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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

लिखितं स्याद् बहुच्छिद्रं साक्षिणो नाजरामराः। भुक्तिस्त्वनर्थसम्बद्धा सन्ततैवार्थसाधकी ॥ 73 ॥ किसी भी व्यवहार के निर्णय में तीन प्रमाण सहायक सिद्ध होते हैं—

  1. लिखित पत्र (दस्तावेज़) 2. प्रत्यक्षदर्शियों का साक्ष्य तथा 3. भुक्ति। ये तीनों प्रमाण भी सर्वथा निर्दोष नहीं। उदाहरणार्थ, लिखित प्रमाण में कई ग़लतियां हो सकती हैं तथा लिखित लेख के भिन्न भिन्न अर्थ निकाले जा सकते हैं। साक्षी भी अजर-अमर नहीं हैं, वे भी बूढ़े होकर स्मरणशक्ति खोने वाले हो सकते हैं, मर भी सकते हैं। यही स्थिति क़ब्ज़े की भी है, क़ब्ज़ा अधिकृत भी हो सकता है, अनधिकृत भी। Might is Right, यानी 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' उक्तियां सत्य सिद्ध हो सकती हैं। इस प्रकार प्रयोजन की सिद्धि में इन तीनों पर सदैव निर्भर नहीं रहा जा सकता। बेईमान व्यक्ति तो सभी साधनों को धता बता देता है। तदेतत्त्रिविधं ज्ञेयं प्रमाणाय न साधितम्। सन्देहमागतमपि धनी धनमवाप्नुयात् ॥ 74 ॥ स्वामित्व के सम्बन्ध में सन्देह तथा अनिश्चय की स्थिति में किसी भी प्रमाण को न जुटा पाने पर स्वामी द्वारा विवादित धन-सम्पत्ति को पाना अवश्य सम्भव नहीं होता, परन्तु तीन—लिखित, साक्ष्य तथा भुक्ति-प्रमाणों—में से किसी एक प्रमाण के भी मिल जाने पर प्राप्ति की सम्भावना बन ही जाती है। आवश्यकता केवल प्रमाण के मिलने की नहीं होती, अपितु उस प्रमाण का पुष्ट होना भी अत्यावश्यक होता है। लिखितं बलवन्नित्यं जीवन्तश्चैव साक्षिणः कालातिहरणाद् भुक्तिरिति शास्त्रविनिश्चयः ॥ 75 ॥ शास्त्र की यह व्यवस्था है कि लिखित प्रमाण सर्वदा एवं सर्वथा सभी अन्य प्रमाणों की अपेक्षा अधिक बलवान् होता है। यदि साक्षी जीवित हैं और उनकी स्मरणशक्ति अक्षुण्ण है, तो उनकी आंखों के सामने घटी घटना का उनके द्वारा यथावत् वर्णन भी एक प्रकार से निश्चित प्रमाण है। इसी प्रकार पर्याप्त समय व्यतीत हो जाने पर भुक्ति—भोगा जाना, प्रयोग में आना, अर्थात् क़ब्ज़ा होना—भी एक असन्दिग्ध प्रमाण है। इन तीनों प्रमाणों की अपनी एक निश्चित सार्थकता है। यह पूर्णतः शास्त्रसम्मत है। त्रिविधस्यास्य दृष्टस्य प्रमाणस्य यथाक्रमम्। पूर्वं-पूर्वं गुरुं ज्ञेयं भुक्तिस्तेभ्यो गरीयसी ॥ 76 ॥ यद्यपि इन तीनों—लिखित, साक्ष्य एवं भुक्ति-प्रमाणों में पूर्व-पूर्व, अर्थात् भुक्ति की अपेक्षा साक्ष्य और साक्ष्य की अपेक्षा लिखित अधिक बलवान् है, तथापि भुक्ति की कोई तुलना नहीं। जो सम्पत्ति जिसके अधिकार में है, जो उसका उपभोग कर रहा है, उसके स्वामित्व में सन्देह कैसा ? 82 / नारदस्मृति

टिप्पणी—लोक में उक्ति प्रचलित है—'क़ब्ज़ा सच्चा, झगड़ा झूठा।' इसी प्रकार बारह वर्षों तक किसी सम्पत्ति के अबाध उपभोग करने वाले को भारतीय संविधान भी स्वामित्व का अधिकार देता है। भले ही उसने वह सम्पत्ति न खरीदी हो और न ही उत्तराधिकार में पायी हो, फिर भी यदि बारह वर्षों तक अथवा उससे अधिक समय तक उस सम्पत्ति पर अपना क़ब्ज़ा सिद्ध कर देता है, तो वह उसका वास्तविक स्वामी बन जाता है। विद्यमानेऽपि लिखिते जीवत्स्वपि हि साक्षिषु। विशेषतः स्थावराणां यन्न भुक्तं न तत् स्थिरम् ॥ 77 ॥ लिखित प्रमाण और साक्षियों के जीवित होने, अर्थात् साक्ष्य उपलब्ध होने पर भी जिस अचल सम्पत्ति पर व्यक्ति का क़ब्ज़ा नहीं है, अर्थात् जो दूसरे के अधिकार में है, उस सम्पत्ति का स्वामी होते हुए भी व्यक्ति सच्चे अर्थों में स्वामी नहीं होता; क्योंकि वह उस सम्पत्ति को न बेच सकता है, न बन्धक रख सकता है और न ही उसका स्वयं उपयोग कर सकता है। इससे सिद्ध होता है कि सच्चा स्वामित्व तो क़ब्ज़ा है और वही सर्वाधिक प्रबल प्रमाण है। जिस अचल सम्पत्ति पर अपना क़ब्ज़ा नहीं, उसे अपनी मानना ही नहीं चाहिए। भुज्यमानान् परैरर्थान् यः स्वामौर्ख्यादुपेक्षते। समक्षं जीवितोऽप्यस्य तान् भुक्तिः कुरुते वशे ॥ 78 ॥ दूसरों द्वारा अपनी सम्पत्ति के उपभोग-उपयोग की उपेक्षा न करने, अर्थात् दूसरों को अपनी सम्पत्ति का उपयोग न करने देने का परामर्श देते हुए स्मृतिकार कहता है—दूसरों को अपनी सम्पत्ति का उपयोग करते देखकर उसे गम्भीरता से न लेना, उसकी उपेक्षा करना, अर्थात् उन्हें अपनी स्थायी अचल सम्पत्ति का उपयोग करने देना बहुत बड़ी मूर्खता है, जिसका परिणाम अत्यन्त भयंकर होता है। ऐसा व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही अपनी सम्पत्ति पर अपने स्वामित्व को गंवा बैठता है। सब प्रकार के प्रमाणों के रहते हुए भी उसकी सम्पत्ति उपभोक्ता के हाथ में चली जाती है। अतः किसी भी प्रकार से व्यक्ति को अपनी अचल सम्पत्ति पर किसी दूसरे को, किसी भी प्रकार से क़ब्ज़ा नहीं करने देना चाहिए। यत् किञ्चिद्दशवर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी। भुज्यमानं परैस्तूष्णीं न स तल्लब्धुमर्हति ॥ 79 ॥ अपने सामने अपनी सम्पत्ति का दूसरों को उपभोग करता देखकर भी निरन्तर दस वर्षों तक मौन रहने वाले, अर्थात् उसे न रोकने-टोकने वाले और न ही किसी प्रकार की कोई आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति का उस सम्पत्ति पर से स्वामित्व स्वतः ही निरस्त हो जाता है। उसके स्थान पर सम्पत्ति के उपभोग करने वाले का उस सम्पत्ति पर नैतिक स्वामित्व स्थापित हो जाता है। नारदस्मृति / 83

