नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ
पृष्ठ 84, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 84
लिखितं स्याद् बहुच्छिद्रं साक्षिणो नाजरामराः। भुक्तिस्त्वनर्थसम्बद्धा सन्ततैवार्थसाधकी ॥ 73 ॥ किसी भी व्यवहार के निर्णय में तीन प्रमाण सहायक सिद्ध होते हैं—
- लिखित पत्र (दस्तावेज़) 2. प्रत्यक्षदर्शियों का साक्ष्य तथा 3. भुक्ति। ये तीनों प्रमाण भी सर्वथा निर्दोष नहीं। उदाहरणार्थ, लिखित प्रमाण में कई ग़लतियां हो सकती हैं तथा लिखित लेख के भिन्न भिन्न अर्थ निकाले जा सकते हैं। साक्षी भी अजर-अमर नहीं हैं, वे भी बूढ़े होकर स्मरणशक्ति खोने वाले हो सकते हैं, मर भी सकते हैं। यही स्थिति क़ब्ज़े की भी है, क़ब्ज़ा अधिकृत भी हो सकता है, अनधिकृत भी। Might is Right, यानी 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' उक्तियां सत्य सिद्ध हो सकती हैं। इस प्रकार प्रयोजन की सिद्धि में इन तीनों पर सदैव निर्भर नहीं रहा जा सकता। बेईमान व्यक्ति तो सभी साधनों को धता बता देता है। तदेतत्त्रिविधं ज्ञेयं प्रमाणाय न साधितम्। सन्देहमागतमपि धनी धनमवाप्नुयात् ॥ 74 ॥ स्वामित्व के सम्बन्ध में सन्देह तथा अनिश्चय की स्थिति में किसी भी प्रमाण को न जुटा पाने पर स्वामी द्वारा विवादित धन-सम्पत्ति को पाना अवश्य सम्भव नहीं होता, परन्तु तीन—लिखित, साक्ष्य तथा भुक्ति-प्रमाणों—में से किसी एक प्रमाण के भी मिल जाने पर प्राप्ति की सम्भावना बन ही जाती है। आवश्यकता केवल प्रमाण के मिलने की नहीं होती, अपितु उस प्रमाण का पुष्ट होना भी अत्यावश्यक होता है। लिखितं बलवन्नित्यं जीवन्तश्चैव साक्षिणः कालातिहरणाद् भुक्तिरिति शास्त्रविनिश्चयः ॥ 75 ॥ शास्त्र की यह व्यवस्था है कि लिखित प्रमाण सर्वदा एवं सर्वथा सभी अन्य प्रमाणों की अपेक्षा अधिक बलवान् होता है। यदि साक्षी जीवित हैं और उनकी स्मरणशक्ति अक्षुण्ण है, तो उनकी आंखों के सामने घटी घटना का उनके द्वारा यथावत् वर्णन भी एक प्रकार से निश्चित प्रमाण है। इसी प्रकार पर्याप्त समय व्यतीत हो जाने पर भुक्ति—भोगा जाना, प्रयोग में आना, अर्थात् क़ब्ज़ा होना—भी एक असन्दिग्ध प्रमाण है। इन तीनों प्रमाणों की अपनी एक निश्चित सार्थकता है। यह पूर्णतः शास्त्रसम्मत है। त्रिविधस्यास्य दृष्टस्य प्रमाणस्य यथाक्रमम्। पूर्वं-पूर्वं गुरुं ज्ञेयं भुक्तिस्तेभ्यो गरीयसी ॥ 76 ॥ यद्यपि इन तीनों—लिखित, साक्ष्य एवं भुक्ति-प्रमाणों में पूर्व-पूर्व, अर्थात् भुक्ति की अपेक्षा साक्ष्य और साक्ष्य की अपेक्षा लिखित अधिक बलवान् है, तथापि भुक्ति की कोई तुलना नहीं। जो सम्पत्ति जिसके अधिकार में है, जो उसका उपभोग कर रहा है, उसके स्वामित्व में सन्देह कैसा ? 82 / नारदस्मृति