भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 304 में से

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द्वारा क्षत्रियवृत्ति को अपनाना—विवशता की और अस्थायी स्थितियां हैं। अतः न तो ब्राह्मण द्वारा अपनायी वैश्यवृत्ति को निकृष्ट और शूद्र द्वारा अपनायी क्षात्रवृत्ति को उत्कृष्ट माना जा सकता है। आपदं ब्राह्मणस्तीर्त्वा क्षत्रवृत्त्यर्जितैर्धनैः । उत्सृजेत् क्षत्रवृत्तिं तां कृत्वा पावनमात्मनः ॥ 59 ॥ संकट के दूर होते ही ब्राह्मण को अस्थायी रूप से अपनायी क्षात्रवृत्ति का तत्काल परित्याग कर देना चाहिए। इतना ही नहीं, इसके लिए ब्राह्मण को प्रायश्चित्त भी करना चाहिए। प्रायश्चित्त करने पर ही ब्राह्मण पवित्र होता है। तस्यामेव तु यो वृत्तौ ब्राह्मणो रमते सदा। काण्डपृष्ठश्च्युतो मार्गादपाङ्क्तेयः प्रकीर्त्तितः ॥ 60 ॥ संकट के टल जाने पर भी लोभवश क्षात्रवृत्ति अथवा वैश्यवृत्ति से चिपटा रहने वाला ब्राह्मण 'काण्डपृष्ठ' कहलाता है। ऐसा ब्राह्मण आचारभ्रष्ट माना जाता हैं और ब्राह्मणों की पंक्ति में बैठने के अधिकार से च्युत हो जाता है। वैश्यवृत्त्या चाविक्रेयं ब्राह्मणस्य पयो दधि। घृतं मधु मधुच्छिष्टं लाक्षाक्षाररसासवाः ॥ 61 ॥ मांसौदनतिलक्षौमसोमपुष्पफलोपलाः । मनुष्यविषशस्त्राम्बुलवणापूपवीरुधः ॥ 62 ॥ चैलकौशेयचर्मास्थिकुतवैकशफा मृदः। उदश्वित्कुशपिण्याकशाकार्द्रौषधयस्तथा ॥ 63 ॥ विशेष संकट की स्थिति में वैश्यवृत्ति को अपनाने को विवश हुए ब्राह्मण को निम्नोक्त वस्तुओं का क्रय-विक्रय कभी नहीं करना चाहिए—दूध, दही, घृत, मधु, सोम, लाख, गुड़, क्षार, सुरा, मांस, अन्न, तिल, कौशेय वस्त्र, पुष्प, फल, रत्न आदि पाषाण, मनुष्य (दास), विष, शस्त्र, जल, नमक, जड़ी-बूड़ी, वस्त्र, चर्म, अस्थि, कम्बल, एक खुर वाले पशु—अश्व, गर्दभ आदि—मिट्टी के बरतन, मट्ठा, कुश, खली तथा गीली औषधि आदि। ब्राह्मणस्य तु विक्रेयं शुष्कं दारु तृणानि च। गन्धद्रव्यैरकावेत्रतूलमूलकुशादृते ॥ 64 ॥ वैश्यवृत्ति को अपनाने वाले ब्राह्मण को सुगन्धित द्रव्य, एरका घास, बेंत, तूल (कपास), मूल (मूली, आलू, गाजर आदि) और कुश आदि का क्रय विक्रय भी नहीं करना चाहिए। हां, वह सूखी लकड़ियों और घास को बेचने को अवश्य स्वतन्त्र है। स्वयं शीर्णं च विदलं फलानां बदरेङ्गुदे। रज्जु कार्पासिकं सूत्रं तच्चेदविवृतं भवेत् ॥ 65 ॥ नारदस्मृति / 79