अभिप्राय यह है कि यदि व्यक्ति अपनी अचल सम्पत्ति पर अपना अधिकार अक्षुण्ण रखना चाहता है, तो सर्वप्रथम उसे किसी दूसरे व्यक्ति को उस सम्पत्ति के उपभोग की अनुमति ही नहीं देनी चाहिए और यदि किसी ने बलपूर्वक अधिकार कर लिया है, तो उसके विरुद्ध नैतिक एवं क़ानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। अपनी सम्पत्ति पर दूसरों के अधिकार को उपेक्षणीय विषय नहीं समझना चाहिए। इस सम्बन्ध में की गयी उपेक्षा का परिणाम सम्पत्ति से हाथ धो बैठना होता है। अजडश्चेदपोगण्डो विषये चास्य भुज्यते। भग्नं तद्व्यवहारेण भोक्ता तद्धनमर्हति ॥ 80 ॥ अचल सम्पत्ति के स्वामी के अवयस्क तथा अजड़ (अविकसित मस्तिष्क) न होने पर, उसकी जानकारी में उसकी सम्पत्ति का उपभोग करने वाला दूसरा व्यक्ति उस सम्पत्ति का पक्का एवं सच्चा स्वामी बन जाता है। अभिप्राय यह है कि यदि अचल सम्पत्ति का स्वामी बालक है अथवा मन्दबुद्धि है, तो उसकी सम्पत्ति का दूसरों द्वारा उपभोग किये जाने पर भी क़ानून मूल स्वामी के अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है; क्योंकि क़ानून अनुचित लाभ उठाने की अनुमति कदापि नहीं देता। इसके विपरीत स्वामी के पूर्ण युवा तथा सामान्य बुद्धि का होने पर, यदि वह अपनी सम्पत्ति का दूसरों द्वारा उपयोग किया जाता देखकर भी मौन रहता है, उपेक्षा का भाव दिखाता है अथवा विरोध प्रदर्शन नहीं करता है, तो निश्चित है कि उसे उस सम्पत्ति में कोई रुचि नहीं। ऐसे व्यक्ति का अपनी सम्पत्ति पर स्वामित्व निरस्त हो जाता है और वह सम्पत्ति उपभोक्ता के स्वामित्व में चली जाती है। टिप्पणी— वररुचि ने विकलांग को भी जड़ मानते हुए उसे संरक्षण प्रदान किया है। उनके अनुसार क़ानून को विकलांग की सम्पत्ति के दूसरे व्यक्ति द्वारा उपभोग को कभी मान्यता नहीं देनी चाहिए— शरीरपाणिचरणैर्निसर्गेणशरीरिणः । विकलाः सद्भिरुच्यन्ते पोगण्डकुणिपुंगवः ॥ आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधी स्त्रियः । राजस्वं श्रोत्रियद्रव्यं न भोगेन प्रणश्यति ॥ 81 ॥ निम्नोक्त स्थितियों में दूसरों द्वारा अचल सम्पत्ति का उपभोग किये जाने पर भी उस पर मूल स्वामी का स्वामित्व निरस्त नहीं होता—

  1. बन्धक रखी गयी सम्पत्ति किसी भी समय— यदि अवधि निर्धारित नहीं की गयी, तो ऋण को चुकता कर-छुड़ायी जा सकती है। ऐसी सम्पत्ति अवधि के निर्धारित होने और उसके बीत जाने पर भी, सम्पत्ति पर मूल स्वामी का स्वामित्व समाप्त नहीं हो जाता। हां, जुर्माना चुकाना पड़ता है, परन्तु स्वामित्व बना रहता है। 84 / नारदस्मृति
  1. आक्रमण एवं बल प्रयोग द्वारा छीनी गयी सम्पत्ति—शक्ति सञ्चित होने पर पुनः अपने अधिकार में की जा सकती है।
  2. बालक की सम्पत्ति—वयस्क होने पर व्यक्ति क़ानून की सहायता से अपनी सम्पत्ति को वापस ले सकता है।
  3. निक्षेप, अर्थात् धरोहर के रूप में रखी सम्पत्ति को भी मूल स्वामी किसी भी समय अपने अधिकार में लेने को स्वतन्त्र होता है।
  4. उपनिधि, अर्थात् अमानत में की गयी ख़यानत—हेराफेरी-बेईमानी— अर्थात् धूर्तता से कुछ भाग को अपने अधिकार में कर लेना और उस धूर्तता की कुछ समय उपरान्त जानकारी होना। इस प्रकार की सम्पत्ति को भी क़ानून की सहायता से वापस पाया जा सकता है।
  5. स्त्रीधन, अर्थात् पति, पिता, भ्राता आदि निकट सम्बन्धियों द्वारा अपनी प्रीति से दिये धन पर केवल उस धन को पाने वाली स्त्री का ही एकाधिकार होता है। उस स्त्रीधन को अथवा ऋण पाने के लिए पति द्वारा बन्धक के रूप में रखी स्त्री को भी मूल स्वामी को वापस पाने का अधिकार होता है।
  6. राजस्व, अर्थात् भू-सम्पदा—आवास, भू-खण्ड अथवा कृषिक्षेत्र आदि पर भी उपभोक्ता सदा के लिए अपना अधिकार नहीं जमा सकता।
  7. श्रोत्रिय द्रव्य, अर्थात् यज्ञ-यागादि कराने वाले ब्राह्मण द्वारा दक्षिणा के रूप में प्राप्त गायों अथवा स्वर्ण आदि का अपहर्ता भी अपना अधिकार स्थिर नहीं रख पाता। उपर्युक्त आठ सम्पत्तियों का दूसरा व्यक्ति कितने समय तक भी उपयोग- उपभोग क्यों न कर ले, परन्तु वह उनका स्वामी कभी नहीं बन सकता। इस वस्तुओं पर मूल स्वामी का स्वामित्व अक्षुण्ण बना रहता है। प्रत्यक्षपरिभोगात्तु स्वामिनो द्विद्शः समाः। आध्यादीन्यपि जीर्यन्ते स्त्रीनरेन्द्रधनादृते॥ 82॥ दोनों—स्त्रीधन, स्त्री के निजी अधिकार का धन अथवा स्त्री-रूपी धन— तथा राजा की धन-सम्पत्तियों को छोड़कर शेष अन्य सभी सम्पत्तियों का प्रत्यक्ष रूप से निरन्तर बीस वर्षों से अधिक अवधि तक उपयोग-उपभोग करने वाला उन सम्पत्तियों का स्वामी बन जाता है। टिप्पणी—यहां दो बातें ध्यान देने योग्य हैं—प्रथम, स्त्रीधन और सरकारी धन तो सदैव मूल स्वामी का ही रहता है, भले ही दूसरा इनका उपयोग उपभोग कितने ही समय से क्यों न करता आ रहा हो। द्वितीय, अन्य सम्पत्तियों पर उपभोक्ता के अधिकारी बनने के लिए दो शर्तें नारदस्मृति / 85

रखी गयी हैं—1. उपभोग की अवधि बीस वर्ष अथवा उससे अधिक होनी चाहिए तथा 2. उपभोग सर्वजनविदित होना चाहिए, गुप्त रूप से किया गया क़ब्ज़ा मान्य नहीं होता। यहां इस तथ्य को विस्मरण नहीं करना चाहिए कि प्राचीनकाल में स्त्री को भी—पुरुष, पिता, पति आदि का—निजी धन माना जाता था। उसका स्वामी उसे बन्धक रखने, बेचने, दांव पर लगाने आदि को स्वतन्त्र था। स्त्री का कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व नहीं था, वह अपने स्वामी के आदेश का पालन करने को बाध्य थी। उसकी स्थिति पशु अथवा दास के समान ही थी। ऐसा केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं था, अन्य धर्मों में भी यही कुछ है। इस्लाम के अनुसार तो वह 'जिंस' (Property) है, उसमें रूह (आत्मा) तो है ही नहीं। इसी सन्दर्भ में स्मृतिकार का मन्तव्य दर्शनीय है। स्त्रीधनं च नरेन्द्रणां न कथञ्चन जीर्यते। अनागमं भुज्यमानं वत्सराणां शतैरपि ॥ 83 ॥ दोनों—स्त्रीधन और राजकीय सम्पत्ति (भूमि, भवन आदि)—का निरन्तर प्रत्यक्ष रूप से सौ वर्षों तक भोग करने वाला व्यक्ति भी उनका स्वामी नहीं बन पाता। हां, इस सम्बन्ध में यदि किसी प्रकार का कोई लिखित अनुबन्ध (Agreement) कर लिया जाता है, तो स्थिति भिन्न हो जाती है, अर्थात् तब उपभोक्ता स्वामित्व प्राप्त कर लेता है। सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित्। आगमः कारणं तत्र न भोगस्तत्र कारणम् ॥ 84 ॥ इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए स्मृतिकार का कथन है—जिस सम्पत्ति पर उपभोक्ता का क़ब्ज़ा तो है, परन्तु उसके पास किसी प्रकार का कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं है, तो उस स्थिति में भोग (क़ब्ज़ा) को कोई महत्त्व नहीं दिया जा सकता; क्योंकि लिखित अनुबन्ध ही स्वामित्व का मूल-आधार है, क़ब्ज़ा नहीं। ऐसा व्यक्ति अनिश्चित अवधि तक सम्पत्ति का उपभोग करता रह सकता है, परन्तु स्वामी होने का अधिकार कभी नहीं पा सकता। आगमेन विशुद्धेन भोगो याति प्रमाणताम्। अविशुद्धागमो भोगः प्रामाण्यं नैव गच्छति ॥ 85 ॥ लिखित प्रमाण (दस्तावेज़) भी तभी मान्य होता है, जब वह पूर्णतः विशुद्ध हो, अर्थात् लेने-देने वालों के नाम, पिता का नाम, पता ठिकाना, सम्पत्ति का विवरण, देने की तिथि, दिन, मास और वर्ष, बदले में लिया दिया धन एवं शर्तें आदि सब कुछ का उल्लेख हो और लेन-देन करने वाले स्वस्थ मस्तिष्क की स्थिति में हों तथा लेन-देन बिना किसी दबाव, विवशता और नशे में किया गया 86 / नारदस्मृति

