भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 304 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 7

प्राक्कथन 'साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब है और स्मृतियां अपने युग में प्रचलित प्रथाओं, परम्पराओं, मान्यताओं, धार्मिक रूढ़ियों तथा आचार-विचारों का संकलन है।' इस सन्दर्भ में देखने पर प्राचीन भारत के गौरवमय होने, अतीत के उज्ज्वल होने तथा मनु की गर्वोक्त—विश्व के लोग भारतीयों से आदर्श व्यवहार का प्रशिक्षण प्राप्त करें—पर सहसा विश्वास नहीं होता। जिस युग में स्त्रियों और शूद्रों को व्यक्ति न समझ कर वस्तु समझा जाता हो, उनका क्रय-विक्रय किया जाता हो, उन्हें बन्धक रखा जाता हो, उनसे किसी भी प्रकार की सेवा—देह-शोषण ही नहीं, देह-व्यापार तक करने-लेने की पुरुष को स्वच्छन्दता-स्वतन्त्रता हो, उन पर क्रूरतापूर्ण अत्याचार को भी अधिकार माना जाता हो, उस युग को स्वर्णिम युग मानने में हमें तो औचित्य दिखायी नहीं देता। जिस युग में न्याय-व्यवस्था तथा दण्ड-प्रणाली भेद-भावपूर्ण हो, एक ही अपराध के लिए विभिन्न वर्णों के लोगों को मृदु, मध्यम और कठोर दण्ड देने का विधान हो, उस युग को स्वर्णिम युग कैसे माना जा सकता है ? जिस युग में समाज वर्ण-व्यवस्था को महत्त्व देता हो और वर्ण-व्यवस्था केवल जन्म पर आधृत हो, ब्राह्मण को उचित-अनुचित कुछ भी करने की छूट हो, राजा को उसे दण्ड देने का अधिकार तक न हो, उस युग को स्वर्णिम युग मानना क्या अटपटा नहीं लगता ? हमारे विचार में आर्य लोग जब ईरान (ईरानम्-आर्याणाम्) से भारत (दक्षिण भारत) पहुंचे होंगे, तो उस समय आर्यों में दो प्रकार के लोग रहे होंगे—गुरु तथा शिष्य। गुरु केवल शास्त्रज्ञ ही नहीं, अपितु शस्त्र-विद्या में भी पारंगत थे। राम को धनुर्विद्या सिखाने वाले विश्वामित्र थे, भीष्म और कर्ण के शिक्षक परशुराम ब्राह्मण ही थे, भृगु ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ की रक्षा की थी। वाल्मीकि ने लव-कुश को धनुर्विद्या की शिक्षा दी थी। द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, वसिष्ठ और भरद्वाज सभी दोनों— शास्त्र और शस्त्र-विधाओं में निष्णात थे, परन्तु मूलतः वे सभी शिक्षक ही थे, सामान्य स्थिति में वे युद्ध-संघर्ष से दूर रहकर तप-साधना और शास्त्र-चिन्तन करते थे। शिष्य ही सभी गतिविधियों में सक्रिय रहते थे। आगे चलकर गुरुओं को ब्राह्मण और शिष्यों को क्षत्रिय कहा जाने लगा। आर्य विजेता थे और भारत की