नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंइच्छन्ति पितरः पुत्रान् स्वार्थहेतोर्यतस्ततः । उत्तमर्णाधमर्णेभ्यो मामयं मोचयिष्यति ॥ ५॥ यास्काचार्य ने अपने 'निरुक्त' ग्रन्थ में पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार से की है—'पु नाम नरकः ततः त्रायते इति पुत्रः।' नरक का अर्थ है- नरकं न्यरकं नीचैर्गमनम्। इस प्रकार अपने पिता, पितामह को अधोगति, पतन, अर्थात् दुःख, कष्ट, संकट तथा बाधा आदि से निवृत्ति दिलाने वाला ही पुत्र कहलाने का अधिकारी है। ऋण भी तो एक प्रकार का कष्ट और संकट है। यूं तो शास्त्रकार ऋणकर्ता पिता को पुत्र का शत्रु बताने के रूप में ऋण न लेने का पक्ष लेते हैं। निस्सन्देह ऋण न लेना आदर्श स्थिति है, परन्तु प्रायः परिस्थितियों—सम्पत्ति, विशेषतः आवास खरीदना, पुत्री का विवाह निपटाना अथवा परिवार के किसी सदस्य के रोग का उपचार अथवा झंझट से निवृत्ति आदि—की विवशता से ऋण लेना ही पड़ जाता है। पिता, दादा की इस विवशता में उनका साथ देना पुत्र-पौत्र आदि का कर्तव्य-कर्म हो जाता है। इसी सन्दर्भ में नारदजी का कथन है— पितरों की पुत्र-प्राप्ति की उत्कट इच्छा का एक कारण जहां पिण्डदान और तर्पण आदि द्वारा अपने उद्धार की व्यवस्था करना है, वहां एक अन्य कारण उनका स्वार्थ—साहूकार से लिये ऋण से उन्हें मुक्त करना—भी है। शास्त्र की मान्यता के अनुसार अधमर्ण जब तक उत्तमर्ण के ऋण का भुगतान नहीं करता, तब तक उसका उद्धार नहीं हो पाता। इसका अर्थ है—अपने जीवनकाल में ऋण का भुगतान न कर सकने अथवा न करने वाले का भटकते रहना अथवा भूत-प्रेत आदि योनि प्राप्त करना। पुत्र-पौत्र आदि द्वारा स्वयं के द्वारा न लिये अथवा स्वयं के लिए अज्ञात, परन्तु लिखित प्रमाण से सत्यभूत पिता, पितामह आदि के ऋण को चुकता करने पर उनकी मुक्ति होती है—इस सम्भावना एवं आशा से प्रेरित होकर ही पूर्वज पुत्र- लाभ की कामना करते हैं। अतः पूर्वजों की इस आशा एवं अपेक्षा की पूर्ति करना पुत्र-पौत्रादि का धर्म एवं कर्तव्य-कर्म है। इसी से उनके पुत्र-पौत्रत्व की सार्थकता है। टिप्पणी-स्मृतिचन्द्रिकाकार के अनुसार—'जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिः ऋणवान् जायते।' उत्पन्न होने वाले प्रत्येक बालक को तीन-देव, आचार्य और पितृ- ऋणों से मुक्त होना होता है। सन्तानोत्पत्ति के अतिरिक्त पितरों का उद्धार भी पितृ- ऋण से मुक्त होना है। पूजनीयास्त्रयोऽतीता उपजीव्यास्त्रयोऽग्रतः । एतत्पुरुषसन्तानमृणयोः स्याच्चतुर्थके ॥ ६ ॥ पिछली तीन पीढ़ियों के पूर्वज—पिता, पितामह तथा प्रपितामह—पूजनीय हैं और अगली तीन पीढ़ियों के सम्बन्धी—पुत्र, पौत्र तथा प्रपौत्र—सहायता पाने के अधिकारी हैं। मध्य के चतुर्थ व्यक्ति को पूर्वजों का अर्चन-पूजन करना है तथा नारदस्मृति / 63