नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
अन्यत्र रजकव्याधगोपशौण्डिकयोषिताम्। तेषां तत्प्रत्यया वृत्तिः कुटुम्बं च तदाश्रयम् ॥ १९॥ धोबी, बहेलिया, ग्वाला और नट, नर्तक आदि की स्त्रियों द्वारा लिये गये ऋण को चुकाना पतियों का कर्तव्य-कर्म है; क्योंकि ऋणदाता स्त्रियों को इस विश्वास पर ही ऋण देता है कि परिवार के भरण-पोषण का दायित्व इनके पतियों पर है, तो वे अपने पतियों की ओर से ऋण ले रही हैं। अतः पुरुषों पर कुटुम्ब की निर्भरता ही ऋण चुकाने का आधार है। पुत्रिणी तु समुत्सृज्य पुत्रं स्त्री यान्यमाश्रयेत्। तस्या द्रव्यं हरेत् सोऽन्यो निःस्वायाः पुत्र एव तु ॥ २० ॥ यदि पुत्रवती विधवा स्त्री अपने पुत्र को छोड़कर अन्य पुरुष का वरण कर लेती है, तो उसके स्त्रीधन पर उसके नये पति का अधिकार होता है। पुत्र उसकी मांग नहीं कर सकता। यदि स्त्रीधन नहीं है, तो पुनर्विवाह करने वाली स्त्री अपने पूर्वपति की चल-अचल सम्पत्ति को अपने साथ नहीं ले जा सकती। उस सम्पत्ति पर उसका कोई अधिकार ही नहीं रह जाता, उस पर केवल उसके पुत्र का ही अधिकार होता है। अभिप्राय यह है कि स्त्रीधन पर केवल स्त्री का और पितृधन पर केवल पुत्र का ही एकाधिकार होता है। पुनर्विवाह करने वाली स्त्री अपने स्त्रीधन को अपने साथ ले जा सकती है और विवाह के पश्चात् स्त्री के उस धन पर उसके नये पति का अधिकार हो जाता है। या तु सप्रधनैव स्त्री सापत्या चान्यमाश्रयेत्। सोऽस्या दद्यादृणं भर्तुरुत्सृजेद्वा तथैव ताम् ॥ २१ ॥ अपने पुत्र तथा पति द्वारा लिये गये ऋण को अपने ऊपर ओढ़कर दूसरे पुरुष से विवाह करने वाली विधवा स्त्री के नये पति को उसके पूर्वपति तथा पुत्र के ऋण को चुकता करके उसे उऋण करना ही पड़ता है, अर्थात् इसे विवाह की एक आवश्यक शर्त मानकर चलना होता है। यदि पुरुष उस ऋण को चुकाने में असमर्थ है, तो उसे विवाह ही नहीं करना चाहिए। अधनस्य ह्यपुत्रस्य मृतस्योपैति यः स्त्रियम्। स आभजेदृणं वोढुः सैव तस्य धनं यतः ॥ २२ ॥ किसी निर्धन एवं पुत्रहीन, परन्तु ऋणग्रस्त पुरुष के मर जाने पर उसकी विधवा एवं अपुत्रवती स्त्री से विवाह करने वाले पुरुष को उस स्त्री के पूर्वपति के ऋण को चुकता करना होता है; क्योंकि इस स्थिति में मृतपुरुष की पत्नी ही उसका रिक्थ (धन) है और यह नियम है कि जो रिक्थ को ग्रहण करता है, देनदारी का वहन भी उसे ही करना होता है। अतः मृत पुरुष की पत्नी के पाणिग्रहण करने वाले 68 / नारदस्मृति
को कर्तव्य-रूप से एवं तदर्थ-भाव से उसके ऋण का भुगतान करना पड़ता है। धनस्त्रीहारिपुत्राणामृणभाग् यो धनं हरेत्। पुत्रोऽसतोः स्त्रीधनिनोः स्त्रीहारी धनिपुत्रयोः ॥ 23 ॥ ऋणग्रस्त धनहीन व्यक्ति के मर जाने पर, यदि उसका पुत्र अपने पिता के ऋण को चुकाने में अपने को असमर्थ पाकर अपने पिता के नाम-मात्र (थोड़े- बहुत) रिक्थ को भी लेने से इनकार कर देता है, तो उस रिक्थ को लेने के लिए आगे आने वाले व्यक्ति को ऋणशोधन करना चाहिए। यदि कोई भी ऋण चुकाने और रिक्थ संभालने को उद्यत नहीं होता और उसकी विधवा स्त्री किसी दूसरे पुरुष से विवाह कर लेती है, तो उस स्त्री का हरण अथवा वरण करने वाले पुरुष को उसके पूर्वपति के ऋण को चुकाना होता है; क्योंकि यहां स्त्री ही रिक्थ है और रिक्थ के साथ ऋणशोधन भी जुड़ा हुआ है। अन्तिमा स्वैरिणीनां या उत्तमा च पुनर्भूवाम्। ऋणं तयोः पतिकृतं दद्याद्यस्ते समश्नुते ॥ 24 ॥ स्त्री भले ही उत्तम कोटि की पुनर्भू-छोटी आयु में पति से वियुक्त अथवा सन्तानहीन अथवा पति के परिवारजनों का दबाव अथवा पितृपक्ष में आत्मीयता का अभाव-सौतेली मां, मां का न होना, भाई-बहिनों का न होना अथवा निर्धन होना अथवा अपेक्षावृत्ति का होना-आदि कारणों से पुनर्विवाह के लिए उद्यत होने वाली हो अथवा स्वैरिणी-प्रबल कामवासना के कारण पर-पुरुष की अपेक्षा रखने वाली-हो, तो उससे विवाह करने वाले पुरुष को उसके पूर्वपति द्वारा उठाये ऋण का भुगतान करना ही होता है। भार्या स्नुषा च भृत्या च भार्यायाश्च परिग्रहः। एतावद्भिश्चर्णं देयं भूमिं यश्चोपजीवति ॥ 25 ॥ परिवार के भरण-पोषण के अथवा परिवार पर आयी किसी विपत्ति-रोग, मृत्यु, राजा का कोप (Police harassment) तथा विवाह आदि-के उद्धार के लिए निम्नोक्त सभी सदस्यों द्वारा किसी धनिक से लिये गये ऋण का भुगतान परिवार के मुखिया अथवा अभिभावक बने सदस्य अथवा सदस्यों को करना होता है-(1) पत्नी, (2) पुत्रवधू तथा (3) गृहसेविका-वेतन पर कार्य करने वाली तथा पत्नी पर आश्रित रहने वाली महिला-उसकी बहिन अथवा अन्य निकट सम्बन्धिनी, जिसे उसने अपने घर में प्रश्रय दे रखा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि स्त्रियों को साधारण लेन-देन का ही अधिकार है, अचल सम्पत्ति के सम्बन्ध में उनके द्वारा किया गया लेन-देन अवैध होता है। स्त्रीकृतान्यप्रमाणानि कार्याण्याहुर्मनीषिणः। विशेषतो गृहक्षेत्रदानाधमनविक्रया ॥ 26 ॥ नारदस्मृति / 69
मनीषियों और विधिवेत्ताओं के अनुसार माता, पत्नी तथा पुत्री आदि स्त्रियों को विशेषतः घर और क्षेत्र आदि के दान, विक्रय तथा बन्धक रखने का कोई अधिकार नहीं है। इनके द्वारा इस प्रकार किये गये अनुबन्ध अवैध एवं अप्रामाणिक हो जाते हैं। अभिप्राय यह है कि नारी को केवल असामान्य स्थिति में और वह भी छोटे- मोटे ऋण लेने की छूट है, अन्यथा उसे चल-अचल सम्पत्ति के साथ छेड़-छाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है। उनके साथ किये गये सौदे निरस्त माने जाते हैं। एतान्येव प्रमाणानि भर्त्ता यद्यनुमन्यते । पुत्रः पत्युरभावे च राजा च पतिपुत्रयोः ॥ 27 ॥ पति की अथवा पति के अभाव में पुत्र की और दोनों के अभाव में राजा (शासन) की अनुमति प्राप्त होने पर स्त्रियों द्वारा सम्पत्ति के क्रय-विक्रय सम्बन्धी किये गये सौदे वैध एवं प्रामाणिक माने जाते हैं। अभिप्राय यह है कि विदेश में होने के कारण अथवा चिकित्सालय में प्रविष्ट होने के कारण अथवा अन्य किसी कारणवश पति अथवा पुत्र लेन-देन के लिए सभा में उपस्थित नहीं हो सकते और पत्नी या माता को अधिकृत कर देते हैं (Power of Attorny दे देते हैं), तो स्त्री द्वारा किये गये सौदे उसके पति-पुत्र द्वारा किये गये माने जायेंगे, इस प्रकार उनकी वैधता अक्षुण्ण होगी। इसी प्रकार पति- पुत्रविहीना स्त्री द्वारा प्रशासन से हरी झण्डी (Clearance) लेने के उपरान्त ही किये गये सौदे मान्य होते हैं। भर्त्रा प्रीतेन यद्दत्तं स्त्रियै तस्मिन् मृतेऽपि तत् । सा यथाकाममश्नीयाद्दद्याद्वा स्थावरादृते ॥ 