हो। इसके अतिरिक्त दस्तावेज़ साक्षियों द्वारा समर्थित और सरकारी अधिकारी द्वारा सत्यापित होना चाहिए। उपर्युक्त सभी कुछ न लिये रहने वाला दस्तावेज़ पूर्णतः विशुद्ध न होने से प्रामाणिक नहीं कहलाता। शुद्ध दस्तावेज़ होने पर ही सम्पत्ति का स्वामित्व वैध बन पाता है। भोगं केवलतो यस्य कीर्त्तयेन्नागमः क्वचित्। भोगच्छलापदेशेन स विज्ञेयस्तु तस्करः॥ 86 ॥ जिस सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा तो है, परन्तु क़ाबिज़ के पास उस सम्पत्ति के ख़रीदने अथवा उपहार में पाने अथवा पैतृक होने अथवा बन्धक या धरोहर होने आदि का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं, तो सम्पत्ति पर अपने स्वामित्व का दावा करने वाले व्यक्ति को चोर ही समझना चाहिए। अभिप्राय यह है कि बिना किसी पक्के, विशुद्ध और सच्चे लिखित प्रमाण के ख़ाली क़ब्ज़े का कोई विशेष महत्त्व नहीं। यह तो एक प्रकार की चोरी अथवा सीनाज़ोरी है, अर्थात् दण्डनीय अपराध है। ख़ाली क़ब्ज़े के आधार पर अपने को सम्पत्ति का स्वामी सिद्ध करने वाले को तो दण्डित ही करना चाहिए। अनागमं तु यो भुङ्क्ते बहून्यब्दशतान्यपि। चौरदण्डेन तं पापं दण्डयेत् पृथिवीपतिः॥ 87 ॥ राजा को बिना किसी प्रमाण के, अर्थात् स्वामी न होने पर भी अपने बल, युक्ति अथवा धूर्तता का आश्रय लेकर किसी दूसरे की सम्पत्ति पर अनुचित रूप से अपना क़ब्ज़ा जमाने वाले को चोर के लिए निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए; क्योंकि वस्तुतः ऐसा व्यक्ति धूर्त और पापी होता है और उसे दण्ड देना न्याय की रक्षा करना है। भुज्यतेऽनागमं यत्तु न तद् भोगपदं नयेत्। प्रेतं तु भोक्तरि धनं याति तद्वंश्यभोग्यताम्॥ 88 ॥ बिना किसी लिखित प्रमाण के किसी की सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा करने वाला व्यक्ति तो कभी उस सम्पत्ति का स्वामी नहीं बन सकता, परन्तु उसके मर जाने पर वह सम्पत्ति उसके उत्तराधिकारियों की ही सम्पत्ति रहती है, अर्थात् क़ब्ज़ा करने वाले व्यक्ति के मरने पर क़ब्ज़ा निरस्त नहीं हो जाता, अपितु उसके वंशस्थों को स्थानान्तरित हो जाता है। स्मार्त्ते काले क्रियाभुक्तेः सागमाभुक्तिरिष्यते। अस्मार्त्ते लिखिताभावे क्रमात्त्रिपुरुषागता॥ 89 ॥ यदि किसी सम्पत्ति पर तीन पीढ़ियों तक एक ही परिवार का क़ब्ज़ा बना रहता है और उस अवधि में क़ब्ज़ा करने वालों के विरुद्ध कोई क़ानूनी कार्यवाही नहीं की जाती है, तो उस सम्पत्ति पर क़ाबिज़ों का स्वामित्व हो जाता है। यदि नारदस्मृति / 87

वास्तविक स्वामी उस सम्पत्ति की सुध-खबर नहीं लेता, देखभाल नहीं करता, लिखित प्रमाण रखने पर भी सौ वर्षों तक अपनी सम्पत्ति को अपने अधिकार में नहीं लेता, तो उस लेख की वैधता समाप्त हो जाती है। उस पर क़ब्ज़ा करने वाला ही स्वामी बन जाता है। आहूतैर्वाभियुक्तः स्यान्नाथार्थान्नामुद्धरेत्पदम्। भुक्तिरेव विशुद्धःस्यात् प्राप्तौ या पितृतः क्रमात् ॥ 90 ॥ यदि किसी की सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा करने वाले पर मूल स्वामी द्वारा अभियोग चलाया जाता है और न्यायाधिकारी निर्धारित राशि का भुगतान पाने पर उसे क़ब्ज़े को ख़ाली करने का आदेश तो सुनाते हैं, परन्तु सम्पत्ति को छुड़ाने का इच्छुक एवं वास्तविक स्वामी न्यायाधिकारी द्वारा निर्धारित अवधि में निर्दिष्ट राशि का भुगतान नहीं करता है अथवा नहीं कर पाता है और इधर क़ब्ज़ा बाप-दादा के समय से चला आ रहा है, तो वह सम्पत्ति विशुद्ध रूप से क़ब्ज़ा करने वालों के स्वामित्व में चली जाती है और फिर मूल स्वामी अपना दावा प्रस्तुत नहीं कर सकता। अभिप्राय यह है कि मूल स्वामी दूसरे के क़ब्ज़े में गयी अपनी सम्पत्ति को छुड़ाने को लिए न्यायाधिकरण की शरण लेता है, तो उसे न्यायाधिकारी द्वारा किये निर्णय का पालन अवश्य करना चाहिए, अन्यथा वह सदा के लिए अपनी सम्पत्ति से हाथ धो बैठता है। अन्यायेनापि यद्भुक्तं पितुः पूर्वस्तरैस्त्रिभिः । न तच्छक्यमपाहर्तुं क्रमात्त्रिपुरुषागतम् ॥ 91 ॥ अन्यायपूर्वक ही क्यों न हो, निरन्तर अविच्छिन्न रूप से पिता से भी पहले तीन-चार पीढ़ियों से चले आ रहे क़ब्ज़े को निरस्त नहीं किया जा सकता। ऐसा क़ब्ज़ा अवैध होते हुए भी वैध बन जाता है। अभिप्राय यह है कि तीन-चार पीढ़ियों तक अपनी सम्पत्ति की उपेक्षा करने वाले, अपनी सम्पत्ति पर दूसरे के क़ब्ज़े को चुनौती न देने वाले को सम्पत्ति के स्वामित्व को बनाये रखने का कोई अधिकार ही नहीं रह जाता। अन्वाहितं हृतं न्यस्तं बलावष्टब्धयाचितम्। अप्रत्यक्षं च यद् भुक्तं षडेतान्यागमं बिना ॥ 92 ॥ निम्नोक्त छह परिस्थितियों में किये गये क़ब्ज़े को भी वैधता एवं चुनौती दी जा सकती है और उसे निरस्त कराया जा सकता है-

