नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रीतिपूर्वक दिये गये ऋण पर ब्याज लेने की उपर्युक्त व्यवस्था के अतिरिक्त कायिका, कारिका आदि चार अन्य प्रथाएं भी हैं, जिनका उपयोग किया जा सकता है। ब्याज के रूप में नक़द धनराशि न लेकर उसके बदले धान्य के लेने को 'वार्धुष' नाम दिया जाता है। आपदं निस्तरेद् वैश्यः कामं बार्धुषिकर्मणा। आपत्स्वपि हि कष्टासु ब्राह्मणस्य न बार्धुषम्॥111॥ ब्याज के रूप में नक़द धन अथवा स्वर्ण आदि के बदले अनाज देने में वैश्य को सुविधा होती है। वह नक़द धन के जुगाड़ के पचड़े में नहीं पड़ता और इससे उसका सामान बचा रहता है। इस प्रकार वह अपने अभाव की पूर्ति कर अपना उद्धार कर लेता है, परन्तु ब्राह्मण को दुर्गतिग्रस्त होने पर भी कभी नक़द ब्याज पर अथवा अनाज देकर ऋण नहीं लेना चाहिए; क्योंकि इससे उसका विप्रत्व आहत होता है। ब्राह्मणस्य तु यद्देयं सान्वयस्य न चास्ति सः। निक्षिपेत्तत्स्वकुल्येषु तदभावेऽस्य बन्धुषु॥112॥ ब्राह्मण को सम्पत्ति-सञ्चय का न तो अधिकार है और न ही उसे पैतृक सम्पत्ति के रूप में वंश परम्परा से उत्तराधिकार में कुछ प्राप्त होता है और न ही वह अपने लिए व पुत्र-पौत्रादि के लिए कुछ छोड़ता है। अतः ब्राह्मण के लिए कुछ गिरवी रखकर ऋण लेना तथा उस पर ब्याज चुकाना सम्भव न होने से वर्जित है। संकटकाल आने पर ब्राह्मण को अपने को ही वस्तु के रूप में अपने रक्त- सम्बन्धियों के पास और उनके अभाव में जाति-बन्धुओं के पास बन्धक रख देना चाहिए। तदा तु न सकुल्याः स्युर्न च सम्बन्धिबान्धवाः। तदा दद्याद् द्विजातिभ्यस्तेष्वसत्स्वप्सु निक्षिपेत्॥113॥ यदि ब्राह्मण ने अपने को बन्धक बनाकर किसी से कुछ ऋण लिया है और संयोगवश ऋणकर्ता नहीं रहा तथा उसके कुल में भी कोई नहीं बचा, अथवा वंशज लेने से इनकार करते हैं, तो ब्राह्मण को ऋणदाता के जाति-बन्धुओं को ऋण-राशि लौटानी चाहिए। उनके भी अभाव अथवा इनकार करने पर ऋण-राशि ब्राह्मणों को दे देनी चाहिए, ब्राह्मण द्वारा भी लेना न स्वीकार करने पर जल में फेंक देनी चाहिए। अभिप्राय यह है कि सामर्थ्य आ जाने पर ब्राह्मण को अपने ऋण का शोधन अवश्य करना चाहिए। ऋणदाता अथवा उसके वंशजों के न रहने पर अथवा उनके द्वारा अस्वीकार करने का बहाना कदापि नहीं बनाना चाहिए। गृहीत्वोपगतं दद्यादृणिकायोदयं धनी। अदद्याद्याच्यमानस्तु शेषहानिमवाप्नुयात्॥114॥ नारदस्मृति / 93