28 ॥ पति ने प्रसन्न होकर स्वेच्छा से जो कुछ अपनी पत्नी को दे दिया है, पति की मृत्यु के उपरान्त भी पतिप्रदत्त उस सम्पत्ति पर पत्नी का अधिकार अक्षुण्ण बना रहता है, उसे कोई छीन नहीं सकता। वह अचल सम्पत्ति को छोड़कर चल सम्पत्ति-स्वर्ण, नक़दी, आभूषण, वस्त्र एवं सब प्रकार के सामान-का यथेष्ट उपयोग करने को स्वतन्त्र है। टिप्पणी - 'मदनरत्नम्' ग्रन्थकार के अनुसार-भर्तृ दत्तस्थावरोपभोगमात्र- मेवस्त्रीभिर्मृताविभक्तपतिकाभिः कर्त्तव्यम्, न तु दानादिकमित्यर्थः । अर्थात् पति द्वारा प्रीतिवश दी गयी स्थावर सम्पत्ति का उपयोग स्त्री पति के जीवनकाल में तथा उसके मरणोपरान्त परिवार के सदस्यों के विभक्त अथवा अविभक्त रहते करने को तो स्वतन्त्र है, परन्तु उसे किसी को वह सम्पत्ति दान में देने, बेचने अथवा बन्धक रखने का कोई अधिकार नहीं है। 70 / नारदस्मृति
यथा दासकृतं कार्यमकृतं परिचक्षते। अन्यत्र स्वामिसन्देशान्न दासः प्रभुरात्मनः ॥ २९ ॥ स्त्रियों के समान ही दासों के द्वारा भी स्वामी द्वारा अनुमत कार्य को सम्पन्न करने पर मान्यता है। स्वामी से अनुमति प्राप्त किये बिना स्वेच्छा से दास द्वारा किये किसी भी कार्य का दायित्व स्वामी का नहीं होता। सेवक को सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि वह सेवक है, स्वामी नहीं, अर्थात् उसे निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं, उसका कर्तव्य कर्म तो केवल स्वामी के आदेश का पालन करना है। सेवक के साथ व्यवहार करने वालों को भी सेवक की सीमा और उसके कार्यक्षेत्र को ध्यान में रखना चाहिए, अन्यथा उनका दुखी होना स्वाभाविक ही है। पुत्रेणापि कृतं कार्यं यत्स्यादच्छन्दतः पितुः। तदप्यकृतमेवाहुर्दासः पुत्रश्च तत्समौ ॥ ३० ॥ दास के समान ही पिता के जीवित होने पर उसकी अनुमति के बिना पुत्र द्वारा किया गया व्यवहार—लेन-देन—भी अप्रामाणिक हो जाता है; क्योंकि पुत्र सम्पत्ति का स्वामी ही नहीं बना। स्वामित्व और अधिकार-पत्र (Power of Attorny) के अभाव में किया गया व्यवहार तो वैध हो ही नहीं सकता। अभिप्राय यह है कि पुत्र के साथ व्यवहार करने वालों का हित इसी में है कि वे यह निश्चित कर लें कि विचारणीय सम्पत्ति पुत्र के स्वामित्व की अथवा पिता द्वारा अनुमत है अथवा नहीं। इस तथ्य की निश्चित जानकारी प्राप्त किये बिना सहसा व्यवहार करने वालों को प्रायः पछताना ही पड़ता है। स्मृतिकार के अनुसार दास और पुत्र एक समान ही हैं। दोनों स्वामी नहीं, अपितु स्वामी अथवा पिता के आदेश-वाहक हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि सेवक वेतनभोगी है और पुत्र दाय-भागी है। मूल अधिकार तो पिता के पास सुरक्षित है। अप्राप्तव्यवहारश्चेत् स्वतन्त्रोऽपि हि नर्णभाक्। स्वातन्त्र्यं हि स्मृतं ज्येष्ठे ज्यैष्ठ्यं गुणवयः कृतम् ॥ ३१ ॥ पिता की मृत्यु हो जाने पर भी अवयस्क व्यवहार करने में अकुशल पुत्र को परिवार की सम्पत्ति को बन्धक रखने का और उस पर ऋण लेने का अधिकार नहीं, बेचने का तो प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। हां, इस स्थिति में ज्येष्ठ पुत्र को अवश्य यह सब करने—आवश्यकता के अनुसार सम्पत्ति को बेचने अथवा बन्धक रखने— का अधिकार है, परन्तु ज्येष्ठता के दो आधार हैं—आयु तथा गुण। गुण को ज्येष्ठता का आधार मानने का अर्थ है कि यदि ज्येष्ठ भ्राता ज्येष्ठ तो है, परन्तु श्रेष्ठ नहीं, अर्थात् अग्रज होने पर भी द्वितीय अथवा तृतीय भाई (अनुज) से बुद्धि में पिछड़ा हुआ है, तो पैतृक सम्पत्ति के हस्तान्तरण का अधिकार गुणहीन से छिनकर गुणवान् के पास चला जायेगा। हां, बौद्धिक उत्कर्ष में समानता होने पर आयु को गौरव मिलेगा। नारदस्मृति / 71
त्रयः स्वतन्त्रा लोकेऽस्मिन् राजाचार्यस्तथैव च। प्रतिवर्णं च सर्वेषां वर्णानां स्वे गृहे गृही ॥ 32 ॥ इस संसार में तीन व्यक्ति ही स्वतन्त्र हैं—राजा, आचार्य तथा अपने वर्ण में स्थित घर का मुखिया। ये तीनों जो कुछ भी करना चाहें, कर सकते हैं। इन्हें अपने अपने क्षेत्र—राजा को राज्य में, आचार्य को गुरुकुल अथवा आश्रम में तथा गृहपति को अपने घर-परिवार—में कुछ करने के लिए किसी की अनुमति नहीं लेनी पड़ती। अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः स्वतन्त्रः पृथिवीपतिः। अस्वतन्त्रः स्मृतः शिष्यः आचार्ये तु स्वतन्त्रता ॥ 33 ॥ इसी तथ्य की आवृत्ति करते हुए स्मृतिकार का कथन है—राजा स्वतन्त्र है और उसके द्वारा शासित एवं उसके अधीनस्थ प्रजा परतन्त्र है; क्योंकि प्रजा राजा के आदेश-निर्देश का पालन करने को बाध्य है। आचार्य स्वतन्त्र है और उससे शिक्षा ग्रहण करने वाला एवं उसके आश्रम में रहने वाला छात्र परतन्त्र है; क्योंकि उसे गुरु के आदेश से अथवा उनके द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार ही अपनी दिनचर्या बनानी पड़ती है। अस्वतन्त्रा स्त्रियः पुत्रा दासादिश्च परिग्रहः। स्वतन्त्रस्तत्र तु गृही यस्य यत् स्यात् क्रमागतम् ॥ 34 ॥ इसी प्रकार गृहस्वामी स्वतन्त्र है और अपने भरण-पोषण के लिए उस पर आश्रित स्त्रियां, पुत्र, दास-दासियां तथा अन्य सम्बन्धी परतन्त्र हैं; क्योंकि कुल- परम्परा से प्राप्त सम्पत्ति की रक्षा और वृद्धि तथा नयी सम्पत्ति के अर्जन के साथ- साथ परिवार के सभी सदस्यों के भरण-पोषण का व उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति का सारा दायित्व गृहस्वामी का ही है। गर्भस्थसदृशो ज्ञेयः अष्टमाद् वत्सराच्छिशुः। बाल आषोडशाद् वर्षात् पोगण्ड इति शस्यते ॥ 35 ॥ आठ वर्ष की आयु तक के बालक को गर्भस्थ बालक के समान समझना चाहिए, अर्थात् उससे किसी प्रकार का व्यवहार करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सत्य तो यह है कि जब तक बालक सोलह वर्ष का नहीं हो जाता, तब तक उसे पोगण्ड (अनाड़ी) ही समझना चाहिए। वस्तुतः यह आयु तो बालक के खेलने-कूदने और मौज-मस्ती करने की होती है। इस आयु में उसे किसी प्रकार का कोई दायित्व सौंपना, उसके बचपन की हत्या करना ही है। टिप्पणी—मनु ने भी पांच वर्ष तक बालक को लाड़-प्यार करने का और 72 / नारदस्मृति