  1. किसी एक को विश्वास से दी गयी सम्पत्ति को उसके द्वारा स्वामी की अनुमति एवं जानकारी के बिना किसी अन्य को दे देना (किरायेदार द्वारा किराये के मकान, खेत आदि को किसी अन्य को किराये पर उठा देना)।
  2. बलपूर्वक हरण करना। 88 / नारदस्मृति
  1. धरोहर के रूप में रखी सम्पत्ति को अपनी मान लेना।
  2. लुक-छिपकर चोरी से प्रयोग करना।
  3. ऋण लेकर या बन्धक रखकर सम्पत्ति को न लौटाना तथा
  4. मूल-स्वामी की अनुपस्थिति (बाहर गये होने पर) में प्रयोग करना। तथारूढविवादस्य प्रेतस्य व्यवहारिणः। पुत्रेण सोऽर्थः संशोध्यो न तं भोगपदं नयेत् ॥ 93 ॥ अभियोग के निपटने से पूर्व वादी अथवा प्रतिवादी की मृत्यु हो जाने पर उनके पुत्र को अभियोग को आगे बढ़ाना (पैरवी करनी) चाहिए। विवादित सम्पत्ति का संशोधन किये बिना क़ब्ज़े को स्वामित्व का आधार नहीं मान लेना चाहिए। सन्तोऽपि न प्रमाणं स्युर्मृते धन्विनि साक्षिणः। अन्यत्र श्राविताद्यस्मात् स्वयमासन्नमृत्युना ॥ 94 ॥ यदि व्यक्ति ने मरते समय अपने आस-पास बैठे व्यक्तियों की उपस्थिति में किसी के ऋण को चुकता करने की कोई बात कही है, तो उसकी मृत्यु के उपरान्त भी साक्षियों का साक्ष्य वैध होता है, अन्यथा ऋणकर्ता द्वारा किसी प्रकार की कोई स्वीकृति न किये जाने पर उसके जीवित रहते अथवा मर जाने पर साक्षियों के साक्ष्य का कोई महत्त्व नहीं होता; क्योंकि यदि सम्बद्ध व्यक्ति ने कुछ कहा ही नहीं, तो साक्षी या साक्षियों का साक्ष्य अपनी ओर से जोड़ा माना जायेगा। ऐसा साक्ष्य कभी सत्य एवं प्रामाणिक नहीं कहला सकता। न हि प्रत्यर्थिनि प्रेते प्रमाणं साक्षिणां वचः। साक्षिमत्कारणं तत्र प्रमाणं तत्र जीवतः ॥ 95 ॥ साक्षियों का साक्ष्य सम्बद्ध व्यक्ति के जीवनकाल तक, अर्थात् उसके जीवित रहने तक ही मान्य रहता है। सम्बद्ध व्यक्ति के दिवंगत हो जाने पर उस व्यक्ति के कथन की पुष्टि एवं प्रामाणिकता के लिए साक्ष्य की कोई भूमिका नहीं रहती। श्रावितश्चातुरेणापि यस्त्वर्थो धर्मसंहितः। मृतेऽपि तत्र साक्ष्यं स्यात् षट्सु चान्वाहितादिषु ॥ 96 ॥ यदि मृत्युशय्या पर पड़े रोगी ने अपने पुत्र व पत्नी आदि की अनुपस्थिति में भी धन के लेन-देन के सम्बद्ध में कुछ कह दिया है, तो उसे धर्म-सम्मत मानना चाहिए; क्योंकि मरणासन्न व्यक्ति के मुख से कभी मिथ्या वचन नहीं निकलता। सम्बद्ध व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त उसका वक्तव्य अन्तिम प्रमाण होता है। इस तथ्य का छह स्थानों पर परीक्षण किया जाता है। अभिप्राय यह है कि साक्षियों से छह ढंग से घुमा-फिरा कर, प्रश्नों की झड़ी लगाकर पूछना चाहिए और इस तथ्य को सुनिश्चित करना चाहिए कि साक्षी मृत व्यक्ति के कथन को यथावत् उद्धृत कर रहे हैं, अपनी ओर से कुछ मिलावट नहीं कर रहे हैं। नारदस्मृति / 89

यदृणादिषु सर्वेषु बलवत्युत्तरा क्रिया। प्रतिग्रहाधिक्रीतेषु पूर्वा पूर्वा बलीयसी ॥ 97 ॥ ऋण के लेन देन से जुड़े सभी विषयों में परवर्ती (आगे से आगे की) स्थिति प्रमाण स्वरूप होती है। दान (उपहार, पुरस्कार) तथा बन्धक आदि से जुड़े विषयों में किये गये अनुबन्धों में पूर्व-पूर्व की प्रामाणिकता अधिक है। अभिप्राय यह है कि ऋण के लेन-देन में कब कितना लिया-दिया, कब चुकाया और कब कितना बक़ाया छोड़ा—इस मामले में उत्तरोत्तर स्थिति ही मान्य होती है। इसके विपरीत दान, भेंट आदि के मामले में जो पूर्वस्थिति है, वही मान्य होती है, उसमें किये गये परिवर्तन-परिवर्द्धन को विधिसम्मत मान्यता प्राप्त नहीं है। स्थानलाभनिमित्तं हि दानग्रहणमिष्यते। तत्कुसीदमिति प्रोक्तं तेन वृत्तिः कुसीदिनाम् ॥ 98 ॥ लाभ-अर्जन के लिए ऋण-रूप में दिये मूलधन में जुड़ी ब्याज की राशि— बढ़े हुए धन की वसूली के लिए किये गये प्रयास, धन के आदान-प्रदान का नाम कुसीद है। दूसरे शब्दों में जब यह कहा जाये कि मूलधन तो आता रहेगा, कोई बात नहीं, पर ब्याज की राशि का भुगतान तो त्वरित ही हो जाना चाहिए, तो धन के इस अंश का लेन-देन ही साहूकारा है और साहूकारों की तो यह वृत्ति है, अर्थात् इसमें किसी प्रकार का कोई पाप, दोष अथवा अनौचित्य नहीं है। ऋणदाताओं की तो आजीविका ही इस प्रकार चलती है। वसिष्ठविहितां वृद्धिं सृजेद् वृत्तिविवर्धनीम्। अशीतिभागं गृह्णीयाच्छते मासस्य बार्धुषी ॥ 99 ॥ महर्षि वसिष्ठ के अनुसार साहूकार ब्याज पर दिये धन पर 80-125 पैसे तक प्रतिशत प्रतिमास ब्याज वसूल कर सकता है। ब्याज की इस दर को न्यायसंगत ही मानना चाहिए। वस्तुतः मूलधन पर ब्याज की वसूली करना तो साहूकार की आजीविका का साधन होने से धर्मसम्मत ही कहलाता है। साहूकार द्वारा मूलधन देकर ब्याज कमाना तो उसका व्यवसाय-धन्धा है। द्विकं त्रिकं चतुष्कं च पञ्चकं च समं स्मृतम्। मासस्य वृद्धिं गृह्णीयाद् वर्णानामनुपूर्वशः ॥ 100 ॥ ऋणदाता साहूकार को ऋणकर्ता के वर्ण के अनुसार भिन्न-भिन्न दरों पर उससे अपने मूलधन पर ब्याज वसूल करने का अधिकार है। उदाहरणार्थ, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र से क्रमशः दो, तीन, चार और पांच प्रतिशत ब्याज लेना सर्वथा उचित एवं धर्मसंगत है। 90 / नारदस्मृति

द्विकं शतं वा गृह्णीत सतां वृत्तमनुस्मरन्। द्विकं शतं हि गृह्णानो न भवत्यर्थकिल्विषी ॥ 101 ॥ वर्ण-भेद का विचार किये बिना सभी जाति और वर्ण के ऋणकर्ताओं में एक समान दो रुपया प्रतिशत प्रति माह ब्याज वसूल करना तो ऋणदाता की सज्जनता का ही परिचायक है, अर्थात् यह दर साहूकार के उदार, मानवतावादी एवं धर्मभीरु दृष्टिकोण को सिद्ध करती है। दो रुपये प्रतिशत ब्याज लेने वाले साहूकार को अर्थकिल्विषी-पाप से धन कमाने वाला-कभी नहीं माना जा सकता। टिप्पणी-लगता है कि प्राचीनकाल में आर्थिक शोषण को धर्म द्वारा मान्यता प्राप्त थी, अन्यथा पांच प्रतिशत अथवा दो प्रतिशत ब्याज की वसूली को उदारता का प्रतीक कदापि न कहा जाता। कालिका कारिता चैवं कायिका च तथा परा। चक्रवृद्धिश्च शास्त्रेऽस्मिन् वृद्धिर्दृष्टा चतुर्विधा ॥ 102 ॥ शास्त्रों में मूलधन पर लाभ के रूप में वसूल किये जाने वाले ब्याज के चार रूप-भेदों का उल्लेख हुआ है-कालिका, कारिता, कायिका और चक्रवृद्धि। प्रतिमासं स्रवन्ती या वृद्धिः सा कालिका स्मृता। वृद्धिः सा कारिता नाम यर्णिकेन स्वयं कृता ॥ 103 ॥ प्रतिमाह चुकता किये जाने वाला ब्याज कालिका कहलाता है। ऋणी द्वारा अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिमाह अथवा दूसरे-तीसरे माह वृद्धि समेत, अर्थात् जिस माह नहीं चुकाया, उस माह की ऋण-राशि पर बनने वाले ब्याज के सहित अथवा बग़ैर यथानिर्धारित दूसरे-तीसरे माह चुकाया जाने वाला ब्याज कारिता कहलाता है। कायाविरोधिनी शश्वत्पणपादादि कायिका। वृद्धेरपि पुनर्वृद्धिश्चक्रवृद्धिरुदाहृता ॥ 104 ॥ मूलधन के साथ ब्याज को जोड़कर किश्तों में उसका भुगतान कायिका तथा मूलधन के साथ एक-मुश्त चुकाये जाने वाले ब्याज पर ब्याज की वसूली चक्रवृद्धि कहलाती है। अर्थानां सार्वभौमोऽयं विधिर्वृद्धिकरः स्मृतः। या देशावस्थितिस्त्वन्या यत्रर्णमवतिष्ठते ॥ 105 ॥ ब्याज की वसूली के रूप में ऋण-राशि पर होने वाली इन चार रूपों वाली परम्परा को एक सामान्य परम्परा ही समझना चाहिए। वैसे तो यह एक सार्वदेशिक- पूरे देश के सभी भागों में-रूप से मान्य एवं प्रचलित पद्धति है, फिर भी लेन देन करने वालों की इच्छा, आवश्यकता, स्थान-विशेष पर और समय विशेष में प्रचलन आदि के अनुसार ऋण व्यवस्था-ब्याज की दर में घटा बढ़ी या मूलधन लौटाने की रीति आदि-में यथोचित एवं यथावश्यक परिवर्तन किया जा सकता है। नारदस्मृति / 91

