नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशुक्ल और शबल धन को और शूद्र शुक्ल, शबल तथा कृष्ण धन को अर्जित करते हैं। इसके अतिरिक्त इन चारों वर्णों में उत्तम, मध्यम और अधम प्रकृति के प्राणी पाये जाते हैं। उत्तम प्रकृति के प्राणी शुक्ल धन को, मध्यम प्रकृति के व्यक्ति शबल धन को तथा अधम प्रकृति के प्राणी कृष्ण धन को वरीयता देते हैं तथा इनके अर्जन में प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार धन के बारह रूप-भेद-चारों वर्णों के उत्तम, मध्यम प्रकृति के प्राणी-हो जाते हैं। क्रमागतं प्रीतिदायः प्राप्तं च सहभार्यया। अविशेषेष वर्णानां सर्वेषां त्रिविधं शुभम् ॥ 51 ॥ तीन प्रकार के सामान्य अथवा साधारण धन का परिचय स्मृतिकार के अनुसार इस प्रकार है-निम्नोक्त तीनों धन सभी वर्णों और जातियों के लोगों के लिए समान रूप से शुद्ध हैं-
- उत्तराधिकार के रूप में पितामह-पिता आदि से प्राप्त धन।
- किसी भी सम्बन्धी, मित्र अथवा राजा (प्रशासन) द्वारा अपनी प्रसन्नता से दान, उपहार, पुरस्कार व पारितोषिक आदि के रूप में प्रदत्त धन तथा
- विवाह के समय पत्नी के साथ दहेज के रूप में प्राप्त धन। वैशेषिकं धनं ज्ञेयं ब्राह्मणस्य शुभं त्रिधा। प्रतिग्रहेण यल्लब्धं याज्यतः शिष्यतस्तथाः ॥ 52 ॥ विशेष रूप से ब्राह्मण के लिए निम्नोक्त तीन प्रकार का धन शुद्ध कहलाता है।
- दान से प्राप्त धन।
- पौरोहित्य-यज्ञ-यागादि सम्पन्न कराने पर दक्षिणा के रूप में प्राप्त धन तथा
- अध्यापन-कार्य से वेतन, शुल्क अथवा गुरुदक्षिणा के रूप में प्राप्त धन। त्रिविधं क्षत्रियस्यापि शुद्धं वैशेषिकं धनम्। कराद् युद्धोपलब्धं च दण्डाश्च व्यवहारतः ॥ 53 ॥ क्षत्रिय (राजा) का भी निम्नोक्त तीन साधनों से प्राप्त धन शुद्ध होता है।
- कर वसूली से प्राप्त धन।
- युद्ध में विजय होने पर हस्तगत शत्रु की सम्पत्ति तथा
- नियम का अतिक्रमण करने वाले एवं व्यवहार में पराजित होने वालों को अनुशासित करने के लिए उन पर लगाये अर्थ-दण्ड की वसूली से प्राप्त धन। वैशेषिकं धनं ज्ञेयं वैश्यस्यापि त्रिधा शुभम्। कृषिगोरक्षवाणिज्यैः शूद्रस्यैषामनुग्रहात् ॥ 54 ॥ वैश्य का भी निम्नोक्त तीन साधनों से प्राप्त धन शुद्ध कहलाता है।
- कृषि द्वारा-अनाज, फल, सब्जी, आदि की बिक्री से-अर्जित धन। नारदस्मृति / 77