दस वर्षों तक प्रशिक्षित करने का विधान किया है। बालक के सोलह वर्षों का होने पर उसके साथ मित्रवत् व्यवहार करने का निर्देश किया है, जिसका अर्थ है कि बालक सोलह वर्षों की आयु में ही समझदार हो पाता है— लालयेत् पञ्चवर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्॥ परतो व्यवहारज्ञः स्वतन्त्रः पितरौ बिना। जीवतोरस्वतन्त्रः स्याज्जरयापि समन्वितः ॥ 36 ॥ सोलह वर्ष से ऊपर की आयु का होने पर बालक को व्यवहारकुशल समझना चाहिए और तब वह माता-पिता की अनुमति अथवा सहमति के बिना भी व्यवहार करने को स्वतन्त्र हो जाता है। इस प्रकार पुत्र को अपने व्यवहारकुशल हो जाने पर और माता-पिता के वृद्ध, रोगग्रस्त और असमर्थ हो जाने पर भी उनके जीवनकाल तक अपने को उनके अधीन-अस्वतन्त्र मानकर ही चलना चाहिए। तयोरपि पिता श्रेयान् बीजप्राधान्यदर्शनात्। अभावे बीजिनो माता तदभावे तु पूर्वजः ॥ 37 ॥ पुत्र के लिए माता और पिता दोनों ही समान रूप से आदरणीय हैं, परन्तु फिर भी माता की अपेक्षा पिता का महत्त्व कहीं अधिक है; क्योंकि योनि (धरती) की अपेक्षा वीर्य (बीज) की प्रधानता सर्वसम्मत है। पिता अथवा पति के न रहने पर माता और माता के न रहने पर ज्येष्ठ पुत्र (भाइयों के हिसाब से अग्रज अथवा ज्येष्ठ भ्राता) स्वतन्त्र है। पति के जीवनकाल में पत्नी की और माता के जीवनकाल में पुत्रों की परतन्त्रता निश्चित है। स्वतन्त्राः सर्व एवैते परतन्त्रेषु सर्वदा। अनुशिष्टौ विसर्गे च विक्रये चेश्वरा मताः ॥ 38 ॥ उपर्युक्त राजा, आचार्य और गृहपति अपने परतन्त्र विषयों—प्रजा, शिष्य तथा आश्रित सदस्य—के सन्दर्भ में ही स्वतन्त्र हैं। राजा प्रजा के, आचार्य शिष्य के तथा गृहपति परिवारजनों के अनुशासन में तथा अपनी सम्पत्ति के दान एवं विक्रय में स्वतन्त्र एवं सम्प्रभुता प्राप्त हैं। यद्बालः कुरुते कार्यमस्वतन्त्रस्तथैव च। अकृतं तदिति प्राहुर्धर्मशास्त्रविदो जनाः ॥ 39 ॥ जिस प्रकार बालक द्वारा किये गये व्यवहार को अमान्य एवं अप्रामाणिक माना जाता है, उसी प्रकार स्वतन्त्रों के स्थान पर परतन्त्रों द्वारा, अर्थात् राजा के स्थान पर प्रजाजनों द्वारा, आचार्य के स्थान पर शिष्य द्वारा तथा गृहपति के स्थान पर आश्रितों द्वारा किये गये कार्य को भी सर्वथा अप्रामाणिक एवं असिद्ध ही मानना चाहिए। नारदस्मृति / 73
कामक्रोधाभिभूतार्तभयव्यसनपीडिताः । रागद्वेषपरीताश्च श्रेयास्त्वप्रकृतिं गताः ॥ 40 ॥ निम्नोक्त स्थितियों के प्राणियों को अस्वस्थ और उनके द्वारा किये गये व्यवहार को भी अप्रामाणिक एवं असिद्ध मानना चाहिए—(1) काम और क्रोध से अभिभूत, (2) आर्त-संकटग्रस्त, (3) भयग्रस्त, (4) व्यसन-पीडित तथा (5) राग द्वेष में आसक्त। ऐसे प्राणी व्यवहार में अपने विवेक का प्रयोग-उपयोग नहीं कर पाते। वे भावना एवं आवेश के वशीभूत होकर ग़लत-सही का निर्णय नहीं कर सकते। यही कारण है कि क़ानून इनके व्यवहार को मान्यता नहीं देता। स्वतन्त्रोऽपि हि यत्कार्यं कुर्यादप्रकृतिं गतः । अकृतं तदपि प्राहुरस्वातन्त्र्यस्य हेतुतः ॥ 41 ॥ स्वतन्त्र, अर्थात् सभी प्रकार के व्यवहार करने में सक्षम एवं पूर्ण अधिकार- सम्पन्न व्यक्ति के भी प्रकृतिस्थ न रहने की स्थिति में किये गये व्यवहार को अकृत ही समझना चाहिए; क्योंकि मदिरा, द्यूत तथा दारागमन आदि दुर्व्यसनों के अधीन व्यक्ति कभी स्वतन्त्र एवं विवेक से कार्य करने वाला हो ही नहीं सकता। अभिप्राय यह है कि व्यक्ति वयस्क और अपनी सम्पत्ति का सार्वभौम स्वामी होने के नाते लेन-देन करने को स्वतन्त्र एवं समर्थ अवश्य होता है, परन्तु यदि उसने मदिरापान कर रखा है अथवा द्यूत-क्रीड़ा तथा व्यभिचार आदि व्यसनों का शिकार है, तो निश्चित है कि अपने दुर्व्यसनों में ग्रस्त ऐसा व्यक्ति अपनी सम्पत्ति को औने-पौने दामों में भी बेचने को विवश हो जायेगा; क्योंकि उत्कट वासना- पूर्ति की इच्छा ने उस पर अधिकार कर रखा है और उसकी सद्बुद्धि एवं विवेक- शक्ति को कुण्ठित कर दिया है। अतः ऐसे व्यक्ति द्वारा किये गये व्यवहार को निरस्त मानना सर्वथा उचित ही है। कुले ज्येष्ठस्तथा श्रेष्ठः प्रकृतिस्थश्च यो भवेत् । तत्कृतं तु कृतं प्राहुर्वा स्वतन्त्रकृतं कृतम् ॥ 42 ॥ वास्तव में परिवार में आयु की दृष्टि से ज्येष्ठ तथा गुण, विद्या एवं आचार की दृष्टि से श्रेष्ठ होने के अतिरिक्त पूर्ण स्वस्थ, अर्थात् मदिरा आदि के नशे से मुक्त तथा किसी विषय-वासना एवं व्यसन आदि के वश में न रहने वाले, पूर्ण स्वतन्त्र व्यक्ति द्वारा सम्पन्न किया गया व्यवहार ही सिद्ध एवं प्रामाणिक होता है। परतन्त्र--मदिरा के नशे में धुत, उद्दाम वासना से पीड़ित, द्यूत में हारा और खेलने के लिए उन्मत्त- व्यक्ति तो कभी सही निर्णय ले ही नहीं सकता। इस प्रकार व्यसनों के दास द्वारा गया किया कार्य अप्रामाणिक ही होता है। टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार भूत-प्रेतादि का शिकार बने, 74 / नारदस्मृति
तथा द्यूत आदि व्यसनों में फंसे व्यक्ति को स्वभाव (प्रकृति) से परित्यक्त ही समझना चाहिए। इस प्रकार के कारणों से स्वतन्त्र व्यक्ति भी स्वतन्त्र निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है। इसी कारण उसके द्वारा किये गये कार्यों—दान, क्रय-विक्रय तथा बन्धक आदि—को नशे में किये कार्यों के रूप में—असिद्ध ही मानना चाहिए— भूतगृहीतो वा द्यूतादिव्यसनगृहीतो वा स्वभावप्रकृतिपरित्यक्तः। अनेन हेतुना स्वतन्त्रोऽपि अस्वतन्त्रः सहेतुकः। धनमूलाः क्रिया सर्वा यत्नस्तत्साधने मतः। रक्षणं वर्धनं भोग इति तस्य विधिः क्रमात् ॥ 43 ॥ संसार के व्यक्तियों द्वारा किये जाने वाले सभी कार्यों का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष सम्बन्ध धन से है। धन ही वह केन्द्रबिन्दु है, जिसके चारों ओर सभी कार्य चक्कर काटते रहते हैं। अतः सभी व्यक्तियों को धन की प्राप्ति के लिए उद्यम करना चाहिए। इस उद्यम के तीन उपाय अथवा प्रकार हैं—प्रथम, उपार्जित धन की सुरक्षा, द्वितीय, सुरक्षित धन का वर्द्धन करना और तृतीय, वर्द्धित धन का भोग, अर्थात् सदुपयोग करना। टिप्पणी—धर्मशास्त्र की मान्यता है कि धन के दो ही उपयोग हैं—दान तथा भोग, अर्थात् स्वयं खाना अथवा दूसरों को खिलाना। इन दोनों कार्यों—स्वयं भी न खाना और दूसरों को भी न खिलाना—में न आने वाले धन की तीसरी गति, उसका नाश होना है। दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य। यो न ददाति न भुंक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥ अतः यहां धन के रक्षण और वर्द्धन के उपरान्त तीसरे स्थान पर उसके यथोचित उपभोग का उल्लेख किया गया है। तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं शुक्लं शबलमेव च। कृष्णं च तस्य विज्ञेयः प्रभेदः सप्तधा पृथक् ॥ 44 ॥ धन के तीन प्रकार-भेद हैं—शुक्ल, शबल और कृष्ण। इन तीनों के पुनः सात-सात भेद होते हैं। श्रुतशौर्यतपः कन्याशिष्ययाज्यान्वयागतम्। धनं सप्तविधं शुक्लमुद्योगस्तस्य तद्विधः ॥ 45 ॥