द्विगुणं त्रिगुणं वापि तथान्यत्र चतुर्गुणम्। तथाष्टगुणमन्यस्मिन् देयं देशेऽवतिष्ठते॥ 106 ॥ किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र में ऋण-राशि में दो प्रतिशत, कहीं तीन प्रतिशत, कहीं चार प्रतिशत, तो कहीं किसी अन्य क्षेत्र में आठ प्रतिशत ब्याज के लेन देन का प्रचलन है। जहां जैसी व्यवस्था हो तथा जहां जैसा लेन देन करने वालों को मान्य हो, वहां वैसा व्यवहार करना उचित है। हिरण्यधान्यवस्त्राणां वृद्धिर्द्विस्त्रिश्चतुर्गुणा। रसस्याष्टगुणा वृद्धिः स्त्रीपशूनां च सन्ततिः॥ 107 ॥ स्वर्ण, धान्य और वस्त्रों को गिरवी रखकर दिये जाने वाली ऋण राशि पर क्रमशः दो, तीन और चार प्रतिशत ब्याज वसूल करना चाहिए। इसी प्रकार दूध, दही आदि को गिरवी रखने पर आठ प्रतिशत ब्याज लेना उचित है। स्त्रियों और पशुओं को गिरवी रखकर लिये ऋण पर कोई ब्याज नहीं वसूल किया जाता। उनकी सन्तति पर ऋणदाता का अधिकार होता है। इसका अर्थ यह है कि ऋणदाता बन्धक रूप में रखी स्त्री को भोगने और पशु से काम लेने को स्वतन्त्र है। न वृद्धिः प्रीतिदत्तानां स्यादनाकारिता क्वचित्। अनाकारितमप्यूर्ध्वं वत्सराधार्द्धात्प्रवर्धते॥ 108 ॥ प्रेम-वश उपहार अथवा दान-रूप में दिये गये धन—नक़द रुपया, स्वर्ण- रजत, स्त्री, पशु आदि—पर किसी प्रकार का न तो कोई ब्याज वसूल किया जाता है और न ही दिया धन लौटाया जाता है। हां, यदि किसी निश्चित अवधि के लिए बिना ब्याज के लिया धन उस अवधि के बीतने पर नहीं लौटाया जाता, तो ऋणकर्ता को अवधि के बाद के समय पर अपने ऋण पर ब्याज लेने का पूरा अधिकार होता है। भले ही ऐसा लिखित अनुबन्ध किया गया हो अथवा न किया गया हो, निर्धारित अवधि के उपरान्त ब्याज देय होता है। प्रीतिदत्तं तु यत् किञ्चिन्न तद्वर्धेतयाचितम्। याच्यमानमदत्तं चेद् वर्धते पञ्चकं शतम्॥ 109 ॥ किसी आत्मीय बन्धु को प्रेम-सम्बन्ध से, बिना अवधि निर्धारित किये, दिये गये ऋण पर जब तक वापसी की मांग नहीं की जाती, तब तक उस राशि पर कोई ब्याज देय नहीं होता। हां, मांग करने पर और वापसी के लिए समय देने पर निर्धारित समय पर ऋण न लौटाये जाने पर परवर्ती अवधि के लिए पांच प्रतिशत की दर से ब्याज देय होता है। एष वृद्धिविधिः प्रोक्तः प्रीतिदत्तस्य कर्मणः। वृद्धिस्तु योक्ता धान्यस्य बार्धुषं तदुदाहृतम्॥ 110 ॥ 92 / नारदस्मृति

प्रीतिपूर्वक दिये गये ऋण पर ब्याज लेने की उपर्युक्त व्यवस्था के अतिरिक्त कायिका, कारिका आदि चार अन्य प्रथाएं भी हैं, जिनका उपयोग किया जा सकता है। ब्याज के रूप में नक़द धनराशि न लेकर उसके बदले धान्य के लेने को 'वार्धुष' नाम दिया जाता है। आपदं निस्तरेद् वैश्यः कामं बार्धुषिकर्मणा। आपत्स्वपि हि कष्टासु ब्राह्मणस्य न बार्धुषम्॥111॥ ब्याज के रूप में नक़द धन अथवा स्वर्ण आदि के बदले अनाज देने में वैश्य को सुविधा होती है। वह नक़द धन के जुगाड़ के पचड़े में नहीं पड़ता और इससे उसका सामान बचा रहता है। इस प्रकार वह अपने अभाव की पूर्ति कर अपना उद्धार कर लेता है, परन्तु ब्राह्मण को दुर्गतिग्रस्त होने पर भी कभी नक़द ब्याज पर अथवा अनाज देकर ऋण नहीं लेना चाहिए; क्योंकि इससे उसका विप्रत्व आहत होता है। ब्राह्मणस्य तु यद्देयं सान्वयस्य न चास्ति सः। निक्षिपेत्तत्स्वकुल्येषु तदभावेऽस्य बन्धुषु॥112॥ ब्राह्मण को सम्पत्ति-सञ्चय का न तो अधिकार है और न ही उसे पैतृक सम्पत्ति के रूप में वंश परम्परा से उत्तराधिकार में कुछ प्राप्त होता है और न ही वह अपने लिए व पुत्र-पौत्रादि के लिए कुछ छोड़ता है। अतः ब्राह्मण के लिए कुछ गिरवी रखकर ऋण लेना तथा उस पर ब्याज चुकाना सम्भव न होने से वर्जित है। संकटकाल आने पर ब्राह्मण को अपने को ही वस्तु के रूप में अपने रक्त- सम्बन्धियों के पास और उनके अभाव में जाति-बन्धुओं के पास बन्धक रख देना चाहिए। तदा तु न सकुल्याः स्युर्न च सम्बन्धिबान्धवाः। तदा दद्याद् द्विजातिभ्यस्तेष्वसत्स्वप्सु निक्षिपेत्॥113॥ यदि ब्राह्मण ने अपने को बन्धक बनाकर किसी से कुछ ऋण लिया है और संयोगवश ऋणकर्ता नहीं रहा तथा उसके कुल में भी कोई नहीं बचा, अथवा वंशज लेने से इनकार करते हैं, तो ब्राह्मण को ऋणदाता के जाति-बन्धुओं को ऋण-राशि लौटानी चाहिए। उनके भी अभाव अथवा इनकार करने पर ऋण-राशि ब्राह्मणों को दे देनी चाहिए, ब्राह्मण द्वारा भी लेना न स्वीकार करने पर जल में फेंक देनी चाहिए। अभिप्राय यह है कि सामर्थ्य आ जाने पर ब्राह्मण को अपने ऋण का शोधन अवश्य करना चाहिए। ऋणदाता अथवा उसके वंशजों के न रहने पर अथवा उनके द्वारा अस्वीकार करने का बहाना कदापि नहीं बनाना चाहिए। गृहीत्वोपगतं दद्यादृणिकायोदयं धनी। अदद्याद्याच्यमानस्तु शेषहानिमवाप्नुयात्॥114॥ नारदस्मृति / 93

धनिक से ऋण लेने पर ऋणकर्ता को ऋणदाता के धन की वृद्धि के बदले (यदि वह ऋण में दी गयी धन राशि को व्यापार में लगाता, तो कुछ लाभ अर्जित करता—यह सोचकर) ब्याज अवश्य चुकाना चाहिए। मूलधन और ब्याज की मांग किये जाने पर भुगतान न करने वाला व्यक्ति अपनी विश्वसनीयता ही खो बैठता है। बाज़ार में उसके सम्मान की हानि होती है और उसके नाम को बट्टा लगता है। यदि नो लेखयेद्दत्ततृणिनां चोदितोऽपि सन्। ऋणिकस्यापि वर्धेत तथैव धनिकस्य वत्॥ 115 ॥ यदि ऋणकर्ता द्वारा ऋण चुकाने को उद्यत होने पर और बार बार अनुरोध करने पर भी ऋणदाता अपनी ऋण राशि को लेने से इनकार करता है, टालमटोल करता है अथवा किसी प्रकार की बहानेबाज़ी करता है, तो जिस प्रकार ऋण लेने वाला ऋण राशि पर ब्याज चुकाता है, उसी प्रकार ऋण देने वाले को भी उस अवधि के लिए उस राशि पर ब्याज चुकाना होता है। अभिप्राय यह है कि अपनी ही धन-राशि पर ऋणदाता को ब्याज तो नहीं मिलता, उलटे उसे ही ऋण लेने वाले को ब्याज चुकाना होता है। इस दुगुने दण्ड के विधान का स्पष्ट प्रयोजन ऋण लौटाने वाले को सम्भावित परेशानी से बचाना है। लेख्यं दद्याद्विशुद्धर्णे तदभावे प्रतिश्रवम्। धनिकर्णिकयोरेवं विशुद्धिः स्यात् परस्परम्॥ 116 ॥ अपनी ऋण-राशि को प्राप्त कर लेने पर ऋणदाता को ऋणकर्ता द्वारा लिखा प्रतिज्ञा-पत्र लौटा देना चाहिए। यदि प्रतिज्ञा-पत्र खो गया है अथवा नष्ट हो गया है अथवा कहीं रखा गया है और मिल नहीं रहा है, तो ऋणदाता को अपनी ओर से ऋण-राशि की प्राप्ति का तथा ऋणकर्ता द्वारा लिखे प्रतिज्ञा-पत्र के निरस्त होने का लिखित प्रतिज्ञा-पत्र देना चाहिए। यह दोनों का आपसी मामला है और दोनों के विश्वास का एक-दूसरे के प्रति बना रहना तथा एक दूसरे से पूर्ण सन्तुष्ट होना परमावश्यक है। विश्रम्भहेतू द्वावत्र प्रतिभूराधिरेव च। लिखितं साक्षिणश्च द्वे प्रमाणे व्यक्तिकारके॥ 117 ॥ ऋण के लेन-देन के सम्बन्ध में विश्वास के दो ही आधार हैं- 1. बन्धक रखी गयी वस्तु तथा 2. वापसी का दायित्व लेने वाला व्यक्ति, अर्थात् ऋणकर्ता द्वारा समय पर ऋण का भुगतान न किये जाने पर उसे विवश करने का तथा उसके असमर्थ होने पर उसकी ओर से स्वयं भुगतान करने का वचन देने वाला। इसी प्रकार लेन-देन की सत्यता की पुष्टि करने वाले प्रमाण के दो रूप हैं-

