भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 304 में से

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पृष्ठ 69

न स्त्री पतिकृतं दद्यादृणं पुत्रकृतं तथा। अभ्युपेतादृते यद्वा सह पत्या कृतं भवेत् ॥ 16 ॥ यदि प्रतिज्ञा-पत्र में पहले से ही पति द्वारा लिये ऋण का उसकी पत्नी द्वारा तथा पुत्र द्वारा लिये गये ऋण का उसकी माता द्वारा भुगतान का प्रावधान नहीं किया गया, तो ऋण लेने वाले पति के मर जाने पर उसकी पत्नी पर पति के ऋण को तथा ऋणकर्ता पुत्र के मर जाने पर उसकी माता पर पुत्र के ऋण को चुकाने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं। ऐसे ऋण को नष्ट हुआ ही समझना चाहिए। हां, यदि पत्नी अथवा माता ने अपने पति अथवा पुत्र के ऋण में सहभागिनी होने की शपथ ली हुई है, तो उन्हें उस ऋण का भुगतान करना ही होता है। दद्यादपुत्रविधवा नियुक्ता वा मुमूर्षुणा। यो वा तद्रिक्थमादत्ते यतो रिक्थमृणं ततः॥ 17 ॥ यदि पति ने मरते समय किसी से लिये ऋण के भुगतान का निर्देश पत्नी को दिया है, तो पुत्र-हीना विधवा को वह ऋण अवश्य ही चुकाना पड़ता है अथवा यह ऋण उत्तराधिकारी बनने वाले सम्बन्धी को चुकाना पड़ता है; क्योंकि वास्तव में देय और ग्राह्य (Liability and Assets) का अभिन्न सम्बन्ध है। सम्पत्ति लेने वाले को देनदारी भी निभानी पड़ती है। इसी तथ्य को 'विष्णुस्मृति' में भी स्वीकार किया गया है— य एवं रिक्थं गृह्णाति स एव ऋणं ददाति। यतो रिक्थं सञ्चरति तत ऋणमपीत्युक्तम्। न च भार्याकृतमृणं पत्युर्वापि कथं भवेत्। आपत्कृतादृते पुंसां कुटुम्बार्थो हि दुस्तरः ॥ 18 ॥ पति के किसी दूर स्थान को चले जाने के कारण असहाय हो जाने पर आपत्काल—परिवार के किसी दायित्व—लड़की का विवाह, रोग-उपचार, बच्चे की उच्च शिक्षा तथा मकान की मरम्मत आदि—के निर्वाह आदि परिस्थिति में पत्नी द्वारा लिये ऋण को चुकाने को तो पति बाध्य है, परन्तु सामान्य स्थिति में पत्नी द्वारा लिये ऋण के भुगतान का पति पर कोई दायित्व नहीं। टिप्पणी—यदि सामान्य स्थिति में पत्नी ऋण लेती है, तो वह उसका उपयोग अपनी विलासिता आदि किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए करती है। अतः पति को उसकी भरपाई नहीं करनी पड़ती है, परन्तु हां, असामान्य स्थिति में ऋण लेना तो उसकी विवशता है। पति द्वारा आवश्यकता की पूर्ति के लिए धन उपलब्ध न कराने पर ही उसे किसी दूसरे के आगे हाथ पसारना पड़ता है। अतः उस ऋण को चुकाने का दायित्व पुरुष (पति) पर डालना सर्वथा न्यायसंगत ही है। नारदस्मृति / 67