भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 318 में से

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पृष्ठ 111

१०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३० ऋक्षद्वीपादिपुण्या जनपदाः। निष्कामा ये | ऋक्षद्वीप आदि पुण्य देश हैं। जो लोग निष्कामभावसे स्वधर्मेण नरसिंहं यजन्ति ते तत्र निवसन्ति। | अपने-अपने वर्णधर्मका आचरण करते हुए भगवान् अधिकारक्षयान्मुक्तिं च प्राप्नुवन्ति॥ १५॥ | नृसिंहका यजन करते हैं, वे ही उन पुण्य देशोंमें निवास जम्ब्वाद्याः स्वादूदकान्ताः सप्त पयोधयः। ततः परा | करते हैं तथा कर्माधिकारका क्षय हो जानेपर मोक्ष भी हिरण्मयी भूमिः। ततो लोकालोकपर्वतः। एष | प्राप्त कर लेते हैं। जम्बूद्वीपसे लेकर 'शुद्धोदक' संज्ञक भूर्लोकः॥ १६॥ | समुद्रपर्यन्त सात द्वीप और सात समुद्र हैं। उसके बाद | स्वर्णमयी भूमि है। उसके आगे लोकालोक पर्वत है— | यह सब 'भूर्लोक' का वर्णन हुआ॥ १५-१६॥ अस्योपरि अन्तरिक्षलोकः। खेचराणां | इसके ऊपर अन्तरिक्षलोक है, जो अन्तरिक्षचारी रम्यस्तदूर्ध्वं स्वर्गलोकः॥ १७ | प्राणियोंके लिये परम रमणीय है। इसके ऊपर स्वर्गलोक स्वर्गस्थानं महापुण्यं प्रोच्यमानं निबोधत। | है। अब महापुण्यमय स्वर्गलोकका वर्णन किया जाता भारते कृतपुण्यानां देवानामपि चालयम्॥ १८ | है, उसे आपलोग मुझसे सुनें। जिन्होंने भारतवर्षमें | रहकर पुण्यकर्म किये हैं, उनका तथा देवताओंका वहाँ मध्ये पृथिव्यामद्रीन्द्रो भास्वान् मेरुर्हिरण्मयः। | निवास है। भूमण्डलके बीचमें पर्वतोंका राजा मेरु है, योजनानां सहस्राणि चतुराशीतिमुच्छ्रितः॥ १९ | जो सुवर्णमय होनेके कारण अपनी प्रभासे उद्भासित | होता रहता है। वह पर्वत चौरासी हजार योजन ऊँचा प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्धरण्यां धरणीधरः। | है और सोलह हजार योजनतक पृथ्वीमें नीचेकी ओर | धँसा हुआ है। साथ ही उसके चारों ओर उतने ही तावत्प्रमाणा पृथिवी पर्वतस्य समन्ततः॥ २० | प्रमाणवाली पृथिवी है॥ १७-२०॥ तस्य शृङ्गतत्रयं मूर्ध्नि स्वर्गो यत्र प्रतिष्ठितः। | मेरुगिरिके ऊपरी भागमें तीन शिखर हैं, जहाँ स्वर्गलोक नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्॥ २१ | बसा हुआ है। मेरुके वे स्वर्गीय शिखर नाना प्रकारके मध्यमं पश्चिमं पूर्वं मेरोः शृङ्गाणि त्रीणि वै। | वृक्ष और लताओंसे आवृत्त तथा भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे मध्यमं स्फटिकं शृङ्गं वैदूर्यमणिकामयम्॥ २२ | सुशोभित हैं। मध्यम, पश्चिम और पूर्व—ये ही तीन | मेरुके शिखर हैं। इनमें मध्यम शृङ्ग स्फटिक तथा इन्द्रनीलमयं पूर्वं माणिक्यं पश्चिमं स्मृतम्। | वैदूर्यमणिमय हैं, पूर्व शृङ्ग इन्द्रनीलमय और पश्चिम योजनानां सहस्राणि नियुतानि चतुर्दश॥ २३ | शिखर माणिक्यमय कहा जाता है। इनमेंसे मध्यम शृङ्ग | चौदह लाख चौदह हजार योजन ऊँचा है, जहाँ 'त्रिविष्टप' उच्छ्रितं मध्यमं शृङ्गं स्वर्गो यत्र त्रिविष्टपः। | नामका स्वर्गलोक प्रतिष्ठित है। पूर्व शृङ्ग मेरुके ऊपर अभ्रान्तरितं शृङ्गं मूर्ध्नि छात्राकृति स्थितम्॥ २४ | छत्राकार स्थित है। मध्यम शृङ्ग और उसके बीच अन्धकारका | व्यवधान है। वह मध्यम शृङ्ग और उसके बादवाले पूर्वमुत्तरशृङ्गाणामन्तरं मध्यमस्य च। | पश्चिम शिखरके बीचमें स्थित है। नाकपृष्ठ—त्रिविष्टपमें त्रिविष्टपे नाकपृष्ठे ह्यप्सराः सन्ति निर्वृताः॥ २५ | आनन्दमयी अप्सराएँ निवास करती हैं॥ २१-२५॥ | मेरुके मध्यवर्ती शिखरपर विराजमान स्वर्गमें आनन्दोऽथ प्रमोदश्च स्वर्गशृङ्गे तु मध्यमे। | आनन्द और प्रमोदका वास है। पश्चिम शिखरपर श्वेतश्च पौष्टिकश्चैव उपशोभनमन्मथौ॥ २६ | श्वेत, पौष्टिक, उपशोभन और काम एवं स्वर्गके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth | 1113 Narsingpuran_Section_5_2_Back

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