  1. लिखित दस्तावेज़ तथा 2. वह व्यक्ति, जिसकी उपस्थिति एवं जानकारी में लेन-देन किया गया हो। 94 / नारदस्मृति

उपस्थानाय दानाय प्रत्ययाय तथैव च। त्रिविधः प्रतिभूर्दृष्टस्त्रिष्वेवार्थेषु सूरिभिः ॥ 118 ॥ विधिवेत्ता अर्थशास्त्रियों के अनुसार ऋण पर धन-राशि के लेन-देन के सम्बन्ध में तीन ही प्रतिभू (ज़ामिन) हो सकते हैं— 1. स्वयं ऋणकर्ता व्यक्ति की विश्वसनीयता होना, 2. ऋणकर्ता व्यक्ति का कोई समर्थ एवं सम्मानित मित्र अथवा सम्बन्धी—ऋणी के ऋण न लौटाने पर उसके स्थान पर स्वयं उसके ऋण को चुकाने के लिए वचनबद्ध तथा 3. बन्धक रखी वस्तु। ऋणिष्वप्रतिकुर्वत्सु प्रत्यये वापि हापिते। प्रतिभूस्तदृणं दद्यादनुपस्थापयंस्तथा ॥ 119 ॥ कुछ बन्धक न रखकर ऋणी के समर्थ सम्मानित मित्र अथवा सम्बन्धी द्वारा भुगतान के दायित्व के आश्वासन पर दिये गये ऋण का ऋणी द्वारा भुगतान न किये जाने पर प्रतिभू को ऋणदाता के मूलधन और ब्याज का भुगतान करना ही होता है। वह ऐसा करने को बाध्य होता है। अतः उसे प्रतिभू बनने से पूर्व इस वास्तविकता को भली प्रकार समझ लेना चाहिए। बहवश्चेत् प्रतिभुवो दद्युस्तेऽर्थं यथाकृतम्। अर्थे विशेषिते ह्येषु धनिनश्छन्दतः क्रिया ॥ 120 ॥ यदि ऋणकर्ता को ऋण दिलाते समय उसकी वापसी का दायित्व लेने वाले एक से अधिक प्रतिभू हों, तो ऋणकर्ता द्वारा ऋण न लौटाने की स्थिति में उन सब को बराबर-बराबर अपने भाग की ऋण-राशि का भुगतान करना चाहिए अथवा यदि उन्होंने पहले कुछ न्यूनाधिक भाग अथवा प्रतिशत का समझौता कर रखा है, तो उसके अनुसार भुगतान करना चाहिए। यमर्थं प्रतिभूर्दद्याद्धनिकेनोपपीडितः। ऋणिकस्तं प्रतिभुवे द्विगुणं प्रतिदापयेत् ॥ 121 ॥ यदि धनी व्यक्ति किसी की आवश्यकता की पूर्ति के लिए स्वयं दुखी होकर अपनी किसी आवश्यकता—लड़के की पढ़ाई, लड़की का विवाह, सम्पत्ति का क्रय, पत्नी के लिए आभूषण बनवाना आदि—को काटकर ऋणकर्ता के लिए ऋण की व्यवस्था करता है, तो ऋणकर्ता को धनी से लिये ऋण का दुगुना करके उसे लौटाना चाहिए। धर्मेण व्यवहारेण छलेनाचरितेन च। प्रयुक्तं साधयेदर्थं पञ्चकेन बलेन च ॥ 122 ॥ यदि ऋणकर्ता ऋण लेने के उपरान्त लौटाने का नाम नहीं लेता, बेईमान हो जाता है या धूर्तता पर उतर जाता है, तो ऋणदाता धनी को निम्नोक्त चार उपाय करने चाहिए— नारदस्मृति / 95

  1. ऋणकर्ता को धर्म का भय दिखाना चाहिए, बेईमानी के दुष्परिणाम- विनाश, नरक-प्राप्ति तथा लोकनिन्दा-आदि से परिचित कराना चाहिए।
  2. व्यवहार दिखाना चाहिए, अर्थात् न्यायालय में मुक़द्दमा चलाने की धमकी देनी चाहिए। उसे समझाना चाहिए कि इससे उसकी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जायेगी।
  3. छल-प्रयोग-उसकी पत्नी, पुत्र को बहाने से बुलाकर बन्धक बना लेना, उसकी सम्पत्ति को अपनी बताकर बेच देना, उसके किसी व्यापार धन्धे के लाभांश पर अधिकार कर लेना, अथवा उसके किसी सम्बन्धी को देय धन रोक लेना आदि-का आश्रय लेना चाहिए।
  4. बल प्रयोग-मार पीट करना, उसकी पत्नी को छीन लेना, अपमानित करना तथा उसे बन्दी बना लेना आदि-करना चाहिए। इन चारों में क्रमशः पूर्व-पूर्व का, अर्थात् प्रथम धर्म-भय का उपयोग करना चाहिए, उससे काम न चलने पर व्यवहार का, पुनः छल का और अन्त में बल का प्रयोग करना चाहिए। यः स्वकं साधयेदर्थमुत्तमर्णोऽधमर्णकात्। न स राज्ञा निषेधव्य ऐहिकामुष्मिकार्थतः॥ 123 ॥ उत्तमर्ण द्वारा अधमर्ण से अपने ऋण की साम-दान आदि उपायों से वसूली करना अधमर्ण के ही हित में है। इससे अधमर्ण को इस लोक में शान्ति और परलोक में सद्गति मिलती है। अतः राजा अथवा राज्य प्रशासन को उत्तमर्ण धनी का पक्षधर एवं सहायक बनना चाहिए, उसके द्वारा वसूली के लिए किसी भी प्रयास में प्रशासन को आड़े नहीं आना चाहिए। अधिक्रियत इत्याधिः स विज्ञेयो द्विलक्षणः। कृतकालोपनेयश्च यावद्देयोयतस्तथा॥ 124 ॥ किसी चल-अचल सम्पत्ति-भवन, खेत, भू खण्ड अथवा दुकान अथवा स्वभूमि अथवा बाण्ड, शेयर प्रमाण-पत्र आदि-को गिरवी रखकर लिया गया ऋण आधि कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है - निर्धारित अवधि में लौटाया जाने वाला तथा इच्छानुसार-अनिश्चित काल में-लौटाया जाने वाला। निर्धारित अवधि में लौटाये जाने वाले ऋण के निर्दिष्ट काल में ही लौटाये जाने पर ऋणी ऋणमुक्त होता है और अनिर्दिष्ट काल वाले ऋण को जब ऋणी लौटाता है, तब वह ऋणमुक्त होता है। दोनों अवस्थाओं में ऋण की वापसी पाने पर ही ऋणदाता को ऋणी को ऋण-पत्र लौटाना चाहिए। स पुनर्द्विविधः प्रोक्तो गोप्यो भोग्यस्तथैव च। उपचारस्तथैवास्य लाभहानिर्विपर्यये ॥ 125 ॥ 96 / नारदस्मृति

