भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 304 में से

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पृष्ठ 70

अन्यत्र रजकव्याधगोपशौण्डिकयोषिताम्। तेषां तत्प्रत्यया वृत्तिः कुटुम्बं च तदाश्रयम् ॥ १९॥ धोबी, बहेलिया, ग्वाला और नट, नर्तक आदि की स्त्रियों द्वारा लिये गये ऋण को चुकाना पतियों का कर्तव्य-कर्म है; क्योंकि ऋणदाता स्त्रियों को इस विश्वास पर ही ऋण देता है कि परिवार के भरण-पोषण का दायित्व इनके पतियों पर है, तो वे अपने पतियों की ओर से ऋण ले रही हैं। अतः पुरुषों पर कुटुम्ब की निर्भरता ही ऋण चुकाने का आधार है। पुत्रिणी तु समुत्सृज्य पुत्रं स्त्री यान्यमाश्रयेत्। तस्या द्रव्यं हरेत् सोऽन्यो निःस्वायाः पुत्र एव तु ॥ २० ॥ यदि पुत्रवती विधवा स्त्री अपने पुत्र को छोड़कर अन्य पुरुष का वरण कर लेती है, तो उसके स्त्रीधन पर उसके नये पति का अधिकार होता है। पुत्र उसकी मांग नहीं कर सकता। यदि स्त्रीधन नहीं है, तो पुनर्विवाह करने वाली स्त्री अपने पूर्वपति की चल-अचल सम्पत्ति को अपने साथ नहीं ले जा सकती। उस सम्पत्ति पर उसका कोई अधिकार ही नहीं रह जाता, उस पर केवल उसके पुत्र का ही अधिकार होता है। अभिप्राय यह है कि स्त्रीधन पर केवल स्त्री का और पितृधन पर केवल पुत्र का ही एकाधिकार होता है। पुनर्विवाह करने वाली स्त्री अपने स्त्रीधन को अपने साथ ले जा सकती है और विवाह के पश्चात् स्त्री के उस धन पर उसके नये पति का अधिकार हो जाता है। या तु सप्रधनैव स्त्री सापत्या चान्यमाश्रयेत्। सोऽस्या दद्यादृणं भर्तुरुत्सृजेद्वा तथैव ताम् ॥ २१ ॥ अपने पुत्र तथा पति द्वारा लिये गये ऋण को अपने ऊपर ओढ़कर दूसरे पुरुष से विवाह करने वाली विधवा स्त्री के नये पति को उसके पूर्वपति तथा पुत्र के ऋण को चुकता करके उसे उऋण करना ही पड़ता है, अर्थात् इसे विवाह की एक आवश्यक शर्त मानकर चलना होता है। यदि पुरुष उस ऋण को चुकाने में असमर्थ है, तो उसे विवाह ही नहीं करना चाहिए। अधनस्य ह्यपुत्रस्य मृतस्योपैति यः स्त्रियम्। स आभजेदृणं वोढुः सैव तस्य धनं यतः ॥ २२ ॥ किसी निर्धन एवं पुत्रहीन, परन्तु ऋणग्रस्त पुरुष के मर जाने पर उसकी विधवा एवं अपुत्रवती स्त्री से विवाह करने वाले पुरुष को उस स्त्री के पूर्वपति के ऋण को चुकता करना होता है; क्योंकि इस स्थिति में मृतपुरुष की पत्नी ही उसका रिक्थ (धन) है और यह नियम है कि जो रिक्थ को ग्रहण करता है, देनदारी का वहन भी उसे ही करना होता है। अतः मृत पुरुष की पत्नी के पाणिग्रहण करने वाले 68 / नारदस्मृति