नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंधनिक से ऋण लेने पर ऋणकर्ता को ऋणदाता के धन की वृद्धि के बदले (यदि वह ऋण में दी गयी धन राशि को व्यापार में लगाता, तो कुछ लाभ अर्जित करता—यह सोचकर) ब्याज अवश्य चुकाना चाहिए। मूलधन और ब्याज की मांग किये जाने पर भुगतान न करने वाला व्यक्ति अपनी विश्वसनीयता ही खो बैठता है। बाज़ार में उसके सम्मान की हानि होती है और उसके नाम को बट्टा लगता है। यदि नो लेखयेद्दत्ततृणिनां चोदितोऽपि सन्। ऋणिकस्यापि वर्धेत तथैव धनिकस्य वत्॥ 115 ॥ यदि ऋणकर्ता द्वारा ऋण चुकाने को उद्यत होने पर और बार बार अनुरोध करने पर भी ऋणदाता अपनी ऋण राशि को लेने से इनकार करता है, टालमटोल करता है अथवा किसी प्रकार की बहानेबाज़ी करता है, तो जिस प्रकार ऋण लेने वाला ऋण राशि पर ब्याज चुकाता है, उसी प्रकार ऋण देने वाले को भी उस अवधि के लिए उस राशि पर ब्याज चुकाना होता है। अभिप्राय यह है कि अपनी ही धन-राशि पर ऋणदाता को ब्याज तो नहीं मिलता, उलटे उसे ही ऋण लेने वाले को ब्याज चुकाना होता है। इस दुगुने दण्ड के विधान का स्पष्ट प्रयोजन ऋण लौटाने वाले को सम्भावित परेशानी से बचाना है। लेख्यं दद्याद्विशुद्धर्णे तदभावे प्रतिश्रवम्। धनिकर्णिकयोरेवं विशुद्धिः स्यात् परस्परम्॥ 116 ॥ अपनी ऋण-राशि को प्राप्त कर लेने पर ऋणदाता को ऋणकर्ता द्वारा लिखा प्रतिज्ञा-पत्र लौटा देना चाहिए। यदि प्रतिज्ञा-पत्र खो गया है अथवा नष्ट हो गया है अथवा कहीं रखा गया है और मिल नहीं रहा है, तो ऋणदाता को अपनी ओर से ऋण-राशि की प्राप्ति का तथा ऋणकर्ता द्वारा लिखे प्रतिज्ञा-पत्र के निरस्त होने का लिखित प्रतिज्ञा-पत्र देना चाहिए। यह दोनों का आपसी मामला है और दोनों के विश्वास का एक-दूसरे के प्रति बना रहना तथा एक दूसरे से पूर्ण सन्तुष्ट होना परमावश्यक है। विश्रम्भहेतू द्वावत्र प्रतिभूराधिरेव च। लिखितं साक्षिणश्च द्वे प्रमाणे व्यक्तिकारके॥ 117 ॥ ऋण के लेन-देन के सम्बन्ध में विश्वास के दो ही आधार हैं- 1. बन्धक रखी गयी वस्तु तथा 2. वापसी का दायित्व लेने वाला व्यक्ति, अर्थात् ऋणकर्ता द्वारा समय पर ऋण का भुगतान न किये जाने पर उसे विवश करने का तथा उसके असमर्थ होने पर उसकी ओर से स्वयं भुगतान करने का वचन देने वाला। इसी प्रकार लेन-देन की सत्यता की पुष्टि करने वाले प्रमाण के दो रूप हैं-
- लिखित दस्तावेज़ तथा 2. वह व्यक्ति, जिसकी उपस्थिति एवं जानकारी में लेन-देन किया गया हो। 94 / नारदस्मृति