किसी वस्तु को बन्धक रखकर आधि—लिये गये ऋण—के उपयोग की दृष्टि से दो प्रकार हैं—गोप्य, अर्थात् गुप्तरूप से रखे जाने वाले स्वर्णाभूषणों के क्रय आदि में निवेश तथा भोग्य—उपभोग में आने वाले भवन, क्षेत्र आदि के क्रय में निवेश। यदि गोप्य का उपभोग किया जाता है, अर्थात् स्वर्णाभूषणों को अवसर विशेष के स्थान पर सामान्य रूप से धारण किया जाता है और इधर भवन-क्षेत्र आदि भोग्य सम्पत्ति का उपभोग न करके उसे छिपाकर रखा जाता है, अर्थात् क्षेत्र को जोता-बोया नहीं जाता, तो ऋणकर्ता को लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। वह ऋण की मूलराशि को भी गंवाने की स्थिति में आ जाता है। अभिप्राय यह है कि यदि ऋण लेकर स्वर्णाभूषण आदि ख़रीदे जाते हैं, तो उन्हें सुरक्षित (गुप्त) रखना चाहिए और यदि भवन, क्षेत्र अथवा दुकान आदि की ख़रीद की जाती है, तो उनका यथोचित उपभोग करना चाहिए। इसी में ऋण लेने की सार्थकता है। प्रमादाद्धनिनस्तद्वदाधौ विकृतिमागते। विनष्टे मूलनाशः स्याद्दैवराजकृतादृते ॥ 126 ॥ ऋणदाता धनिक के पास बन्धक रखी वस्तु के चोरी हो जाने पर, घर के आग लगने से भस्म हो जाने पर, जर्जर हो जाने पर तथा राज्य-प्रशासन द्वारा अपने अधिकार में कर लिये जाने पर ऋणकर्ता को ऋण (मूलधन) तो देय ही होता है; क्योंकि बन्धक वस्तु के विनाश में उसका कोई हाथ नहीं होता। हां, ऋणदाता धनिक के प्रमाद से बन्धक वस्तु में विकार आ जाने पर अथवा नष्ट हो जाने पर, उसे अपने मूलधन को वसूल करने का कोई अधिकार नहीं रहता। उस स्थिति में वह अपने ऋणी के प्रति उत्तरदायी होता है। न भोक्तव्यो बलादाधिर्भुञ्जानो वृद्धिमुत्सृजेत्। मूल्येन तोषयेच्चैनमाधिस्तेनोऽन्यथा भवेत् ॥ 127 ॥ ऋणदाता को बन्धक रखी वस्तु का ऋणकर्ता की अनुमति के बिना स्वेच्छा से अपने प्रयोग में लाने का कोई अधिकार नहीं। यदि बलपूर्वक अथवा छिपाकर उपयोग किया जाता है, तो ऋणदाता को अपने ऋण पर ब्याज लेने का अधिकार समाप्त हो जाता है। ऋणदाता धनिक को ऋणकर्ता के समक्ष सारी स्थिति स्पष्ट करनी—अर्थात् बिना अनुमति के उपयोग करने की क्या आवश्यकता पड़ गयी अथवा अनुमति की आवश्यकता नहीं समझी गयी आदि—पड़ती है। प्रत्येक स्थिति में वस्तु के स्वामी को सन्तुष्ट करना ऋणदाता का कर्तव्य-कर्म है, अन्यथा वह 'आधिस्तेन' कहलाता है और चोर के लिए निर्धारित दण्ड का पात्र बनता है। नारदस्मृति / 97

यः स्वामिनाभ्यनुज्ञातमाधिं भुङ्क्तेऽविचक्षणः। तेनार्धवृद्धिर्भोक्तव्या तस्य भोगस्य निष्क्रयः ॥ 128 ॥ सम्पत्ति को गिरवी रखकर ऋण लेने वाले की अनुमति के बिना उसकी सम्पत्ति का चोरी से उपभोग करने वाला ऋणदाता धनिक अपनी ऋण राशि पर ब्याज के अधिकार को खो बैठता है। ब्याज की आधी राशि तो उपभोग की जाने वाली सम्पत्ति की टूट फूट की मरम्मत पर ख़र्च की जानी चाहिए और आधी राशि ऋणी को मिलनी चाहिए, ताकि उसे कुछ तो राहत मिले। न त्वेवाधो सोपकारे कौसीदीं वृद्धिमाप्नुयात्। न चाधेः कालसंरोधान्निंसर्गोऽस्ति न विक्रयः ॥ 129 ॥ उपभोग के लिए अनुमत बन्धक सम्पत्ति पर दिये ऋण पर ब्याज नहीं लेना चाहिए, यहां सम्पत्ति का उपभोग ही ब्याज है, उपभोग में आ रही बन्धक की गयी सम्पत्ति को न तो ऋणदाता धनिक बेच सकता है और न ही ऋणकर्ता निर्धारित अवधि से पूर्व वापसी की मांग कर सकता है। रक्ष्यमाणोऽपि यत्राधिः कालेनेयादसारताम्। तत्राधिरन्यः कर्तव्यो देयं वा धनिने धनम् ॥ 130 ॥ ऋणकर्ता धनिक द्वारा बन्धक सम्पत्ति-गाय, भैंस, स्त्री, भवन आदि-की यत्नपूर्वक एवं पूरी ईमानदारी से रक्षा किये जाने पर भी उसके नष्ट हो जाने पर ऋणकर्ता को या तो उत्तमर्ण से ऋण में लिया धन उसे लौटा देना चाहिए या फिर अपनी कोई दूसरी सम्पत्ति गिरवी रखनी चाहिए; क्योंकि ऐसे मामलों में ऋणदाता पूर्णतः निर्दोष होता है। अत्र शक्तिविहीनः स्यादृणी कालविपर्ययात्। शक्त्यपेक्षम्ऋणं दाप्यं काले काले यथोदयम् ॥ 131 ॥ बुरा समय आने से अथवा दुर्भाग्यवश ऋणी के एक साथ (एक मुश्त) पूरी ऋण-राशि चुकाने में असमर्थ होने पर उत्तमर्ण को अधमर्ण द्वारा अपनी सुविधा से दी गयी राशि को स्वीकार करते हुए, उसकी सम्पत्ति उसे लौटा देनी चाहिए और उसे ऋणमुक्त कर देना चाहिए। अभिप्राय यह है कि उत्तमर्ण को अधमर्ण के प्रति कठोर एवं अनुदार नहीं होना चाहिए। पूरी ऋण-राशि एक साथ लेने का दुराग्रह नहीं करना चाहिए, अपितु उसकी परिस्थिति को देखते हुए उसे थोड़ी-बहुत छूट अवश्य देनी चाहिए। ऋणिकः सधनो यस्तु दौरात्म्यान्न प्रयच्छति। राज्ञा दापयितव्यः स्याद् गृहीत्वा पञ्चकं शतम् ॥ 132 ॥ यदि ऋणी साधन-सम्पन्न हो जाने पर भी अपनी धूर्ततावश अथवा किसी अन्य कारण से उत्तमर्ण से लिये ऋण को नहीं लौटाता है, झूठे आश्वासन देकर उसे टरकाता और परेशान करता है, तो इस स्थिति में राजा (प्रशासन) को ऋणी से 98 / नारदस्मृति

ऋणराशि का पांच प्रतिशत दण्ड वसूल करना चाहिए तथा उससे उत्तमर्ण को मूलधन और ब्याज का भुगतान कराना चाहिए। स्ववाक् सम्प्रतिपत्तौ तु ऋणिकं दशकं शतम्। विनयं दापयेद्राजा द्विगुणं तु पराजितम्॥ 133॥ यदि ऋणी के समर्थ होने पर, ऋण लौटाने को प्रस्तुत न होने पर व उत्तमर्ण द्वारा राजा (प्रशासन) से न्याय की गुहार किये जाने पर अधमर्ण ऋण लेना और लौटाना स्वीकार कर लेता है, तो उससे ऋण-राशि का दस प्रतिशत दण्ड वसूल करके उत्तमर्ण को उसका मूलधन और ब्याज दिलाना चाहिए। ऋणकर्ता के ऋण लेने को नकारने पर और प्रमाण आदि साक्ष्य से विवाद में झूठा सिद्ध हो जाने पर पराजित ऋणी से बीस प्रतिशत दण्ड वसूल करना चाहिए और उत्तमर्ण को उसका मूलधन और ब्याज दिलाना चाहिए। न स्याद् द्रव्यपरीमाणं कालेनेहार्णिकस्य चेत्। जातिसंज्ञाधिवासानामागमो लेख्यतः स्मृतः॥ 134॥ यदि पराजित ऋणकर्ता ऋण को चुकाने में समर्थ नहीं है, उसके पास चल- अचल सम्पत्ति नहीं है, तो न्यायाधिकरण को उसका पूरा निवास-स्थल, जाति, नाम तथा गोत्र आदि के उल्लेख के साथ शपथ-पत्र लिखा लेना चाहिए कि वह अथवा उसके वंशज ऋणदाता को अथवा उसके वंशजों को सामर्थ्य आते ही ब्याज सहित ऋण-राशि चुकता करने को वचनबद्ध हैं-यह न्यायाधिकरण की व्यवस्था है। लेख्यं तु द्विविधं ज्ञेयं स्वहस्तान्यकृतं तथा। असाक्षिमत्साक्षिमच्च सिद्धिर्देशस्थितेस्तयोः ॥ 135॥ सामर्थ्य आने पर उत्तमर्ण को ऋण लौटाने के शपथ-पत्र के दो रूप हैं-

