भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

त्रयः स्वतन्त्रा लोकेऽस्मिन् राजाचार्यस्तथैव च। प्रतिवर्णं च सर्वेषां वर्णानां स्वे गृहे गृही ॥ 32 ॥ इस संसार में तीन व्यक्ति ही स्वतन्त्र हैं—राजा, आचार्य तथा अपने वर्ण में स्थित घर का मुखिया। ये तीनों जो कुछ भी करना चाहें, कर सकते हैं। इन्हें अपने अपने क्षेत्र—राजा को राज्य में, आचार्य को गुरुकुल अथवा आश्रम में तथा गृहपति को अपने घर-परिवार—में कुछ करने के लिए किसी की अनुमति नहीं लेनी पड़ती। अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः स्वतन्त्रः पृथिवीपतिः। अस्वतन्त्रः स्मृतः शिष्यः आचार्ये तु स्वतन्त्रता ॥ 33 ॥ इसी तथ्य की आवृत्ति करते हुए स्मृतिकार का कथन है—राजा स्वतन्त्र है और उसके द्वारा शासित एवं उसके अधीनस्थ प्रजा परतन्त्र है; क्योंकि प्रजा राजा के आदेश-निर्देश का पालन करने को बाध्य है। आचार्य स्वतन्त्र है और उससे शिक्षा ग्रहण करने वाला एवं उसके आश्रम में रहने वाला छात्र परतन्त्र है; क्योंकि उसे गुरु के आदेश से अथवा उनके द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार ही अपनी दिनचर्या बनानी पड़ती है। अस्वतन्त्रा स्त्रियः पुत्रा दासादिश्च परिग्रहः। स्वतन्त्रस्तत्र तु गृही यस्य यत् स्यात् क्रमागतम् ॥ 34 ॥ इसी प्रकार गृहस्वामी स्वतन्त्र है और अपने भरण-पोषण के लिए उस पर आश्रित स्त्रियां, पुत्र, दास-दासियां तथा अन्य सम्बन्धी परतन्त्र हैं; क्योंकि कुल- परम्परा से प्राप्त सम्पत्ति की रक्षा और वृद्धि तथा नयी सम्पत्ति के अर्जन के साथ- साथ परिवार के सभी सदस्यों के भरण-पोषण का व उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति का सारा दायित्व गृहस्वामी का ही है। गर्भस्थसदृशो ज्ञेयः अष्टमाद् वत्सराच्छिशुः। बाल आषोडशाद् वर्षात् पोगण्ड इति शस्यते ॥ 35 ॥ आठ वर्ष की आयु तक के बालक को गर्भस्थ बालक के समान समझना चाहिए, अर्थात् उससे किसी प्रकार का व्यवहार करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सत्य तो यह है कि जब तक बालक सोलह वर्ष का नहीं हो जाता, तब तक उसे पोगण्ड (अनाड़ी) ही समझना चाहिए। वस्तुतः यह आयु तो बालक के खेलने-कूदने और मौज-मस्ती करने की होती है। इस आयु में उसे किसी प्रकार का कोई दायित्व सौंपना, उसके बचपन की हत्या करना ही है। टिप्पणी—मनु ने भी पांच वर्ष तक बालक को लाड़-प्यार करने का और 72 / नारदस्मृति