नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिजनों का पालन-पोषण करना है। इस प्रकार दोनों वर्गों-पूर्ववर्ग तथा परवर्ग- की सेवा-शुश्रूषा से ही ऋणमुक्त होना है; क्योंकि ये एक ही कुल के भीतर आते हैं और पिण्ड लेने के अधिकारी हैं। याच्यमानं न दीयेत ऋणं वापि प्रतिग्रहः। तद्धनं वर्धते तावद्यावत्कोटिशतं भवेत् ॥ ७॥ ऋणदाता द्वारा ऋणकर्ताओं से अपने ऋण की मांग किये जाने पर तथा धरोहर के स्वामी द्वारा धरोहर रखने वाले से अपनी धरोहर की वापसी की मांग किये जाने पर आनाकानी अथवा टाल-मटोल करने पर सम्बद्ध व्यक्ति पर देय पदार्थ का भार सौ गुना बढ़ जाता है, अर्थात् सौ रुपया दस हज़ार बन जाता है। टिप्पणी—स्मृतिचन्द्रिकाकार के अनुसार-सौ गुना बढ़ने का अर्थ न चुकाने की निन्दा करना है और ऋण के परिशोधन की आवश्यकता पर बल देना है। 'मन्मते तु तद्धनं वर्धते इति ऋणवृद्धिसूचनया निन्दार्थवादेन ऋणस्यावश्य परिशोध्यत्वमिति।' कोटिशते तु सम्पूर्णे जायते तस्य वेश्मनि। ऋणसंशोधनार्थाय दासो जन्मनि जन्मनि ॥ ८॥ मांगने पर न चुकाये गये ऋण का ब्याज बढ़ते-बढ़ते जब मूल-धन सौ करोड़ की राशि का हो जाता है, तो उस धन (ऋण) को चुकता करने के लिए अधमर्ण व्यक्ति उत्तमर्ण के घर में दास (अश्व, गर्दभ अथवा शूद्र आदि के रूप में) बनकर उत्पन्न होता है। जब तक ऋण का पूरा भुगतान नहीं हो जाता, तब तक उसे सेवा-कार्य के लिए उसके घर विविध योनियों में जन्मते-मरते रहना पड़ता है। तपस्वी चाग्निहोत्री च ऋणवान् म्रियते यदि । तपश्चैवाग्निहोत्रं च सर्वं तद्धनिनां धनम् ॥ ९॥ अग्निहोत्री-यज्ञ-यागादि सम्पन्न करने वाला अथवा तपस्वी के ऋण का परिशोधन किये बिना ही प्राण त्याग देने पर उसके पुण्य कर्मों—यज्ञ-यागादि तथा तपस्या आदि-का फल स्वयं उसे न मिल कर उत्तमर्ण (धनदाता) को चला जाता है। न पुत्रर्णं पिता दद्याद्दद्यात् पुत्रस्तु पैतृकम् । कामक्रोधसुराद्यूतप्रातिभाव्यकृतं विना ॥ १० ॥ निम्नोक्त पांच व्यसनों के लिए पिता अथवा पुत्र द्वारा लिये ऋण के भुगतान का दायित्व पुत्र अथवा पिता पर नहीं होता। पिता के दुर्व्यसनों के कारण पुत्र को और पुत्र के दुर्व्यसनों के कारण उसके पुत्र को संकट में डालना कदापि उचित नहीं-(1) कामवासना की तृप्ति के लिए वेश्यागमन अथवा परदारागमन अथवा किसी की बहू-बेटी का अपहरण अथवा किसी की बहू बेटी की सहमति से 64 / नारदस्मृति