भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 304 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 63

चतुर्थ अध्याय ऋणं देयमदेयं च येन यत्र यथा च यत्। दानग्रहणधर्माभ्यामृणादानमिति स्मृतम्॥ 1 ॥ धर्मशास्त्र में विवेचनीय विषयों के अन्तर्गत सुप्रसिद्ध - ऋण के लेन-देन की प्रक्रिया-स्थान, समय, निर्धारित अवधि, ब्याज, लिखा-पढ़ी, साक्ष्य तथा शर्तों आदि का, अर्थात् ऋणदान सम्बन्धी क़ानून का वर्णन इस प्रकरण में किया जा रहा है। टिप्पणी - यहां ऋण शब्द रूढ़ अर्थ लिये हुए है। जब व्यक्ति अपनी किसी आवश्यकता की पूर्ति अपने साधनों से करने में असमर्थ होता है और वह आवश्यकता इस प्रकार से अपरिहार्य-अनिवार्य होती है कि उसे टाला नहीं जा सकता, और ऐसी स्थिति में जब किसी दूसरे व्यक्ति से प्रत्यावर्तनीय सहायता ली जाती है, तो वह सहायता 'ऋण' कहलाती है। ऐसी सहायता मौखिक, लिखित, अनुबन्धित तथा प्रतिबन्धित रूप से ब्याज पर अथवा बिना ब्याज के एक निश्चित अवधि तक के लिए ली जाती है। यही ऋण के लेन-देन के विवेच्य विषय हैं और यह प्रकरण इन्हीं के वर्णन से सम्बन्धित है। पित्र्युपरते पुत्रा ऋणं दद्युर्यथांशतः। विभक्ता अविभक्ता वा यो वा तामुद्धरेद्धुरम्॥ 2 ॥ पिता के परलोकगामी हो जाने पर उसके द्वारा लिये गये ऋण को उसके सभी विभक्त अथवा अविभक्त पुत्रों द्वारा समान रूप से चुकता करना होता है; क्योंकि सभी पुत्रों पर परिवार का समान दायित्व होता है, अतः ऋण का परिशोधन भी सब का समान दायित्व है। अपने जीवनकाल में लिये गये ऋण के भुगतान का दायित्व तो पिता का होता है, परन्तु उसकी मृत्यु के उपरान्त यह दायित्व पुत्रों का हो जाता है। यदि सभी पुत्र संयुक्त परिवार के रूप में रहते हैं, तो संयुक्त खाते से ऋण का भुगतान करना होता है और यदि भाई अलग हो गये हैं, तो उन्हें अपने-अपने भाग का भुगतान करना चाहिए। इस सम्बन्ध में स्मृतिकार की एक अन्य व्यवस्था यह है कि जो परिवार के दायित्व को संभाले, अर्थात् पिता का उत्तराधिकारी बने, वही ऋण का भुगतान भी नारदस्मृति / 61