भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 304 में से

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उसके साथ स्वच्छन्द विहार अथवा बलात्कार ! (2) क्रोध के कारण किसी का सिर-फोड़ देना, किसी की हत्या कर देना, दंगा-फ़साद करना, किसी सम्मानित व्यक्ति का अपमान करना, किसी की सम्पत्ति पर अनुचित रूप से अधिकार करना आदि। इन सबके कारण पुलिस, न्यायालय के निरन्तर चक्कर काटते रहने को विवश होना। (3) मदिरा-पान का आदी हो जाना, (4) द्यूत-क्रीड़ा की लत का लग जाना तथा (5) किसी मित्र, सम्बन्धी का ज़ामिन (उसके द्वारा न चुकाये जाने वाले) ऋण को स्वयं चुकाने का दायित्व (जिम्मा लेना) बनकर उसे ऋण दिलाना और फिर उसके द्वारा न चुका पाने अथवा न चुका सकने की स्थिति में उसके ऋण को चुकता करने के लिए स्वयं को ऋणजाल में फंसाना। इन पांचों आवश्यकताओं का परिवार के भरण-पोषण से अथवा परिवार के हित-संरक्षण से कोई सम्बन्ध नहीं। अतः परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा लिया गया ऋण उसका निजी मामला होता है। परिवार के दूसरे सदस्यों का उससे कुछ लेना-देना नहीं होता। पितुरेव नियोगाद्यः कुटुम्बभरणाय वा। ऋणं वा यत्कृतं कृच्छ्रे दद्यात् पुत्रस्य तत्पिता ॥ 11 ॥ निम्नोक्त परिस्थितियों में पुत्र द्वारा उत्तमर्ण से लिये धन का पिता को भुगतान करना चाहिए—(1) स्वयं पिता की आज्ञा, अनुमति, सहमति से लिया गया ऋण, (2) पिता की जानकारी अथवा अजानकारी में परिवार के भरण-पोषण के लिए लिया गया ऋण तथा (3) परिवारजनों के किसी कष्ट, संकट आदि में ग्रस्त हो जाने पर निष्कृति के लिए उठाया गया ऋण। परिवार की आवश्यकता की पूर्ति के लिए लिये गये ऋण और उसी प्रयोजन पर खर्च किये गये धन के औचित्य-अनौचित्य के झंझट में व व्यय के ढंग आदि के विवाद में न पड़कर ऋण को लौटाने का दायित्व लेना चाहिए। शिष्यान्तेवासिदासस्त्री वैयावृत्त्यकरैश्च यत्। कुटुम्बहेतोःक्षिप्तं दातव्यं तत्कुटुम्बिना ॥ 12 ॥ परिवार के मुखिया की अनुमति, सहमति तथा जानकारी में अथवा इन सब के अभाव में परिवार की किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए निम्नोक्तों— (1) शिष्य, (2) अन्तेवासी (गुरुकुल में रहने वाला, आज की भाषा में छात्रावास या होस्टल में रहने वाला), (3) घर में उत्पन्न अथवा क्रीत दास, (4) माता, बहिन, पुत्री अथवा पत्नी, भाभी आदि निकट सम्बन्ध की स्त्री तथा (5) व्यापार करने की प्रवृत्ति वाले किसी सदस्य—द्वारा लिये गये ऋण का भुगतान परिवार के मुखिया को करना ही चाहिए। ग्राहको यदि नष्टः स्यात् कुटुम्बे च कृतो व्ययः। दातव्यं ज्ञातिभिस्तस्य विभक्तैरपि तदृणम् ॥ 13 ॥ नारदस्मृति / 65