- विद्या (अध्यापन), 2. शौर्य (युद्ध, पौरुष), 3. कठोर श्रम (तपस्या),
- शिष्य (दक्षिणा-रूप में), 5.पौरोहित्य (यज्ञादि सम्पन्न कराने पर प्राप्त दान- दक्षिणा), 6. कन्या (कन्या के विवाह के बदले प्राप्त) तथा 7. दाय भाग (उत्तराधिकार में प्राप्त पैतृक सम्पत्ति) आदि सात प्रकार के धन शुक्ल (White Money) कहलाते हैं। इन साधनों से धन की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला उद्योग भी सात्त्विक होता नारदस्मृति / 75
है। यहां किसी प्रकार के दुराव-छिपाव के लिए अवकाश ही नहीं है। कुसीदकृषिवाणिज्यशुल्कशिल्पानुवृत्तिभिः । कृतोपकारादाप्तं च शबलं समुदाहृतम् ॥ 46 ॥ निम्नोक्त सात साधनों से प्राप्त धन शबल—न शुक्ल, न श्याम (Neither White, nor black)—मध्यम कोटि का कहलाता है—1. ब्याज, 2. कृषि, 3. व्यापार, 4. शुल्क—काम करने का निर्धारित एवं निश्चित पारिश्रमिक (Fee), 5. शिल्प -मूर्ति, चित्र तथा स्थापत्य आदि उपयोगी कलाओं के विक्रय से प्राप्त धन, 6. सेवा-चाकरी तथा 7. उपकृत व्यक्ति द्वारा उऋण होने के लिए उपहार के रूप में समर्पित धन। उत्कोचद्यूतदौत्यर्तिप्रतिरूपकसाहसैः । व्याजेनोपार्जितं यच्च कृष्णं हि तदुदाहृतम् ॥ 47 ॥ निम्नोक्त सात साधनों द्वारा प्राप्त धन काला धन कहलाता है—1. घूस, 2. द्यूतक्रीड़ा, 3. दूतकर्म, 4. दूसरों का मन दुखाकर एवं उन्हें पीड़ा पहुंचाकर उनसे बलपूर्वक छीना गया, 5. चोरी, 6. डकैती तथा 7. छल-कपट, धोखाधड़ी। तेन क्रयो विक्रयश्च दानं ग्रहणमेव च। विविधाश्च प्रवर्त्तन्ते क्रियाः सम्भोग एव च ॥ 48 ॥ संसार में सभी कार्य—क्रय-विक्रय, दान-प्रतिग्रह के अतिरिक्त अन्यान्य नाना प्रकार के उपभोग—इन्हीं तीन शुक्ल, शबल तथा श्याम प्रकार के धनों से ही सम्पन्न होते हैं। यथाविधेन द्रव्येण यत्किञ्चित् कुरुते नरः । तथाविधमवाप्नोति सफलं प्रेत्य चेह च ॥ 49 ॥ इन तीनों—शुक्ल, शबल और कृष्ण—प्रकार के धनों में जिस प्रकार के धन से व्यक्ति शुभाशुभ कार्य करता है, उसे इस लोक में तथा परलोक में उसी प्रकार का फल मिलता है। अभिप्राय यह है कि शुद्ध ढंग से कमाये धन से शुभकर्मों का उत्तम फल और दूसरे धनों से किये कर्मों का मध्यम या अधम फल मिलता है। तत्पुनर्द्वादशविधं प्रतिवर्णाश्रयात्स्मृतम् । साधारणं स्यात्त्रिविधं शेषं नवविधं विदुः ॥ 50 ॥ धन के ये तीनों—शुक्ल, शबल और कृष्ण—रूप चारों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—वर्णों के सन्दर्भ में बारह प्रकार के हो जाते हैं। धन के उपर्युक्त तीन रूप-भेद तो सामान्य हैं, अर्थात् चारों वर्णों के लोग सामान्य रूप से धन के अर्जन में शुक्ल, शबल और कृष्ण साधनों का प्रयोग-उपयोग करते हैं। अतः धन के ये तीन सामान्य अथवा साधारण रूप भेद हैं, परन्तु नौ रूपों में दो की विशेष स्थिति है। उदाहरणार्थ, सामान्यतः ब्राह्मण और क्षत्रिय केवल शुक्ल धन को, वैश्य 76 / नारदस्मृति
शुक्ल और शबल धन को और शूद्र शुक्ल, शबल तथा कृष्ण धन को अर्जित करते हैं। इसके अतिरिक्त इन चारों वर्णों में उत्तम, मध्यम और अधम प्रकृति के प्राणी पाये जाते हैं। उत्तम प्रकृति के प्राणी शुक्ल धन को, मध्यम प्रकृति के व्यक्ति शबल धन को तथा अधम प्रकृति के प्राणी कृष्ण धन को वरीयता देते हैं तथा इनके अर्जन में प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार धन के बारह रूप-भेद-चारों वर्णों के उत्तम, मध्यम प्रकृति के प्राणी-हो जाते हैं। क्रमागतं प्रीतिदायः प्राप्तं च सहभार्यया। अविशेषेष वर्णानां सर्वेषां त्रिविधं शुभम् ॥ 51 ॥ तीन प्रकार के सामान्य अथवा साधारण धन का परिचय स्मृतिकार के अनुसार इस प्रकार है-निम्नोक्त तीनों धन सभी वर्णों और जातियों के लोगों के लिए समान रूप से शुद्ध हैं-
- उत्तराधिकार के रूप में पितामह-पिता आदि से प्राप्त धन।
- किसी भी सम्बन्धी, मित्र अथवा राजा (प्रशासन) द्वारा अपनी प्रसन्नता से दान, उपहार, पुरस्कार व पारितोषिक आदि के रूप में प्रदत्त धन तथा
- विवाह के समय पत्नी के साथ दहेज के रूप में प्राप्त धन। वैशेषिकं धनं ज्ञेयं ब्राह्मणस्य शुभं त्रिधा। प्रतिग्रहेण यल्लब्धं याज्यतः शिष्यतस्तथाः ॥ 52 ॥ विशेष रूप से ब्राह्मण के लिए निम्नोक्त तीन प्रकार का धन शुद्ध कहलाता है।
- दान से प्राप्त धन।
- पौरोहित्य-यज्ञ-यागादि सम्पन्न कराने पर दक्षिणा के रूप में प्राप्त धन तथा
- अध्यापन-कार्य से वेतन, शुल्क अथवा गुरुदक्षिणा के रूप में प्राप्त धन। त्रिविधं क्षत्रियस्यापि शुद्धं वैशेषिकं धनम्। कराद् युद्धोपलब्धं च दण्डाश्च व्यवहारतः ॥ 53 ॥ क्षत्रिय (राजा) का भी निम्नोक्त तीन साधनों से प्राप्त धन शुद्ध होता है।
- कर वसूली से प्राप्त धन।
- युद्ध में विजय होने पर हस्तगत शत्रु की सम्पत्ति तथा
- नियम का अतिक्रमण करने वाले एवं व्यवहार में पराजित होने वालों को अनुशासित करने के लिए उन पर लगाये अर्थ-दण्ड की वसूली से प्राप्त धन। वैशेषिकं धनं ज्ञेयं वैश्यस्यापि त्रिधा शुभम्। कृषिगोरक्षवाणिज्यैः शूद्रस्यैषामनुग्रहात् ॥ 54 ॥ वैश्य का भी निम्नोक्त तीन साधनों से प्राप्त धन शुद्ध कहलाता है।
- कृषि द्वारा-अनाज, फल, सब्जी, आदि की बिक्री से-अर्जित धन। नारदस्मृति / 77
- पशु-पालन-दूध, दही, मक्खन, घी आदि की बिक्री-से प्राप्त धन तथा
