नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंकटकाल में वैश्यवृत्ति को अपनाने को विवश हुआ ब्राह्मण निम्नोक्त पदार्थों का क्रय-विक्रय कर सकता है—1. शीर्ण होने से स्वयं वृक्ष से पतित पत्र, 2. बेर, 3. इंगुदिका नामक फल, 4. रज्जु तथा 5. खादी से बुने गये सूती वस्त्र आदि। अशक्तौ भेषजस्यार्थे यज्ञहेतोस्तथैव च। यद्यवश्यं तु विक्रेयास्तिला धान्येन तत्समाः ॥ 66 ॥ संकटकाल में वैश्यवृत्ति को अपनाने को बाध्य बाह्मण उपर्युक्त पदार्थों के अतिरिक्त किसी असमर्थ रोगी के उपचार के लिए उपेक्षित जड़ी-बूटी अथवा उनसे तैयार लेप, चूर्ण, रस आदि तथा यज्ञ-यागादि के लिए अपेक्षित तिल, धान्य आदि अथवा अन्य यज्ञ-सामग्री—इन पदार्थों को अवश्य ही बेचना चाहिए। इसमें उसे किसी प्रकार की लज्जा-संकोच आदि का अनुभव नहीं करना चाहिए। अविक्रेयाणि विक्रीणन् ब्राह्मणः प्रच्युतः पथः । मार्गे पुनरवस्थाप्यो राज्ञा दण्डेन भूयसा ॥ 67 ॥ न बेचने योग्य वस्तुओं को लोभवश बेचने को प्रस्तुत ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से पतित हो जाता है। राजा को ऐसे पथभ्रष्ट, आचार -च्युत ब्राह्मण को अपने वर्ण- जाति एवं वृत्ति में पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए यथोचित रूप से प्रचुर दण्ड देने में भी संकोच नहीं करना चाहिए। सामान्यतः ब्राह्मण राजा के दण्ड-विधान की परिधि से बाहर है, अर्थात् राजा के लिए ब्राह्मण को दण्डित करना निषिद्ध है, परन्तु आचारभ्रष्ट ब्राह्मण ब्राह्मण ही नहीं रहता। पतित, भ्रष्ट व्यक्ति तो शूद्र ही होता है, अतः ऐसे ब्राह्मण को राजा द्वारा दण्ड देना शास्त्रसम्मत है। यह तो धर्म और न्याय की रक्षा करने के समान पवित्र कार्य है। प्रमाणानि प्रमाणस्थैः परिकल्प्यानि यत्नतः। सौदन्ति हि प्रमेयाणि प्रमाणैरव्यवस्थितैः ॥ 68 ॥ पथभ्रष्ट ब्राह्मण को अनुशासित करने के लिए राजा द्वारा दण्ड देने के औचित्य के सम्बन्ध में स्मृतिकार की मान्यता है कि यदि इस सम्बन्ध में शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध न भी हो, तो भी ऐसा करने के लिए प्रमाणों की योजना कर लेनी चाहिए; क्योंकि प्रमाणों के अभाव की दुहाई देकर अनुशासन और व्यवस्था की उपेक्षा करना बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य नहीं माना जाता। इससे व्यवस्था दूषित हो जाती है और समाज को ग़लत संकेत मिलने लगते हैं। अतः औचित्य की स्थापना के लिए प्रमाणों की उपेक्षा करना अथवा प्रमाणों के अभाव में सुधार का प्रयास न करना बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य नहीं। लिखितं साक्षिणो भुक्तिः प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम् । धनस्त्रीकरणे येन धनी धनमवाप्नुयात् ॥ 69 ॥ 80 / नारदस्मृति