नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंदस वर्षों तक प्रशिक्षित करने का विधान किया है। बालक के सोलह वर्षों का होने पर उसके साथ मित्रवत् व्यवहार करने का निर्देश किया है, जिसका अर्थ है कि बालक सोलह वर्षों की आयु में ही समझदार हो पाता है— लालयेत् पञ्चवर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्॥ परतो व्यवहारज्ञः स्वतन्त्रः पितरौ बिना। जीवतोरस्वतन्त्रः स्याज्जरयापि समन्वितः ॥ 36 ॥ सोलह वर्ष से ऊपर की आयु का होने पर बालक को व्यवहारकुशल समझना चाहिए और तब वह माता-पिता की अनुमति अथवा सहमति के बिना भी व्यवहार करने को स्वतन्त्र हो जाता है। इस प्रकार पुत्र को अपने व्यवहारकुशल हो जाने पर और माता-पिता के वृद्ध, रोगग्रस्त और असमर्थ हो जाने पर भी उनके जीवनकाल तक अपने को उनके अधीन-अस्वतन्त्र मानकर ही चलना चाहिए। तयोरपि पिता श्रेयान् बीजप्राधान्यदर्शनात्। अभावे बीजिनो माता तदभावे तु पूर्वजः ॥ 37 ॥ पुत्र के लिए माता और पिता दोनों ही समान रूप से आदरणीय हैं, परन्तु फिर भी माता की अपेक्षा पिता का महत्त्व कहीं अधिक है; क्योंकि योनि (धरती) की अपेक्षा वीर्य (बीज) की प्रधानता सर्वसम्मत है। पिता अथवा पति के न रहने पर माता और माता के न रहने पर ज्येष्ठ पुत्र (भाइयों के हिसाब से अग्रज अथवा ज्येष्ठ भ्राता) स्वतन्त्र है। पति के जीवनकाल में पत्नी की और माता के जीवनकाल में पुत्रों की परतन्त्रता निश्चित है। स्वतन्त्राः सर्व एवैते परतन्त्रेषु सर्वदा। अनुशिष्टौ विसर्गे च विक्रये चेश्वरा मताः ॥ 38 ॥ उपर्युक्त राजा, आचार्य और गृहपति अपने परतन्त्र विषयों—प्रजा, शिष्य तथा आश्रित सदस्य—के सन्दर्भ में ही स्वतन्त्र हैं। राजा प्रजा के, आचार्य शिष्य के तथा गृहपति परिवारजनों के अनुशासन में तथा अपनी सम्पत्ति के दान एवं विक्रय में स्वतन्त्र एवं सम्प्रभुता प्राप्त हैं। यद्बालः कुरुते कार्यमस्वतन्त्रस्तथैव च। अकृतं तदिति प्राहुर्धर्मशास्त्रविदो जनाः ॥ 39 ॥ जिस प्रकार बालक द्वारा किये गये व्यवहार को अमान्य एवं अप्रामाणिक माना जाता है, उसी प्रकार स्वतन्त्रों के स्थान पर परतन्त्रों द्वारा, अर्थात् राजा के स्थान पर प्रजाजनों द्वारा, आचार्य के स्थान पर शिष्य द्वारा तथा गृहपति के स्थान पर आश्रितों द्वारा किये गये कार्य को भी सर्वथा अप्रामाणिक एवं असिद्ध ही मानना चाहिए। नारदस्मृति / 73