- व्यापार से अर्जित लाभ। इसी प्रकार तीनों वर्णों के लोगों द्वारा अपनी प्रसन्नता से शूद्र को दिया गया धन भी शुद्ध होता है। सर्वेषामेव वर्णानामेव धर्म्यो धनागमः। विपर्ययादधर्म्यः स्यान्न चेदापद् गरीयसी ॥ 55 ॥ सभी वर्णों के लोगों द्वारा धर्मसम्मत साधनों से अर्जित धन को शुक्ल धन समझना चाहिए। धर्म विरुद्ध साधनों से अर्जित धन ही काला धन है। आपत्काल को छोड़कर कभी अनुचित साधनों से धन के अर्जन की नहीं सोचना चाहिए। आपत्ति में जीवन की रक्षा का प्रश्न प्रमुख हो जाता है, अतः उस समय की छूट को अपवाद ही समझना चाहिए। आपत्स्वनन्तरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते। वैश्यवृत्तिस्ततश्चोक्ता न जघन्या कथञ्चन ॥ 56 ॥ आपत्काल में ब्राह्मण को अपनी वृत्ति से निर्वाह न होने पर क्षत्रियों द्वारा अपनायी जाने वाली वृत्ति को और उससे भी निर्वाह सम्भव न होने पर वैश्यवृत्तियों को अपनाना चाहिए, परन्तु किसी भी स्थिति में शूद्रवृत्ति को कभी नहीं अपनाना चाहिए; क्योंकि ब्राह्मण के लिए शूद्रवृत्ति अत्यन्त निकृष्ट है। न कथञ्चन कुर्वीत ब्राह्मणः कर्म वार्षलम्। वृषलः कर्म न ब्राह्मं पतनीये हि ते तयोः ॥ 57 ॥ जिस प्रकार ब्राह्मण के लिए शूद्रकर्म सर्वथा वर्जनीय है, उसी प्रकार शूद्र के लिए ब्राह्मणवृत्ति भी सर्वथा अनुचित है। इन दोनों के लिए एक-दूसरे की वृत्ति को अपनाना दोनों के पतन का कारण बनता है। उत्कृष्टं चापकृष्टं च तयोः कर्म न विद्यते। मध्यमे कर्मणी हित्वा सर्वसाधारणे हि ते ॥ 58 ॥ संकटकाल में शूद्र के लिए क्षत्रियवृत्ति को तथा ब्राह्मण के लिए वैश्यवृत्ति अपनाने को न तो उत्कृष्ट स्थिति कहा जा सकता है और न ही निकृष्ट स्थिति कहा जा सकता है; क्योंकि इससे नीचे उतरना तो किसी प्रकार उचित ही नहीं है, अर्थात् ब्राह्मण शूद्रवृत्ति को तो किसी भी रूप में नहीं अपना सकता और न ही शूद्र के लिए ब्राह्मणवृत्ति को अपनाना उचित है। अभिप्राय यह है कि पहले तो आवश्यकता पड़ने पर भी ब्राह्मण को क्षत्रियवृत्ति तक सीमित रहना चाहिए, परन्तु उतने से काम न चलने पर विवशता की स्थिति में वैश्यवृत्ति को अपनाना उचित है। इसी प्रकार शूद्र को प्रथम तो वैश्यवृत्ति और इससे काम न चलने पर क्षत्रियवृत्ति को अपनाना चाहिए। इस प्रकार ये दोनों स्थितियां-ब्राह्मण का वैश्यवृत्ति को अपनाना तथा शूद्र 78 / नारदस्मृति
द्वारा क्षत्रियवृत्ति को अपनाना—विवशता की और अस्थायी स्थितियां हैं। अतः न तो ब्राह्मण द्वारा अपनायी वैश्यवृत्ति को निकृष्ट और शूद्र द्वारा अपनायी क्षात्रवृत्ति को उत्कृष्ट माना जा सकता है। आपदं ब्राह्मणस्तीर्त्वा क्षत्रवृत्त्यर्जितैर्धनैः । उत्सृजेत् क्षत्रवृत्तिं तां कृत्वा पावनमात्मनः ॥ 59 ॥ संकट के दूर होते ही ब्राह्मण को अस्थायी रूप से अपनायी क्षात्रवृत्ति का तत्काल परित्याग कर देना चाहिए। इतना ही नहीं, इसके लिए ब्राह्मण को प्रायश्चित्त भी करना चाहिए। प्रायश्चित्त करने पर ही ब्राह्मण पवित्र होता है। तस्यामेव तु यो वृत्तौ ब्राह्मणो रमते सदा। काण्डपृष्ठश्च्युतो मार्गादपाङ्क्तेयः प्रकीर्त्तितः ॥ 60 ॥ संकट के टल जाने पर भी लोभवश क्षात्रवृत्ति अथवा वैश्यवृत्ति से चिपटा रहने वाला ब्राह्मण 'काण्डपृष्ठ' कहलाता है। ऐसा ब्राह्मण आचारभ्रष्ट माना जाता हैं और ब्राह्मणों की पंक्ति में बैठने के अधिकार से च्युत हो जाता है। वैश्यवृत्त्या चाविक्रेयं ब्राह्मणस्य पयो दधि। घृतं मधु मधुच्छिष्टं लाक्षाक्षाररसासवाः ॥ 61 ॥ मांसौदनतिलक्षौमसोमपुष्पफलोपलाः । मनुष्यविषशस्त्राम्बुलवणापूपवीरुधः ॥ 62 ॥ चैलकौशेयचर्मास्थिकुतवैकशफा मृदः। उदश्वित्कुशपिण्याकशाकार्द्रौषधयस्तथा ॥ 63 ॥ विशेष संकट की स्थिति में वैश्यवृत्ति को अपनाने को विवश हुए ब्राह्मण को निम्नोक्त वस्तुओं का क्रय-विक्रय कभी नहीं करना चाहिए—दूध, दही, घृत, मधु, सोम, लाख, गुड़, क्षार, सुरा, मांस, अन्न, तिल, कौशेय वस्त्र, पुष्प, फल, रत्न आदि पाषाण, मनुष्य (दास), विष, शस्त्र, जल, नमक, जड़ी-बूड़ी, वस्त्र, चर्म, अस्थि, कम्बल, एक खुर वाले पशु—अश्व, गर्दभ आदि—मिट्टी के बरतन, मट्ठा, कुश, खली तथा गीली औषधि आदि। ब्राह्मणस्य तु विक्रेयं शुष्कं दारु तृणानि च। गन्धद्रव्यैरकावेत्रतूलमूलकुशादृते ॥ 64 ॥ वैश्यवृत्ति को अपनाने वाले ब्राह्मण को सुगन्धित द्रव्य, एरका घास, बेंत, तूल (कपास), मूल (मूली, आलू, गाजर आदि) और कुश आदि का क्रय विक्रय भी नहीं करना चाहिए। हां, वह सूखी लकड़ियों और घास को बेचने को अवश्य स्वतन्त्र है। स्वयं शीर्णं च विदलं फलानां बदरेङ्गुदे। रज्जु कार्पासिकं सूत्रं तच्चेदविवृतं भवेत् ॥ 65 ॥ नारदस्मृति / 79
संकटकाल में वैश्यवृत्ति को अपनाने को विवश हुआ ब्राह्मण निम्नोक्त पदार्थों का क्रय-विक्रय कर सकता है—1. शीर्ण होने से स्वयं वृक्ष से पतित पत्र, 2. बेर, 3. इंगुदिका नामक फल, 4. रज्जु तथा 5. खादी से बुने गये सूती वस्त्र आदि। अशक्तौ भेषजस्यार्थे यज्ञहेतोस्तथैव च। यद्यवश्यं तु विक्रेयास्तिला धान्येन तत्समाः ॥ 66 ॥ संकटकाल में वैश्यवृत्ति को अपनाने को बाध्य बाह्मण उपर्युक्त पदार्थों के अतिरिक्त किसी असमर्थ रोगी के उपचार के लिए उपेक्षित जड़ी-बूटी अथवा उनसे तैयार लेप, चूर्ण, रस आदि तथा यज्ञ-यागादि के लिए अपेक्षित तिल, धान्य आदि अथवा अन्य यज्ञ-सामग्री—इन पदार्थों को अवश्य ही बेचना चाहिए। इसमें उसे किसी प्रकार की लज्जा-संकोच आदि का अनुभव नहीं करना चाहिए। अविक्रेयाणि विक्रीणन् ब्राह्मणः प्रच्युतः पथः । मार्गे पुनरवस्थाप्यो राज्ञा दण्डेन भूयसा ॥ 67 ॥ न बेचने योग्य वस्तुओं को लोभवश बेचने को प्रस्तुत ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से पतित हो जाता है। राजा को ऐसे पथभ्रष्ट, आचार -च्युत ब्राह्मण को अपने वर्ण- जाति एवं वृत्ति में पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए यथोचित रूप से प्रचुर दण्ड देने में भी संकोच नहीं करना चाहिए। सामान्यतः ब्राह्मण राजा के दण्ड-विधान की परिधि से बाहर है, अर्थात् राजा के लिए ब्राह्मण को दण्डित करना निषिद्ध है, परन्तु आचारभ्रष्ट ब्राह्मण ब्राह्मण ही नहीं रहता। पतित, भ्रष्ट व्यक्ति तो शूद्र ही होता है, अतः ऐसे ब्राह्मण को राजा द्वारा दण्ड देना शास्त्रसम्मत है। यह तो धर्म और न्याय की रक्षा करने के समान पवित्र कार्य है। प्रमाणानि प्रमाणस्थैः परिकल्प्यानि यत्नतः। सौदन्ति हि प्रमेयाणि प्रमाणैरव्यवस्थितैः ॥ 68 ॥ पथभ्रष्ट ब्राह्मण को अनुशासित करने के लिए राजा द्वारा दण्ड देने के औचित्य के सम्बन्ध में स्मृतिकार की मान्यता है कि यदि इस सम्बन्ध में शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध न भी हो, तो भी ऐसा करने के लिए प्रमाणों की योजना कर लेनी चाहिए; क्योंकि प्रमाणों के अभाव की दुहाई देकर अनुशासन और व्यवस्था की उपेक्षा करना बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य नहीं माना जाता। इससे व्यवस्था दूषित हो जाती है और समाज को ग़लत संकेत मिलने लगते हैं। अतः औचित्य की स्थापना के लिए प्रमाणों की उपेक्षा करना अथवा प्रमाणों के अभाव में सुधार का प्रयास न करना बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य नहीं। लिखितं साक्षिणो भुक्तिः प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम् । धनस्त्रीकरणे येन धनी धनमवाप्नुयात् ॥ 69 ॥ 80 / नारदस्मृति
