है। छल, कपट और धूर्तता से सत्य का दूर का भी नाता नहीं है। इस प्रकार निश्छलता-निष्कपटता और निर्व्याजता का नाम सत्य है, सत्य पर आधृत तथ्यों का नाम धर्म है, धर्म की रक्षा की तत्परता का नाम वार्द्धक्य है और ऐसे वृद्ध पुरुषों की सभा का नाम ही सभा है। अभिप्राय यह है कि छल-रहित सत्य का आश्रय लेना धर्म है और ऐसे धर्म की रक्षा करने वाले महापुरुषों से न्यायालय के सम्मान और प्रतिष्ठा की वृद्धि होती है। ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ 60 / नारदस्मृति