  1. अधमर्ण द्वारा स्वयं अपने हाथ से लिखा और हस्ताक्षरित तथा 2. दूसरे व्यक्ति द्वारा लिखा गया और अधमर्ण द्वारा हस्ताक्षरित। देश और स्थिति के आधार पर इन दोनों के पुनः दो रूप हैं- 1. साक्षी द्वारा सत्यापित तथा 2. साक्ष्य-रहित। उल्लेखनीय यह है कि दोनों-उत्तमर्ण तथा अधमर्ण-की सन्तुष्टि और विश्वास-भावना को ध्यान में रखते हुए, दोनों को एक-समान मान्य शपथ-पत्र ही अपनाना चाहिए। यही उचित एवं न्याय-संगत है। यदि दोनों साक्ष्य की आवश्यकता नहीं समझते, एक दूसरे के प्रति विश्वास का भाव रखते हैं, तो ठीक है, परन्तु यदि एक भी पक्ष साक्ष्य की आवश्यकता समझता है, तो साक्ष्य का होना आवश्यक हो जाता है। देशाचाराविरुद्धं यद् व्यक्तावधिविलक्षणम्। तत्प्रमाणे स्मृतं लेख्यमविप्लुतक्रमाक्षरम् ॥ 136 ॥ निम्नोक्त गुणों वाला दस्तावेज़ वैध एवं प्रमाणित माना जाता है-जो साफ़ नारदस्मृति / 99

सुथरी एवं सीधी-सादी भाषा में लिखा गया हो, 2. जिसमें दो-दो अर्थ देने वाले शब्दों का प्रयोग न किया गया हो, 3. जिसमें उलटा-पुलटा, घुमा-फिराकर कुछ न कहा गया हो, 4. जिसमें प्रत्येक तथ्य को उसके महत्त्व के अनुरूप क्रम से उद्धृत किया गया हो, 5. जिसमें देशाचार का अतिक्रमण न किया गया हो तथा 6. बन्धक सम्बन्धी नियमों, लेन-देन की शर्तों, अवधि, ब्याज की दर आदि का यथावत् स्पष्ट उल्लेख किया गया हो। मत्ताभियुक्तस्त्रीबालबलात्कारकृतं च यत्। तदप्रमाणं लिखितं भीतोपधिकृतं तथा॥ 137॥ निम्नोक्त व्यक्तियों द्वारा लिखे गये दस्तावेज़ को वैध नहीं माना जाता, अर्थात् उसके आधार पर किये लेन देन को वैधानिक मान्यता कदापि नहीं मिलती।

  1. मत्त—मदिरा आदि मादक द्रव्यों के प्रभाव के अन्तर्गत अर्ध-मूर्च्छित अथवा नष्ट विवेकशक्ति वाला व्यक्ति।
  2. अभियुक्त—पहले से ही अभियोग में फंसा व्यक्ति। ऐसा व्यक्ति विवश एवं किंकर्तव्यविमूढ़ होता है।
  3. स्त्री—शिक्षा तथा अनुभव के अभाव के कारण।
  4. बालक—स्त्रियां तथा बालक उचित-अनुचित अथवा सही ग़लत के निर्णय में समर्थ नहीं होते।
  5. लोभ, भय, छल तथा बल—डरा धमकाकर, मार-पीटकर, लालच देकर अथवा कपट (धोखे) से कराये गये अनुबन्ध विवशता का परिणाम होते हैं। मृताः स्युः साक्षिणो यत्र धनिकर्णिकलेखकाः। तदप्यपार्थं लिखितं न चेदाधिः स्थिराश्रयः ॥ 138 ॥ यदि कोई वस्तु बन्धक नहीं रखी गयी, केवल विश्वास के आधार पर लेन- देन किया गया है और इस लेन-देन को लिखित रूप भी दे दिया गया है, परन्तु ऋण का शोधन करने से पूर्व ऋणदाता की, ऋणकर्ता की और साक्षी या साक्षियों की मृत्यु हो जाती है, तो लिखित प्रमाण स्वतः निरस्त हो जाता है, अर्थात् उसके आधार पर ऋणदाता के वंशज ऋणकर्ता के वंशजों से पूर्वजों द्वारा दिये-लिये ऋण को लौटाने की मांग नहीं कर सकते। आधिस्तु द्विविधः प्रोक्तो जङ्गमः स्थावरस्तथा। सिद्धिरत्रोभयस्यास्य भोगो यत्रास्ति नान्यथा ॥ 139 ॥ बन्धक रखी जाने वाली सम्पत्ति दो प्रकार की होती है—
  6. अचल सम्पत्ति—भवन, धरती आदि तथा 2. चल सम्पत्ति—स्वर्णाभूषण, पशु, स्त्री, धान्य तथा शस्त्रास्त्र आदि। वस्तुतः बन्धक सम्पत्ति वही मानी जाती है, जब उसका उपभोग वस्तु के वास्तविक स्वामी के बदले ऋणदाता करता है। 100 / नारदस्मृति

बन्धक रखी गयी जिस सम्पत्ति का उपभोग ऋणदाता नहीं कर सकता, ऐसी वस्तु को बन्धक रखने की कोई सार्थकता ही नहीं है। दर्शितं प्रतिकालं यत् प्रार्थितं श्रावितं तथा। लेख्यं सिद्ध्यति सर्वत्र मृतेष्वपि हि साक्षिषु ॥ 140 ॥ यदि समय-समय पर ऋणदाता द्वारा ऋणकर्ता से अपने ऋण की मांग की जाती रही है, उसे तथा उसके परिवारजनों को ऋण-पत्र दिखाया जाता रहा है, ऋण-पत्र की शर्तों से उसे अवगत कराया जाता रहा है, तो उस स्थिति में साक्षियों के मर जाने पर भी ऋण-पत्र की वैधता स्थिर रहती है, वह किसी भी स्तर पर निरस्त नहीं होता है, अर्थात् साक्षियों के न रहने पर ऋणकर्ता ऋण देने से मुकर नहीं सकता है। अदृष्टार्थमश्रुतार्थं व्यवहारार्थमागतम्। न लेख्यं सिद्धिमाप्नोति जीवत्स्वपि हि साक्षिषु ॥ 141 ॥ ऋणकर्ता, ऋणदाता और साक्षियों के जीवनकाल में ऋणकर्ता के वयस्क पुत्रों अथवा उत्तराधिकारियों को उनके पिता द्वारा किये गये किसी अनुबन्ध अथवा लिखे गये किसी ऋण पत्र की कोई जानकारी न देने पर, ऋणकर्ता आदि के दिवंगत हो जाने पर उसके पुत्रों की कोई देनदारी नहीं बनती। अभिप्राय यह है कि ऋणदाता को ऋणकर्ता के पुत्रों को भी उनके पिता के ऋणी होने की यथोचित जानकारी करानी चाहिए तथा आवश्यक होने पर ऋण पत्र भी दिखाना चाहिए, ताकि पिता के मर जाने पर व उसकी सम्पत्ति पर अधिकार करते समय वे ऋण के शोधन के दायित्व को भी न भूलें। लेख्ये देशान्तरन्यस्ते दग्धे दुर्लिखिते हृते। सतस्तत्कालहरणमसतो दृष्टदर्शनम् ॥ 142 ॥ ऋणदाता के विदेश चले जाने के कारण किसी दस्तावेज़ के खो जाने पर, किसी दुर्घटनावश जल जाने पर, काग़ज़ के पुराना पड़ जाने से फट जाने पर अथवा काग़ज़ के गल जाने से अपाठ्य एवं अवाच्य बन जाने पर, दस्तावेज़ को देखने- सुनने वालों, अर्थात् अनुबन्ध की जानकारी रखने वालों की सहायता से नया ऋण- पत्र तैयार करने और न्यायालय में उपस्थित करने के लिए ऋणदाता को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। यत्र स्यात् संशयो लेख्ये भूताभूतकृते क्वचित्। तत्स्वहस्तक्रियाचिह्न युक्तिप्राप्तिभिरुद्धरेत् ॥ 143 ॥ किसी ऋण पत्र के वास्तविक अथवा अवास्तविक होने का सन्देह उत्पन्न हो जाने पर ऋणकर्ता के हस्ताक्षरों का मिलान करने से, साक्षियों के साक्ष्य से तथा उनके द्वारा विहित हस्ताक्षरों की जांच-परख से, अनुबन्ध तैयार करने वाले लेखक नारदस्मृति / 101