धन-सम्पत्ति के स्वामित्व के साधक तीन प्रमाण हैं—1. लिखित (दस्तावेज़), 2. साक्षी तथा, 3. भुक्ति-कब्ज़ा। किसने, कब, कहां और कैसे विचारणीय सम्पत्ति को प्राप्त किया है, इसका निर्णय इन्हीं तीन प्रमाणों के आधार पर किया जाता है। नाकरिष्यद्यदा स्रष्टा लिखितं चक्षुरुत्तमम्। तत्रेयमस्य लोकस्य नाभविष्यच्छुभा गतिः॥ 70 ॥ यदि विश्वनियन्ता परमपिता परमेश्वर ने मनुष्यों को उत्तम ज्ञानेन्द्रिय चक्षु प्रदान न की होती, तो मनुष्य न कुछ देख पाता और न ही कुछ लिख पाता, अर्थात् अपने प्रत्यक्ष अनुभव को स्थायी रूप से सुरक्षित कर ही नहीं पाता, जिसका अर्थ लिखित प्रमाण की अनुपलब्धि होता। इससे संसार का कल्याण न हो पाता। सब से अधिक विश्वस्त एवं प्रामाणिक लिखित प्रमाण के अनुपलब्ध होने से व्यवहार सुलझ न पाते तथा सन्देह की स्थिति और अव्यवस्था का प्रसार हो जाता। अभिप्राय यह है कि लोगों को विधाता की इस देन के लिए विधाता के प्रति चिर-कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए। देशकालफलद्रव्यप्रमाणावधिनिश्चये । सर्वसन्देहविच्छेदि लिखितं चक्षुरुत्तमम्॥ 71 ॥ देश—किसने, किस स्थान पर दिये लिये, काल—कब, किस वर्ष, मास, दिन, तिथि को दिये लिये, फल—क्यों लिया दिया, अर्थात् आवश्यकता एवं प्रयोजन आदि, द्रव्य—लेन-देन की वस्तु-विशेष, प्रमाण—स्वरूप, आकार प्रकार, भार, (वज़न) स्थूलता, लम्बाई चौड़ाई आदि तथा अवधि—परिस्थितियों तथा शर्तों आदि का एकमात्र निश्चित प्रमाण जुटाने वाला साधन चक्षु है। यह सभी सन्देहों का निवारक तथा विवादों का समापक एवं निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचाने वाला पूर्णतया विश्वसनीय साधन है। अतः इसे व्यक्ति को विधाता की उत्तम देन मानना सर्वथा उपयुक्त ही है। गृहीत्वापि स्थले द्रव्यं योऽपह्नवितुमिच्छति। स्थापितः साक्षिभिर्मार्गे स दुःसाध्योऽपि साध्यते ॥ 72 ॥ यदि स्थान-विशेष पर लिये गये किसी पदार्थ को हड़पने की इच्छा वाला व्यक्ति मुकर जाता है, तो इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए उस स्थान पर उपस्थित साक्षियों की सहायता लेनी पड़ती है, परन्तु प्रायः यह सहज साध्य कार्य नहीं होता; क्योंकि वस्तु देते समय साक्ष्य की आवश्यकता पड़ने की सम्भावना पर विचार ही नहीं किया जाता। अतः साक्षियों की उपस्थिति हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। यही कारण है कि इसे दुःसाध्य कार्य माना जाता है; क्योंकि यदि साक्षियों के समक्ष कुछ हुआ ही नहीं, तो साक्ष्य कहां से जुटाया जायेगा ? फिर यह भी निश्चित नहीं है कि साक्षी जीवित होंगे, उसी स्थान पर रह रहे होंगे तथा उन्हें सब कुछ यथावत् स्मरण भी होगा। नारदस्मृति / 81
लिखितं स्याद् बहुच्छिद्रं साक्षिणो नाजरामराः। भुक्तिस्त्वनर्थसम्बद्धा सन्ततैवार्थसाधकी ॥ 73 ॥ किसी भी व्यवहार के निर्णय में तीन प्रमाण सहायक सिद्ध होते हैं—
- लिखित पत्र (दस्तावेज़) 2. प्रत्यक्षदर्शियों का साक्ष्य तथा 3. भुक्ति। ये तीनों प्रमाण भी सर्वथा निर्दोष नहीं। उदाहरणार्थ, लिखित प्रमाण में कई ग़लतियां हो सकती हैं तथा लिखित लेख के भिन्न भिन्न अर्थ निकाले जा सकते हैं। साक्षी भी अजर-अमर नहीं हैं, वे भी बूढ़े होकर स्मरणशक्ति खोने वाले हो सकते हैं, मर भी सकते हैं। यही स्थिति क़ब्ज़े की भी है, क़ब्ज़ा अधिकृत भी हो सकता है, अनधिकृत भी। Might is Right, यानी 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' उक्तियां सत्य सिद्ध हो सकती हैं। इस प्रकार प्रयोजन की सिद्धि में इन तीनों पर सदैव निर्भर नहीं रहा जा सकता। बेईमान व्यक्ति तो सभी साधनों को धता बता देता है। तदेतत्त्रिविधं ज्ञेयं प्रमाणाय न साधितम्। सन्देहमागतमपि धनी धनमवाप्नुयात् ॥ 74 ॥ स्वामित्व के सम्बन्ध में सन्देह तथा अनिश्चय की स्थिति में किसी भी प्रमाण को न जुटा पाने पर स्वामी द्वारा विवादित धन-सम्पत्ति को पाना अवश्य सम्भव नहीं होता, परन्तु तीन—लिखित, साक्ष्य तथा भुक्ति-प्रमाणों—में से किसी एक प्रमाण के भी मिल जाने पर प्राप्ति की सम्भावना बन ही जाती है। आवश्यकता केवल प्रमाण के मिलने की नहीं होती, अपितु उस प्रमाण का पुष्ट होना भी अत्यावश्यक होता है। लिखितं बलवन्नित्यं जीवन्तश्चैव साक्षिणः कालातिहरणाद् भुक्तिरिति शास्त्रविनिश्चयः ॥ 75 ॥ शास्त्र की यह व्यवस्था है कि लिखित प्रमाण सर्वदा एवं सर्वथा सभी अन्य प्रमाणों की अपेक्षा अधिक बलवान् होता है। यदि साक्षी जीवित हैं और उनकी स्मरणशक्ति अक्षुण्ण है, तो उनकी आंखों के सामने घटी घटना का उनके द्वारा यथावत् वर्णन भी एक प्रकार से निश्चित प्रमाण है। इसी प्रकार पर्याप्त समय व्यतीत हो जाने पर भुक्ति—भोगा जाना, प्रयोग में आना, अर्थात् क़ब्ज़ा होना—भी एक असन्दिग्ध प्रमाण है। इन तीनों प्रमाणों की अपनी एक निश्चित सार्थकता है। यह पूर्णतः शास्त्रसम्मत है। त्रिविधस्यास्य दृष्टस्य प्रमाणस्य यथाक्रमम्। पूर्वं-पूर्वं गुरुं ज्ञेयं भुक्तिस्तेभ्यो गरीयसी ॥ 76 ॥ यद्यपि इन तीनों—लिखित, साक्ष्य एवं भुक्ति-प्रमाणों में पूर्व-पूर्व, अर्थात् भुक्ति की अपेक्षा साक्ष्य और साक्ष्य की अपेक्षा लिखित अधिक बलवान् है, तथापि भुक्ति की कोई तुलना नहीं। जो सम्पत्ति जिसके अधिकार में है, जो उसका उपभोग कर रहा है, उसके स्वामित्व में सन्देह कैसा ? 82 / नारदस्मृति
