भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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है। यहां किसी प्रकार के दुराव-छिपाव के लिए अवकाश ही नहीं है। कुसीदकृषिवाणिज्यशुल्कशिल्पानुवृत्तिभिः । कृतोपकारादाप्तं च शबलं समुदाहृतम् ॥ 46 ॥ निम्नोक्त सात साधनों से प्राप्त धन शबल—न शुक्ल, न श्याम (Neither White, nor black)—मध्यम कोटि का कहलाता है—1. ब्याज, 2. कृषि, 3. व्यापार, 4. शुल्क—काम करने का निर्धारित एवं निश्चित पारिश्रमिक (Fee), 5. शिल्प -मूर्ति, चित्र तथा स्थापत्य आदि उपयोगी कलाओं के विक्रय से प्राप्त धन, 6. सेवा-चाकरी तथा 7. उपकृत व्यक्ति द्वारा उऋण होने के लिए उपहार के रूप में समर्पित धन। उत्कोचद्यूतदौत्यर्तिप्रतिरूपकसाहसैः । व्याजेनोपार्जितं यच्च कृष्णं हि तदुदाहृतम् ॥ 47 ॥ निम्नोक्त सात साधनों द्वारा प्राप्त धन काला धन कहलाता है—1. घूस, 2. द्यूतक्रीड़ा, 3. दूतकर्म, 4. दूसरों का मन दुखाकर एवं उन्हें पीड़ा पहुंचाकर उनसे बलपूर्वक छीना गया, 5. चोरी, 6. डकैती तथा 7. छल-कपट, धोखाधड़ी। तेन क्रयो विक्रयश्च दानं ग्रहणमेव च। विविधाश्च प्रवर्त्तन्ते क्रियाः सम्भोग एव च ॥ 48 ॥ संसार में सभी कार्य—क्रय-विक्रय, दान-प्रतिग्रह के अतिरिक्त अन्यान्य नाना प्रकार के उपभोग—इन्हीं तीन शुक्ल, शबल तथा श्याम प्रकार के धनों से ही सम्पन्न होते हैं। यथाविधेन द्रव्येण यत्किञ्चित् कुरुते नरः । तथाविधमवाप्नोति सफलं प्रेत्य चेह च ॥ 49 ॥ इन तीनों—शुक्ल, शबल और कृष्ण—प्रकार के धनों में जिस प्रकार के धन से व्यक्ति शुभाशुभ कार्य करता है, उसे इस लोक में तथा परलोक में उसी प्रकार का फल मिलता है। अभिप्राय यह है कि शुद्ध ढंग से कमाये धन से शुभकर्मों का उत्तम फल और दूसरे धनों से किये कर्मों का मध्यम या अधम फल मिलता है। तत्पुनर्द्वादशविधं प्रतिवर्णाश्रयात्स्मृतम् । साधारणं स्यात्त्रिविधं शेषं नवविधं विदुः ॥ 50 ॥ धन के ये तीनों—शुक्ल, शबल और कृष्ण—रूप चारों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—वर्णों के सन्दर्भ में बारह प्रकार के हो जाते हैं। धन के उपर्युक्त तीन रूप-भेद तो सामान्य हैं, अर्थात् चारों वर्णों के लोग सामान्य रूप से धन के अर्जन में शुक्ल, शबल और कृष्ण साधनों का प्रयोग-उपयोग करते हैं। अतः धन के ये तीन सामान्य अथवा साधारण रूप भेद हैं, परन्तु नौ रूपों में दो की विशेष स्थिति है। उदाहरणार्थ, सामान्यतः ब्राह्मण और क्षत्रिय केवल शुक्ल धन को, वैश्य 76 / नारदस्मृति