भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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जलवायु को अनुकूल पाकर वे स्थायी रूप से यहां बस गये थे। अतः उन्हें यहां के मूल निवासियों से सम्पर्क बनाना ही पड़ा होगा। आर्यों ने अपनी कूटनीति और चतुराई का आश्रय लेकर यहां के लोगों को दो वर्गों (आगे चलकर वर्ग ही वर्ण बन गया) में बांट दिया। समृद्ध और प्रबुद्ध वर्ग को विपन्न, अशिक्षित और दरिद्र वर्ग से तोड़कर अपने साथ मिला लिया, उन्हें यज्ञोपवीत धारण करने, वेदाध्ययन करने और यज्ञ-यागादि करने का अधिकार देकर वैश्य (विशः = प्रजाः ऋग्वेद) के रूप में अपने साथ मिला अवश्य लिया, परन्तु आर्यों ने वैश्य के रूप में परिगणित लोगों को सदैव अपने से नीचे रखा। जिस प्रकार गुरु-रूप में मान्य ब्राह्मण ने शिष्य (क्षत्रिय) से अपने को ऊपर बनाये रखा, उसी प्रकार आर्यों ने अपने को वैश्यों से ऊपर बनाये रखा। जिस प्रकार ब्राह्मण की वरीयता को स्वीकार करना क्षत्रियों की विवशता थी, उसी प्रकार विजेता आर्यों की वरीयता को स्वीकार करना पराजित द्रविड़ों की भी विवशता थी। वस्तुतः पराजित को विजेता की साधारण उदारता भी वरदान के समान प्रतीत होती है। इतिहास में अकबर की उदारता की प्रशंसा इसका एक सजीव उदाहरण है। यहां इस तथ्य की ओर संकेत करना अप्रासंगिक न होगा कि आर्यों ने भारत में अपने पैर जमाते समय आपस में सौहार्द-सौमनस्य का अद्भुत परिचय दिया। ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग में विभक्त आर्यों ने अनार्यों के विषय में मतैक्य बनाये रखा और 'परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ' के कथन को यथार्थ में ही चरितार्थ कर दिखाया। इसी से उनकी उन्नति और प्रगति का मार्ग प्रशस्त हुआ। द्रविड़ों में विभाजन का बीज बोने में सफल आर्यों ने शूद्रों का जमकर शोषण किया, जिसे पढ़-सुनकर किसी का भी सिर लज्जा से झुके बिना नहीं रहता। आर्यों ने भारत में अपने पैर दृढ़ता से जमा लेने के उपरान्त जिस समाज- व्यवस्था, न्याय-प्रणाली, दण्ड-संहिता, आचार-परम्परा तथा रीति-नीति का प्रवर्तन किया, उन्हीं का लिपिबद्ध रूप स्मृतियां हैं। स्मृतियों की रचना के पीछे एक अन्य मान्यता यह भी है कि जब आदिम मानव यायावरी जीवन से ऊब गया होगा व स्थायी निवास बनाने को उत्सुक हुआ होगा, तो उसके मन में अपनी आजीविका के स्थायी साधनों को खोजने की, सञ्चय की, सम्पत्ति बनाने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया होगा। इसी के साथ उसने प्राणों की, सम्मान की तथा सुरक्षा की आवश्यकता भी अनुभव की होगी। इसी तथ्य को महाभारत के शान्तिपर्व में इस प्रकार स्वीकार किया गया है— राजा चेना भवे लोके पृथिव्यां दण्डधारकः। जले मत्स्यानिभक्ष्यन् दुर्बलं बलवत्तराः॥ अर्थात् राजा के भय से समाज में बड़ी मछली छोटी मछली को नहीं निगल