टिप्पणी—लोक में उक्ति प्रचलित है—'क़ब्ज़ा सच्चा, झगड़ा झूठा।' इसी प्रकार बारह वर्षों तक किसी सम्पत्ति के अबाध उपभोग करने वाले को भारतीय संविधान भी स्वामित्व का अधिकार देता है। भले ही उसने वह सम्पत्ति न खरीदी हो और न ही उत्तराधिकार में पायी हो, फिर भी यदि बारह वर्षों तक अथवा उससे अधिक समय तक उस सम्पत्ति पर अपना क़ब्ज़ा सिद्ध कर देता है, तो वह उसका वास्तविक स्वामी बन जाता है। विद्यमानेऽपि लिखिते जीवत्स्वपि हि साक्षिषु। विशेषतः स्थावराणां यन्न भुक्तं न तत् स्थिरम् ॥ 77 ॥ लिखित प्रमाण और साक्षियों के जीवित होने, अर्थात् साक्ष्य उपलब्ध होने पर भी जिस अचल सम्पत्ति पर व्यक्ति का क़ब्ज़ा नहीं है, अर्थात् जो दूसरे के अधिकार में है, उस सम्पत्ति का स्वामी होते हुए भी व्यक्ति सच्चे अर्थों में स्वामी नहीं होता; क्योंकि वह उस सम्पत्ति को न बेच सकता है, न बन्धक रख सकता है और न ही उसका स्वयं उपयोग कर सकता है। इससे सिद्ध होता है कि सच्चा स्वामित्व तो क़ब्ज़ा है और वही सर्वाधिक प्रबल प्रमाण है। जिस अचल सम्पत्ति पर अपना क़ब्ज़ा नहीं, उसे अपनी मानना ही नहीं चाहिए। भुज्यमानान् परैरर्थान् यः स्वामौर्ख्यादुपेक्षते। समक्षं जीवितोऽप्यस्य तान् भुक्तिः कुरुते वशे ॥ 78 ॥ दूसरों द्वारा अपनी सम्पत्ति के उपभोग-उपयोग की उपेक्षा न करने, अर्थात् दूसरों को अपनी सम्पत्ति का उपयोग न करने देने का परामर्श देते हुए स्मृतिकार कहता है—दूसरों को अपनी सम्पत्ति का उपयोग करते देखकर उसे गम्भीरता से न लेना, उसकी उपेक्षा करना, अर्थात् उन्हें अपनी स्थायी अचल सम्पत्ति का उपयोग करने देना बहुत बड़ी मूर्खता है, जिसका परिणाम अत्यन्त भयंकर होता है। ऐसा व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही अपनी सम्पत्ति पर अपने स्वामित्व को गंवा बैठता है। सब प्रकार के प्रमाणों के रहते हुए भी उसकी सम्पत्ति उपभोक्ता के हाथ में चली जाती है। अतः किसी भी प्रकार से व्यक्ति को अपनी अचल सम्पत्ति पर किसी दूसरे को, किसी भी प्रकार से क़ब्ज़ा नहीं करने देना चाहिए। यत् किञ्चिद्दशवर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी। भुज्यमानं परैस्तूष्णीं न स तल्लब्धुमर्हति ॥ 79 ॥ अपने सामने अपनी सम्पत्ति का दूसरों को उपभोग करता देखकर भी निरन्तर दस वर्षों तक मौन रहने वाले, अर्थात् उसे न रोकने-टोकने वाले और न ही किसी प्रकार की कोई आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति का उस सम्पत्ति पर से स्वामित्व स्वतः ही निरस्त हो जाता है। उसके स्थान पर सम्पत्ति के उपभोग करने वाले का उस सम्पत्ति पर नैतिक स्वामित्व स्थापित हो जाता है। नारदस्मृति / 83
अभिप्राय यह है कि यदि व्यक्ति अपनी अचल सम्पत्ति पर अपना अधिकार अक्षुण्ण रखना चाहता है, तो सर्वप्रथम उसे किसी दूसरे व्यक्ति को उस सम्पत्ति के उपभोग की अनुमति ही नहीं देनी चाहिए और यदि किसी ने बलपूर्वक अधिकार कर लिया है, तो उसके विरुद्ध नैतिक एवं क़ानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। अपनी सम्पत्ति पर दूसरों के अधिकार को उपेक्षणीय विषय नहीं समझना चाहिए। इस सम्बन्ध में की गयी उपेक्षा का परिणाम सम्पत्ति से हाथ धो बैठना होता है। अजडश्चेदपोगण्डो विषये चास्य भुज्यते। भग्नं तद्व्यवहारेण भोक्ता तद्धनमर्हति ॥ 80 ॥ अचल सम्पत्ति के स्वामी के अवयस्क तथा अजड़ (अविकसित मस्तिष्क) न होने पर, उसकी जानकारी में उसकी सम्पत्ति का उपभोग करने वाला दूसरा व्यक्ति उस सम्पत्ति का पक्का एवं सच्चा स्वामी बन जाता है। अभिप्राय यह है कि यदि अचल सम्पत्ति का स्वामी बालक है अथवा मन्दबुद्धि है, तो उसकी सम्पत्ति का दूसरों द्वारा उपभोग किये जाने पर भी क़ानून मूल स्वामी के अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है; क्योंकि क़ानून अनुचित लाभ उठाने की अनुमति कदापि नहीं देता। इसके विपरीत स्वामी के पूर्ण युवा तथा सामान्य बुद्धि का होने पर, यदि वह अपनी सम्पत्ति का दूसरों द्वारा उपयोग किया जाता देखकर भी मौन रहता है, उपेक्षा का भाव दिखाता है अथवा विरोध प्रदर्शन नहीं करता है, तो निश्चित है कि उसे उस सम्पत्ति में कोई रुचि नहीं। ऐसे व्यक्ति का अपनी सम्पत्ति पर स्वामित्व निरस्त हो जाता है और वह सम्पत्ति उपभोक्ता के स्वामित्व में चली जाती है। टिप्पणी— वररुचि ने विकलांग को भी जड़ मानते हुए उसे संरक्षण प्रदान किया है। उनके अनुसार क़ानून को विकलांग की सम्पत्ति के दूसरे व्यक्ति द्वारा उपभोग को कभी मान्यता नहीं देनी चाहिए— शरीरपाणिचरणैर्निसर्गेणशरीरिणः । विकलाः सद्भिरुच्यन्ते पोगण्डकुणिपुंगवः ॥ आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधी स्त्रियः । राजस्वं श्रोत्रियद्रव्यं न भोगेन प्रणश्यति ॥ 81 ॥ निम्नोक्त स्थितियों में दूसरों द्वारा अचल सम्पत्ति का उपभोग किये जाने पर भी उस पर मूल स्वामी का स्वामित्व निरस्त नहीं होता—
- बन्धक रखी गयी सम्पत्ति किसी भी समय— यदि अवधि निर्धारित नहीं की गयी, तो ऋण को चुकता कर-छुड़ायी जा सकती है। ऐसी सम्पत्ति अवधि के निर्धारित होने और उसके बीत जाने पर भी, सम्पत्ति पर मूल स्वामी का स्वामित्व समाप्त नहीं हो जाता। हां, जुर्माना चुकाना पड़ता है, परन्तु स्वामित्व बना रहता है। 84 / नारदस्मृति
- आक्रमण एवं बल प्रयोग द्वारा छीनी गयी सम्पत्ति—शक्ति सञ्चित होने पर पुनः अपने अधिकार में की जा सकती है।
- बालक की सम्पत्ति—वयस्क होने पर व्यक्ति क़ानून की सहायता से अपनी सम्पत्ति को वापस ले सकता है।
- निक्षेप, अर्थात् धरोहर के रूप में रखी सम्पत्ति को भी मूल स्वामी किसी भी समय अपने अधिकार में लेने को स्वतन्त्र होता है।
- उपनिधि, अर्थात् अमानत में की गयी ख़यानत—हेराफेरी-बेईमानी— अर्थात् धूर्तता से कुछ भाग को अपने अधिकार में कर लेना और उस धूर्तता की कुछ समय उपरान्त जानकारी होना। इस प्रकार की सम्पत्ति को भी क़ानून की सहायता से वापस पाया जा सकता है।
- स्त्रीधन, अर्थात् पति, पिता, भ्राता आदि निकट सम्बन्धियों द्वारा अपनी प्रीति से दिये धन पर केवल उस धन को पाने वाली स्त्री का ही एकाधिकार होता है। उस स्त्रीधन को अथवा ऋण पाने के लिए पति द्वारा बन्धक के रूप में रखी स्त्री को भी मूल स्वामी को वापस पाने का अधिकार होता है।
- राजस्व, अर्थात् भू-सम्पदा—आवास, भू-खण्ड अथवा कृषिक्षेत्र आदि पर भी उपभोक्ता सदा के लिए अपना अधिकार नहीं जमा सकता।
