संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौरसिंहपुराण [ अध्याय ३० ....................................। और छत्र तथा जूतेका दान करता है, वह 'उपशोभन' .................... महीयते ॥ ३९ नामक स्वर्गमें जाता है। जिसने देवमन्दिर बनवाया है, जो द्विजोंकी सेवा करता है तथा सदा तीर्थयात्रा करता ........................ च नित्यशः । रहता है, वह 'स्वर्गराज' (आह्लाद)-में प्रतिष्ठित होता .................... स्वर्गं शुभं लभेत् ॥ ४० ॥ है। जो मनुष्य नित्य एक ही अन्न भोजन करता, जो प्रतिदिन केवल रातमें ही खाता तथा त्रिरात्र आदि व्रतोंके द्वारा उपवास किया करता है, वह 'शुभ' नामक स्वर्गको ............ जितेन्द्रियो ब्रह्मचारी दृढव्रतः । पाता है। नदीमें स्नान करनेवाला, क्रोधको जीतनेवाला ........ ज्योति यथा भूतहिते रतः। एवं दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाला ब्रह्मचारी सम्पूर्ण विद्यादानेन मेधावी निरहंकारमाप्नुयात् ॥ ४१ जीवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले पुरुषके समान 'निर्मल' नामक स्वर्गको पाता है। मेधावी पुरुष विद्यादान करके येन येन हि भावेन यद्यद्दानं प्रयच्छति । 'निरहंकार' नामक स्वर्गको प्राप्त होता है ॥ ३७-४१ ॥ तत्तत्स्वर्गमवाप्नोति यद्यदिच्छति मानवः ॥ ४२ मनुष्य जिस-जिस भावनासे जो-जो दान देता है और उससे जो-जो फल चाहता है, तदनुसार ही विभिन्न चत्वारि अतिदानानि कन्या गौर्भूः सरस्वती । स्वर्गलोकोंको पाता है। कन्या, गौ, भूमि तथा विद्या- नरकादुद्धरन्त्येते जयवाहनदोहनात् ॥ ४३ इन चारोंके दानको 'अतिदान' कहा गया है। ये चार वस्तुएँ दान की जानेपर दाताका नरकसे उद्धार कर देती यस्तु सर्वाणि दानानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । हैं। इतना ही नहीं, बैलपर सवारी करने और गायको सम्प्राप्य न निवर्तेत स्वर्गं शान्तमनामयम् ॥ ४४ दुहनेसे जो दोष होता है, उससे भी मनुष्य मुक्त हो जाता है। जो ब्राह्मणोंको सब प्रकारके दान अर्पित करता है, वह शान्त एवं निरामय स्वर्गलोकको प्राप्त होकर फिर शृङ्गे तु पश्चिमे यत्र ब्रह्मा तत्र स्थितः स्वयम्। वहाँसे नहीं लौटता है। मेरुगिरिके पश्चिम शिखरपर, पूर्वशृङ्गे स्वयं विष्णुः मध्ये चैव शिवः स्थितः ॥ ४५ जहाँ स्वयं ब्रह्माजी विराजमान हैं, वहीं वह स्वयं भी वास करता है। पूर्वशृङ्गपर साक्षात् भगवान् विष्णु और अतः परं तु विप्रेन्द्र स्वर्गाध्वानमिमं शृणु। मध्यम शृङ्गपर शिवजी विराजमान हैं ॥ ४२-४५ ॥ विमलं विपुलं शुद्धमुपर्युपरि संस्थितम् ॥ ४६ विप्रेन्द्र ! इसके बाद आप स्वर्गके इन 'निर्मल' तथा 'विशाल' मार्गका वर्णन सुनें। स्वर्गलोकके दस मार्ग हैं। प्रथमे तु कुमारस्तु द्वितीये मातरः स्थिताः । ये सभी एकके ऊपर दूसरेके क्रमसे स्थित हैं। प्रथम मार्गपर तृतीये सिद्धगन्धर्वास्तुर्ये विद्याधरा द्विज ॥ ४७ कुमार कार्तिकेय और दूसरेपर मातृकाएँ रहती हैं। द्विज ! तीसरे मार्गपर सिद्ध-गन्धर्व, चौथेपर विद्याधर, पाँचवेंपर पञ्चमे नागराजश्च षष्ठे तु विनतासुतः । नागराज और छठेपर विनतानन्दन गरुडजी विराजमान हैं। सप्तमे दिव्यपितरो धर्मराजस्तथाष्टमे । सातवेंपर दिव्य पितृगण, आठवेंपर धर्मराज, नवेंपर दक्ष नवमे तु तथा दक्ष आदित्यो दशमे पथि ॥ ४८ और दसवें मार्गपर आदित्यकी स्थिति है ॥ ४६-४८ ॥ भूलोकसे एक लाख दो हजार योजनकी भूर्लोकाच्छतसाहस्रादूर्ध्वं चरति भास्करः । ऊँचाईपर सूर्यदेव विचरते हैं। उस ऊँचाईपर योजनानां सहस्रे द्वे विष्कम्भनं समन्ततः ॥ ४९ सब ओर उनके रुकनेके लिये आधार हैं In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth