संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३० ] भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन १०१ आह्लादः स्वर्गराजा वै स्वर्गशृङ्गे तु पश्चिमे। निर्ममो निरहंकारः सौभाग्यश्चातिनिर्मलः ॥ २७ स्वर्गाश्चैव द्विजश्रेष्ठ पूर्वशृङ्गे समास्थिताः । एकविंशतिः स्वर्गा वै निविष्टा मेरुमूर्धनि ॥ २८ अहिंसादानकर्तारो यज्ञानां तपसां तथा। तत्तेषु निवसन्ति स्म जनाः क्रोधविवर्जिताः ॥ २९ जलप्रवेशे चानन्दं प्रमोदं वह्निसाहसे। भृगुप्रपाते सौख्यं च रणं चैवास्य निर्मलम् ॥ ३० अनाशके तु संन्यासे मृतो गच्छेत्रिविष्टपम्। क्रतुयाजी नाकपृष्ठमग्निहोत्री च निर्वृतिम् ॥ ३१ तडागकूपकर्ता च लभते पौष्टिकं द्विज। सुवर्णदायी सौभाग्यं लभन् स्वर्गं तपःफलम् ॥ ३२ शीतकाले महावह्निं प्रज्वालयति यो नरः। सर्वसत्त्वहितार्थाय स्वर्गं सोऽप्सरसं लभेत् ॥ ३३ हिरण्यगोप्रदाने हि निरहंकारमाप्नुयात्। भूमिदानेन शुद्धेन लभते शान्तिकं पदम् ॥ ३४ रौप्यदानेन स्वर्गं तु निर्मलं लभते नरः । अश्वदानेन पुण्याहं कन्यादानेन मङ्गलम् ॥ ३५ द्विजेभ्यस्तर्पणं कृत्वा दत्त्वा वस्त्राणि भक्तितः । श्वेतं तु लभते स्वर्गं यत्र गत्वा न शोचते ॥ ३६ कपिलागोप्रदानेन परमार्थे महीयते। गोवृषस्य प्रदानेन स्वर्गं मन्मथमाप्नुयात् ॥ ३७ माघमासे सरित्स्नायी तिलधेनुप्रदस्तथा। छत्रोपानहदाता च स्वर्गं यात्युपशोभनम् ॥ ३८
[अनुवाद / व्याख्या]
राजा आह्लाद निवास करते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! पूर्व शिखरपर निर्मम, निरहंकार, सौभाग्य और अतिनिर्मल नामक स्वर्ग सुशोभित होते हैं। मेरु पर्वतकी चोटीपर कुल इक्कीस स्वर्ग बसे हुए हैं। जो अहिंसाधर्मका पालन करनेवाले और दानी हैं तथा जो यज्ञ और तपका अनुष्ठान करनेवाले हैं, वे क्रोधरहित मनुष्य इन स्वर्गोंमें निवास करते हैं॥ २६-२९॥ जो धर्मपालनके लिये जलमें प्रविष्ट होकर प्राण त्याग करते हैं, वे 'आनन्द' नामक स्वर्गको प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार जो धर्मरक्षाके ही लिये अग्निमें जलनेका साहस करते हैं, उन्हें 'प्रमोद' नामक स्वर्गकी प्राप्ति होती है और जो धर्मार्थ पर्वतशिखरसे कूदकर प्राण देते हैं, उन्हें 'सौख्य' संज्ञक स्वर्ग प्राप्त होता है। संग्रामकी मृत्युसे 'निर्मल' (या अतिनिर्मल) नामक स्वर्गकी उपलब्धि होती है। उपवास-व्रत एवं संन्यासावस्थामें मृत्युको प्राप्त होनेवाले लोग 'त्रिविष्टप' नामक स्वर्गमें जाते हैं। श्रौत यज्ञ करनेवाला 'नाकपृष्ठ'में और अग्निहोत्री 'निर्वृति' नामक स्वर्गमें जाते हैं। द्विज! पोखरा और कुआँ बनवानेवाला मनुष्य 'पौष्टिक' स्वर्गको पाता है, सोना दान करनेवाला पुरुष तपस्याके फलभूत 'सौभाग्य' नामक स्वर्गको जाता है। जो शीतकालमें सब प्राणियोंके हितके लिये लकड़ियोंके ढेरको जलाकर बड़ी भारी अग्निराशि प्रज्वलित करता और उन्हें गरमी पहुँचाता है, वह 'अप्सरा' संज्ञक स्वर्गको उपलब्ध करता है। सुवर्ण और गोदान करनेपर दाता 'निरहंकार' नामवाले स्वर्गको पाता है और शुद्धभावसे भूमिदान करके मनुष्य 'शान्तिक' नामसे प्रसिद्ध स्वर्गधामको उपलब्ध करता है। चाँदी दान करनेसे मनुष्यको 'निर्मल' नामक स्वर्गकी प्राप्ति होती है। अश्वदानसे दाता 'पुण्याह'का और कन्यादानसे 'मङ्गल'का लाभ करता है। ब्राह्मणोंको तृप्त करके उन्हें भक्तिपूर्वक वस्त्र दान करनेसे मनुष्य 'श्वेत' नामक स्वर्गको पाता है, जहाँ जाकर वह कभी शोकका भागी नहीं होता॥ ३०-३६॥ कपिला गौका दान करनेसे दाता 'परमार्थ' नामक स्वर्गमें पूजित होता है और उत्तम साँड़का दान करनेसे उसे 'मन्मथ' नामक स्वर्गकी प्राप्ति होती है। जो माघके महीनेमें नित्य नदीमें स्नान करता, तिलमयी धेनु देता
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