- श्रोत्रिय द्रव्य, अर्थात् यज्ञ-यागादि कराने वाले ब्राह्मण द्वारा दक्षिणा के रूप में प्राप्त गायों अथवा स्वर्ण आदि का अपहर्ता भी अपना अधिकार स्थिर नहीं रख पाता। उपर्युक्त आठ सम्पत्तियों का दूसरा व्यक्ति कितने समय तक भी उपयोग- उपभोग क्यों न कर ले, परन्तु वह उनका स्वामी कभी नहीं बन सकता। इस वस्तुओं पर मूल स्वामी का स्वामित्व अक्षुण्ण बना रहता है। प्रत्यक्षपरिभोगात्तु स्वामिनो द्विद्शः समाः। आध्यादीन्यपि जीर्यन्ते स्त्रीनरेन्द्रधनादृते॥ 82॥ दोनों—स्त्रीधन, स्त्री के निजी अधिकार का धन अथवा स्त्री-रूपी धन— तथा राजा की धन-सम्पत्तियों को छोड़कर शेष अन्य सभी सम्पत्तियों का प्रत्यक्ष रूप से निरन्तर बीस वर्षों से अधिक अवधि तक उपयोग-उपभोग करने वाला उन सम्पत्तियों का स्वामी बन जाता है। टिप्पणी—यहां दो बातें ध्यान देने योग्य हैं—प्रथम, स्त्रीधन और सरकारी धन तो सदैव मूल स्वामी का ही रहता है, भले ही दूसरा इनका उपयोग उपभोग कितने ही समय से क्यों न करता आ रहा हो। द्वितीय, अन्य सम्पत्तियों पर उपभोक्ता के अधिकारी बनने के लिए दो शर्तें नारदस्मृति / 85
रखी गयी हैं—1. उपभोग की अवधि बीस वर्ष अथवा उससे अधिक होनी चाहिए तथा 2. उपभोग सर्वजनविदित होना चाहिए, गुप्त रूप से किया गया क़ब्ज़ा मान्य नहीं होता। यहां इस तथ्य को विस्मरण नहीं करना चाहिए कि प्राचीनकाल में स्त्री को भी—पुरुष, पिता, पति आदि का—निजी धन माना जाता था। उसका स्वामी उसे बन्धक रखने, बेचने, दांव पर लगाने आदि को स्वतन्त्र था। स्त्री का कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व नहीं था, वह अपने स्वामी के आदेश का पालन करने को बाध्य थी। उसकी स्थिति पशु अथवा दास के समान ही थी। ऐसा केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं था, अन्य धर्मों में भी यही कुछ है। इस्लाम के अनुसार तो वह 'जिंस' (Property) है, उसमें रूह (आत्मा) तो है ही नहीं। इसी सन्दर्भ में स्मृतिकार का मन्तव्य दर्शनीय है। स्त्रीधनं च नरेन्द्रणां न कथञ्चन जीर्यते। अनागमं भुज्यमानं वत्सराणां शतैरपि ॥ 83 ॥ दोनों—स्त्रीधन और राजकीय सम्पत्ति (भूमि, भवन आदि)—का निरन्तर प्रत्यक्ष रूप से सौ वर्षों तक भोग करने वाला व्यक्ति भी उनका स्वामी नहीं बन पाता। हां, इस सम्बन्ध में यदि किसी प्रकार का कोई लिखित अनुबन्ध (Agreement) कर लिया जाता है, तो स्थिति भिन्न हो जाती है, अर्थात् तब उपभोक्ता स्वामित्व प्राप्त कर लेता है। सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित्। आगमः कारणं तत्र न भोगस्तत्र कारणम् ॥ 84 ॥ इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए स्मृतिकार का कथन है—जिस सम्पत्ति पर उपभोक्ता का क़ब्ज़ा तो है, परन्तु उसके पास किसी प्रकार का कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं है, तो उस स्थिति में भोग (क़ब्ज़ा) को कोई महत्त्व नहीं दिया जा सकता; क्योंकि लिखित अनुबन्ध ही स्वामित्व का मूल-आधार है, क़ब्ज़ा नहीं। ऐसा व्यक्ति अनिश्चित अवधि तक सम्पत्ति का उपभोग करता रह सकता है, परन्तु स्वामी होने का अधिकार कभी नहीं पा सकता। आगमेन विशुद्धेन भोगो याति प्रमाणताम्। अविशुद्धागमो भोगः प्रामाण्यं नैव गच्छति ॥ 85 ॥ लिखित प्रमाण (दस्तावेज़) भी तभी मान्य होता है, जब वह पूर्णतः विशुद्ध हो, अर्थात् लेने-देने वालों के नाम, पिता का नाम, पता ठिकाना, सम्पत्ति का विवरण, देने की तिथि, दिन, मास और वर्ष, बदले में लिया दिया धन एवं शर्तें आदि सब कुछ का उल्लेख हो और लेन-देन करने वाले स्वस्थ मस्तिष्क की स्थिति में हों तथा लेन-देन बिना किसी दबाव, विवशता और नशे में किया गया 86 / नारदस्मृति
हो। इसके अतिरिक्त दस्तावेज़ साक्षियों द्वारा समर्थित और सरकारी अधिकारी द्वारा सत्यापित होना चाहिए। उपर्युक्त सभी कुछ न लिये रहने वाला दस्तावेज़ पूर्णतः विशुद्ध न होने से प्रामाणिक नहीं कहलाता। शुद्ध दस्तावेज़ होने पर ही सम्पत्ति का स्वामित्व वैध बन पाता है। भोगं केवलतो यस्य कीर्त्तयेन्नागमः क्वचित्। भोगच्छलापदेशेन स विज्ञेयस्तु तस्करः॥ 86 ॥ जिस सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा तो है, परन्तु क़ाबिज़ के पास उस सम्पत्ति के ख़रीदने अथवा उपहार में पाने अथवा पैतृक होने अथवा बन्धक या धरोहर होने आदि का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं, तो सम्पत्ति पर अपने स्वामित्व का दावा करने वाले व्यक्ति को चोर ही समझना चाहिए। अभिप्राय यह है कि बिना किसी पक्के, विशुद्ध और सच्चे लिखित प्रमाण के ख़ाली क़ब्ज़े का कोई विशेष महत्त्व नहीं। यह तो एक प्रकार की चोरी अथवा सीनाज़ोरी है, अर्थात् दण्डनीय अपराध है। ख़ाली क़ब्ज़े के आधार पर अपने को सम्पत्ति का स्वामी सिद्ध करने वाले को तो दण्डित ही करना चाहिए। अनागमं तु यो भुङ्क्ते बहून्यब्दशतान्यपि। चौरदण्डेन तं पापं दण्डयेत् पृथिवीपतिः॥ 87 ॥ राजा को बिना किसी प्रमाण के, अर्थात् स्वामी न होने पर भी अपने बल, युक्ति अथवा धूर्तता का आश्रय लेकर किसी दूसरे की सम्पत्ति पर अनुचित रूप से अपना क़ब्ज़ा जमाने वाले को चोर के लिए निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए; क्योंकि वस्तुतः ऐसा व्यक्ति धूर्त और पापी होता है और उसे दण्ड देना न्याय की रक्षा करना है। भुज्यतेऽनागमं यत्तु न तद् भोगपदं नयेत्। प्रेतं तु भोक्तरि धनं याति तद्वंश्यभोग्यताम्॥ 88 ॥ बिना किसी लिखित प्रमाण के किसी की सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा करने वाला व्यक्ति तो कभी उस सम्पत्ति का स्वामी नहीं बन सकता, परन्तु उसके मर जाने पर वह सम्पत्ति उसके उत्तराधिकारियों की ही सम्पत्ति रहती है, अर्थात् क़ब्ज़ा करने वाले व्यक्ति के मरने पर क़ब्ज़ा निरस्त नहीं हो जाता, अपितु उसके वंशस्थों को स्थानान्तरित हो जाता है। स्मार्त्ते काले क्रियाभुक्तेः सागमाभुक्तिरिष्यते। अस्मार्त्ते लिखिताभावे क्रमात्त्रिपुरुषागता॥ 89 ॥ यदि किसी सम्पत्ति पर तीन पीढ़ियों तक एक ही परिवार का क़ब्ज़ा बना रहता है और उस अवधि में क़ब्ज़ा करने वालों के विरुद्ध कोई क़ानूनी कार्यवाही नहीं की जाती है, तो उस सम्पत्ति पर क़ाबिज़ों का स्वामित्व हो जाता है। यदि नारदस्मृति / 87